महिला सुरक्षा के दावों की खुली पोल! सलमा ने सिस्टम में बैठे लोगों को किया बेनकाब, बोलीं—‘पीड़ित को ही शक की नजर से देखते हैं अधिकारी’
रेप पीड़िताओं के साथ काम करने वाली सामाजिक कार्यकर्ता सलमा का बड़ा आरोप: पुलिस से लेकर महिला आयोग तक एक जैसा रवैया, लापरवाह अधिकारियों पर हो सख्त कार्रवाई
नई दिल्ली |
महिला सुरक्षा के बड़े-बड़े दावों के बीच क्या वास्तव में पीड़ित महिलाओं को न्याय मिल रहा है? क्या कानून के रखवाले ही पीड़िताओं की आवाज सुनने के बजाय उन पर सवाल उठाने लगते हैं? क्या सरकारी तंत्र में बैठे कुछ लोगों की संवेदनहीनता न्याय की राह में सबसे बड़ी बाधा बन रही है? सामाजिक कार्यकर्ता सलमा ने इन सवालों को उठाते हुए व्यवस्था पर गंभीर आरोप लगाए हैं।
आइडियल न्यूज़ के संपादक इरफान शेख के साथ बातचीत में सलमा ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि सरकार किसी भी पार्टी की हो, महिला सुरक्षा को लेकर अधिकारियों का रवैया अक्सर निराशाजनक दिखाई देता है। सलमा का आरोप है कि यौन हिंसा की पीड़िताओं को सहानुभूति और न्याय देने के बजाय कई बार खुद उन्हें ही शक की नजर से देखा जाता है।
‘पुलिस से लेकर महिला आयोग तक, रवैया नहीं बदलता’
सलमा ने बताया कि वह लंबे समय से दुष्कर्म पीड़िताओं के साथ काम कर रही हैं। इस दौरान उन्होंने ऐसे कई मामले देखे हैं, जिनमें पीड़िताओं को न्याय की प्रक्रिया में ही मानसिक और सामाजिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा।
उनका कहना है कि पीड़िता पहले ही एक गंभीर सदमे से गुजर रही होती है। ऐसे में अगर उसे अपनी बात साबित करने के लिए बार-बार सवालों और संदेह का सामना करना पड़े, तो उसकी तकलीफ और बढ़ जाती है।
सलमा के मुताबिक, महिला सुरक्षा केवल कानून बनाने या बड़े-बड़े दावे करने से सुनिश्चित नहीं होगी। इसके लिए जरूरी है कि पुलिस, प्रशासन और संबंधित संस्थाएं पीड़िताओं के प्रति संवेदनशील हों और उनकी शिकायतों पर समयबद्ध कार्रवाई करें।
लापरवाह अधिकारियों पर हो सख्त कार्रवाई
सलमा ने मांग की कि महिला सुरक्षा से जुड़े मामलों में लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि जहां जांच में जिम्मेदारी और लापरवाही साबित हो, वहां संबंधित अधिकारी को तत्काल निलंबित करने जैसी कार्रवाई की जाए।
उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए दोषी अधिकारियों की पहचान सार्वजनिक की जानी चाहिए। उनके अनुसार, जब तक व्यवस्था में जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक पीड़िताओं को न्याय दिलाने के दावे अधूरे रहेंगे।
हालांकि, किसी अधिकारी की तस्वीर सार्वजनिक करने या उसे दोषी घोषित करने की कार्रवाई उचित जांच, प्रमाण और लागू कानूनी प्रक्रिया के अनुरूप ही होनी चाहिए।
‘मैं इन भेड़ियों को अच्छी तरह पहचानती हूं’
बातचीत के दौरान सलमा ने अपने जीवन के कुछ निजी अनुभवों का भी जिक्र किया। उन्होंने बताया कि उन्हें स्वयं भी कई अप्रिय घटनाओं का सामना करना पड़ा और उन्होंने अपनी लड़ाई खुद लड़ी।
अपने अनुभवों के आधार पर सलमा ने समाज में मौजूद उन लोगों से सतर्क रहने की अपील की, जो भरोसे, मदद, मार्गदर्शन या प्रभावशाली व्यक्तित्व की आड़ में महिलाओं और युवाओं का शोषण करने की कोशिश करते हैं।
उनके शब्दों में, “मैं इन भेड़ियों को बहुत अच्छी तरह पहचानती हूं।”
सलमा ने ऐसी घटनाओं का भी उल्लेख किया, जिनके बारे में महिलाएं अक्सर सामाजिक बदनामी, शर्मिंदगी या परिवार की प्रतिष्ठा के डर से खुलकर बात नहीं कर पातीं।
उन्होंने स्पष्ट संदेश दिया कि चुप्पी किसी समस्या का समाधान नहीं है। यदि किसी के साथ गलत हुआ है, तो उसे शर्म के बोझ तले दबाने के बजाय मदद, सुरक्षा और न्याय का रास्ता तलाशना चाहिए।
एक बड़े कारोबारी पर भी लगाया अनुचित व्यवहार का आरोप
सलमा ने बातचीत में एक बड़े कारोबारी से जुड़े अपने अनुभव का भी जिक्र किया। उनके मुताबिक, उस व्यक्ति ने कथित तौर पर उन्हें अनुचित तरीके से छूने की कोशिश की थी। हालांकि, बार-बार पूछे जाने के बावजूद उन्होंने उस कारोबारी का नाम सार्वजनिक नहीं किया।
