नई दिल्ली, 24 मई (वेब वार्ता)। ईरान और अमेरिका के बीच जारी तनाव के बीच भारत दौरे पर पहुंचे अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो के बयान ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। नई दिल्ली में मीडिया से बातचीत के दौरान उन्होंने संकेत दिया कि दुनिया को अगले कुछ घंटों में सकारात्मक खबर मिल सकती है, जिससे संभावित राजनयिक समझौते की अटकलें तेज हो गई हैं।
मार्को रुबियो ने हालांकि संभावित समझौते का पूरा विवरण साझा नहीं किया, लेकिन उनके बयान से यह संकेत मिला कि अमेरिका और ईरान के बीच जारी वार्ताओं में महत्वपूर्ण प्रगति हुई है। उन्होंने कहा कि बातचीत आगे बढ़ रही है और निकट भविष्य में सकारात्मक परिणाम सामने आ सकते हैं।
इससे पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी युद्धविराम को लेकर बड़ा दावा कर चुके हैं। उन्होंने कहा था कि अमेरिका और ईरान के बीच प्रस्तावित समझौते के कई पहलुओं पर व्यापक सहमति बन चुकी है और 60 दिन के युद्धविराम विस्तार को अंतिम रूप देने की दिशा में प्रगति हो रही है।
संभावित समझौते में होर्मुज जलडमरूमध्य को दोबारा खोलना सबसे अहम मुद्दों में माना जा रहा है। संघर्ष के बाद इस रणनीतिक समुद्री मार्ग पर बाधाओं ने वैश्विक तेल आपूर्ति और समुद्री व्यापार को प्रभावित किया है। रिपोर्टों के अनुसार प्रस्तावित व्यवस्था में ईरान को तेल निर्यात की सीमित अनुमति, समुद्री मार्ग की सुरक्षा और तनाव कम करने के उपाय शामिल हो सकते हैं।
मार्को रुबियो ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अमेरिका किसी भी परिस्थिति में ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने की अनुमति नहीं देगा। उनके अनुसार यह मुद्दा अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा है और इस पर कोई समझौता संभव नहीं है।
नई दिल्ली में हुई वार्ता के दौरान विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने भी भारत का दृष्टिकोण सामने रखा। उन्होंने कहा कि जहां अमेरिका अपनी ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति के तहत निर्णय लेता है, वहीं भारत ‘इंडिया फर्स्ट’ दृष्टिकोण पर काम करता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों को प्राथमिकता देगा और विभिन्न स्रोतों से ऊर्जा खरीदने की नीति जारी रखेगा।
मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव और वैश्विक ऊर्जा बाजार पर उसके प्रभाव के बीच मार्को रुबियो का यह बयान महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय अब इस बात पर नजर बनाए हुए है कि प्रस्तावित समझौता वास्तव में आकार लेता है या नहीं और इसका क्षेत्रीय स्थिरता पर क्या असर पड़ता है।




