मुंबई, 27 मई (वेब वार्ता)। महाराष्ट्र में एक जून से शुरू होने जा रहे नए शैक्षणिक सत्र से पहले स्कूल बस संचालकों की चिंता बढ़ गई है। पेट्रोल और डीजल की लगातार बढ़ती कीमतों ने स्कूल परिवहन सेवाओं पर आर्थिक दबाव बढ़ा दिया है। राज्य के स्कूल बस संचालकों और उनके संगठनों ने संकेत दिए हैं कि यदि जल्द राहत नहीं मिली तो बस सेवा शुल्क में बढ़ोतरी करनी पड़ सकती है। साथ ही उन्होंने सरकार से सब्सिडी और राहत पैकेज की मांग की है।
स्कूल बस ओनर्स एसोसिएशन के अनुसार, बस संचालक पहले से ही वाहन रखरखाव, बीमा प्रीमियम, परमिट शुल्क, कर्मचारियों के वेतन और प्रशासनिक खर्चों का भारी बोझ उठा रहे हैं। अब डीजल की बढ़ती कीमतों ने उनकी वित्तीय स्थिति को और चुनौतीपूर्ण बना दिया है। संगठन का कहना है कि हालात कोविड काल जैसी स्थिति पैदा कर रहे हैं और यदि समय रहते सहायता नहीं मिली तो परिवहन सेवाएं प्रभावित हो सकती हैं।
हालांकि संगठन ने स्पष्ट किया है कि वह अभिभावकों और विद्यार्थियों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ डालने के पक्ष में नहीं है। इसी कारण स्कूलों और सरकार के सामने कुछ व्यावहारिक सुझाव रखे गए हैं, ताकि बस शुल्क बढ़ाए बिना संचालन लागत को नियंत्रित किया जा सके।
एसोसिएशन ने स्कूलों से हाइब्रिड शिक्षण प्रणाली अपनाने की अपील की है। इसके तहत सप्ताह में कुछ दिन प्रत्यक्ष कक्षाएं और बाकी दिन ऑनलाइन पढ़ाई कराने का सुझाव दिया गया है। संगठन का तर्क है कि इससे स्कूल बसों का दैनिक संचालन कम होगा, ईंधन की बचत होगी और परिचालन लागत में कमी आएगी। साथ ही स्कूलों में सिंगल शिफ्ट परिवहन प्रणाली लागू करने का भी आग्रह किया गया है, जिससे बसों को बार-बार चक्कर न लगाने पड़ें।
संगठन के मुताबिक महाराष्ट्र में करीब 40 हजार स्कूल बसें संचालित होती हैं और प्रत्येक बस प्रतिदिन लगभग 18 से 20 लीटर डीजल की खपत करती है। यदि स्कूल सप्ताह में कुछ दिन ऑनलाइन संचालित किए जाएं तो प्रतिदिन लाखों लीटर डीजल की बचत संभव है। एसोसिएशन का दावा है कि इस व्यवस्था से लगभग 16 लाख लीटर डीजल बचाया जा सकता है, जिससे परिवहन लागत कम होगी और किराया बढ़ाने की आवश्यकता टाली जा सकेगी।
स्कूल बस संचालकों का कहना है कि अलग-अलग समय पर कई शिफ्ट चलने से बसों को अधिक फेरे लगाने पड़ते हैं, जिससे ईंधन खर्च और संचालन लागत दोनों बढ़ते हैं। यदि स्कूलों में एक समान पिकअप और ड्रॉप समय तय किया जाए तो खर्च में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है और परिवहन सेवाएं अधिक व्यवस्थित ढंग से संचालित की जा सकती हैं।
इधर, ईंधन की बढ़ती कीमतों को देखते हुए अभिभावक संगठनों ने भी हाइब्रिड पढ़ाई की मांग उठाई है। ‘इंडिया वाइड पेरेंट्स एसोसिएशन’ ने सुझाव दिया है कि स्कूलों को कुछ समय के लिए ऑनलाइन और ऑफलाइन पढ़ाई के मिश्रित मॉडल में संचालित किया जाए। संगठन का कहना है कि इससे ईंधन की खपत घटेगी और परिवहन पर बढ़ते आर्थिक दबाव को कम किया जा सकेगा।
पेरेंट्स एसोसिएशन ने अपने सुझावों में यह भी कहा है कि स्कूलों के नजदीक रहने वाले विद्यार्थियों को पैदल या साइकिल से आने के लिए प्रोत्साहित किया जाए। साथ ही सरकार स्कूल बस संचालकों को इलेक्ट्रिक बसें उपलब्ध कराने या इस दिशा में सहायता देने पर भी विचार करे, ताकि भविष्य में ईंधन कीमतों पर निर्भरता कम हो सके।
विशेषज्ञों का मानना है कि बढ़ती ईंधन कीमतों के बीच सरकार, स्कूल प्रबंधन और परिवहन संचालकों के बीच समन्वय बेहद जरूरी है। यदि समय रहते व्यावहारिक समाधान नहीं निकाला गया तो आने वाले दिनों में स्कूल परिवहन सेवाओं की लागत और अभिभावकों पर आर्थिक दबाव दोनों बढ़ सकते हैं।




