नई दिल्ली, 11 जून (वेब वार्ता)। संस्कृत भाषा के संरक्षण, संवर्धन और उसके वैश्विक पुनरुत्थान की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल के तहत बिहार के शिक्षा मंत्री मिथिलेश तिवारी ने श्री लाल बहादुर राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर मुरलीमनोहर पाठक से शिष्टाचार भेंट की। इस दौरान संस्कृत शिक्षा की वर्तमान स्थिति, भविष्य की संभावनाओं और भारतीय ज्ञान परंपरा को विश्व स्तर पर स्थापित करने को लेकर व्यापक विचार-विमर्श किया गया।
बैठक के दौरान कुलपति प्रोफेसर मुरलीमनोहर पाठक ने शिक्षा मंत्री मिथिलेश तिवारी का पुस्तक भेंट कर स्वागत किया। इस अवसर पर विश्वविद्यालय के कुलसचिव प्रोफेसर पवन कुमार शर्मा सहित अन्य गणमान्यजन भी उपस्थित रहे।
यह उच्चस्तरीय बैठक संस्कृत भाषा के सर्वांगीण विकास और उसके समकालीन संदर्भों में महत्व को लेकर केंद्रित रही। दोनों पक्षों ने इस बात पर सहमति व्यक्त की कि संस्कृत केवल एक प्राचीन भाषा नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता, संस्कृति, दर्शन और समृद्ध ज्ञान परंपरा की आधारशिला है। इसलिए इसके अध्ययन, अध्यापन और शोध को आधुनिक शिक्षा व्यवस्था के साथ अधिक प्रभावी ढंग से जोड़ने की आवश्यकता है।
बैठक में बिहार में संस्कृत शिक्षा के विस्तार को लेकर भी विस्तृत चर्चा हुई। मिथिलेश तिवारी ने बताया कि राज्य सरकार संस्कृत विद्यालयों और महाविद्यालयों के सुदृढ़ीकरण, योग्य शिक्षकों की नियुक्ति तथा विद्यार्थियों में संस्कृत के प्रति रुचि विकसित करने के लिए लगातार प्रयास कर रही है। उन्होंने कहा कि यदि संस्कृत को आधुनिक तकनीक, डिजिटल शिक्षण पद्धति और रोजगारोन्मुखी पाठ्यक्रमों से जोड़ा जाए तो यह नई पीढ़ी के लिए अधिक उपयोगी और आकर्षक बन सकती है।
प्रोफेसर मुरलीमनोहर पाठक ने विश्वविद्यालय की शैक्षणिक उपलब्धियों, शोध परियोजनाओं और राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संचालित संस्कृत संवर्धन कार्यक्रमों की जानकारी साझा की। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय का उद्देश्य केवल पारंपरिक शिक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि संस्कृत को समकालीन जीवन और वैश्विक परिप्रेक्ष्य में भी प्रासंगिक बनाना है। इसके लिए डिजिटल संसाधनों, ऑनलाइन पाठ्यक्रमों और अंतरराष्ट्रीय शैक्षणिक सहयोग का निरंतर विस्तार किया जा रहा है।
कुलसचिव प्रोफेसर पवन कुमार शर्मा ने विश्वविद्यालय की प्रशासनिक और शैक्षणिक व्यवस्थाओं की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए संस्थान को अधिक पारदर्शी, प्रभावी और परिणामोन्मुख बनाने के प्रयासों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराने के लिए विश्वविद्यालय लगातार नवाचार और सुधारात्मक कदम उठा रहा है।
बैठक के दौरान भारतीय ज्ञान परंपरा को वैश्विक मंच पर प्रतिष्ठित करने की संभावनाओं पर भी गंभीर चर्चा हुई। इस बात पर सहमति व्यक्त की गई कि संस्कृत केवल अतीत की धरोहर नहीं है, बल्कि भविष्य की एक सशक्त बौद्धिक, सांस्कृतिक और दार्शनिक संपदा भी है, जिसे नई पीढ़ी से जोड़ना समय की आवश्यकता है।
अंत में यह शिष्टाचार भेंट संस्कृत भाषा के विकास और उसके व्यापक प्रचार-प्रसार की दिशा में एक सार्थक और प्रेरणादायी पहल के रूप में सामने आई। प्रतिभागियों ने विश्वास व्यक्त किया कि इस प्रकार के संवाद और सहयोग से संस्कृत के संरक्षण और संवर्धन को नई गति मिलेगी तथा भारतीय ज्ञान परंपरा को वैश्विक पहचान दिलाने के प्रयास और अधिक मजबूत होंगे।
इस अवसर पर विश्वविद्यालय के सहायक अभियंता अजनी राय की उपस्थिति भी उल्लेखनीय रही।