सलमा ने इसकी वजह बताते हुए कहा कि उस व्यक्ति की पत्नी और बेटियां भी हैं और वह नहीं चाहतीं कि उनके परिवार पर इसका बुरा असर पड़े।
यह प्रसंग बातचीत का एक भावुक और विचारणीय पहलू बनकर सामने आया। अपने साथ कथित तौर पर गलत व्यवहार किए जाने की बात कहने वाली महिला का उस व्यक्ति के परिवार के प्रति संवेदनशील रहना एक मानवीय पक्ष को सामने लाता है।
लेकिन यहां एक बुनियादी सवाल भी है—क्या किसी के परिवार की चिंता करते हुए पीड़िता को अपने साथ हुई कथित घटना पर चुप रहना चाहिए, या न्याय और जवाबदेही का रास्ता अपनाना चाहिए? किसी भी मामले में आरोपों की निष्पक्ष जांच और सभी संबंधित पक्षों के अधिकारों का सम्मान जरूरी है।
जेन-Z और युवाओं के लिए सलमा की चेतावनी
सलमा ने खास तौर पर जेन-Z और युवाओं को सोशल मीडिया के इस्तेमाल में सतर्क रहने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि ऑनलाइन दुनिया में हर व्यक्ति वैसा नहीं होता, जैसा वह खुद को पेश करता है।
दोस्ती, प्रेम, करियर, मदद या किसी बड़े अवसर का लालच देकर लोगों को अपने जाल में फंसाने की कोशिश की जा सकती है। ऐसे में बिना जांच-पड़ताल किसी पर आंख बंद करके भरोसा करना भारी पड़ सकता है।
सलमा का संदेश है कि किसी भी मुलाकात, ऑनलाइन संपर्क या निजी संबंध में अपनी सुरक्षा को प्राथमिकता दें। किसी व्यक्ति के दबाव में आकर निजी तस्वीरें साझा करना, अनजान जगह पर जाना या अपने परिवार और भरोसेमंद लोगों से संपर्क तोड़ना खतरनाक साबित हो सकता है।
उनके मुताबिक, एक गलत निर्णय जिंदगी पर गहरा असर डाल सकता है। इसलिए सतर्कता, जागरूकता और समय रहते मदद मांगना बेहद जरूरी है।
बच्चों से अपील—अपने माता-पिता और शिक्षकों को बताएं
सलमा ने बच्चों और किशोरों को भी एक महत्वपूर्ण संदेश दिया। उन्होंने कहा कि बच्चों को अपने माता-पिता या भरोसेमंद शिक्षकों को बताना चाहिए कि वे कहां जा रहे हैं और किसके साथ हैं।
उनका मानना है कि हर बात को गुप्त रखने की आदत कई बार बच्चों को मुश्किल परिस्थितियों में डाल सकती है। यदि कोई व्यक्ति उन्हें डराता है, धमकाता है, गलत तरीके से छूता है या किसी बात को छिपाकर रखने के लिए दबाव बनाता है, तो बच्चों को तुरंत किसी भरोसेमंद वयस्क से बात करनी चाहिए।
यह समझना जरूरी है कि बच्चे की सुरक्षा के लिए संवाद और विश्वास का माहौल होना चाहिए, न कि ऐसा डर जिसमें बच्चा अपनी परेशानी बताने से भी घबराए।
‘अंधभक्ति में लोग अपने गुरुओं के जाल में फंस जाते हैं’
सलमा ने उन प्रभावशाली व्यक्तियों पर भी सवाल उठाए, जिनके अनुयायी उन पर बिना सवाल किए भरोसा कर लेते हैं। उन्होंने चेताया कि किसी गुरु, मार्गदर्शक या प्रतिष्ठित व्यक्ति के प्रति अंधविश्वास व्यक्ति को शोषण के खतरे के प्रति असावधान बना सकता है।
उनके अनुसार, किसी व्यक्ति की लोकप्रियता, पद, धन या धार्मिक-सामाजिक प्रतिष्ठा उसके चरित्र का प्रमाण नहीं है। हर व्यक्ति के व्यवहार को विवेक और तथ्यों के आधार पर परखना चाहिए।
यह संदेश केवल महिलाओं के लिए नहीं, बल्कि उन सभी लोगों के लिए है जो किसी प्रभावशाली व्यक्ति पर भरोसा करते हैं।
महिला सुरक्षा के लिए कानून के साथ संवेदनशीलता भी जरूरी
सलमा की बातचीत ने महिला सुरक्षा से जुड़ी कई बुनियादी चुनौतियों को सामने रखा—पीड़िताओं के प्रति संवेदनहीनता, शिकायतों पर कार्रवाई, अधिकारियों की जवाबदेही, सामाजिक बदनामी का डर और युवाओं की डिजिटल सुरक्षा।
कानून तभी प्रभावी साबित होते हैं, जब उन्हें लागू करने वाले लोग अपनी जिम्मेदारी समझें। पीड़िता की बात गंभीरता से सुनना, उसकी निजता की रक्षा करना, निष्पक्ष जांच करना और उसे न्याय की प्रक्रिया में सम्मान देना किसी भी संवेदनशील व्यवस्था की बुनियादी जिम्मेदारियां हैं।
साथ ही, किसी भी आरोप की जांच निष्पक्ष होनी चाहिए और दोष तय करने की प्रक्रिया कानून के अनुरूप चलनी चाहिए।
सलमा के अनुभव एक बड़े सामाजिक सवाल की ओर इशारा करते हैं—क्या हम ऐसा माहौल बना पाए हैं, जहां पीड़िता बिना डर के अपनी बात कह सके? क्या प्रशासन उसके साथ खड़ा होता है, या उसे ही अपने चरित्र और फैसलों का हिसाब देना पड़ता है?
महिला सुरक्षा का असली पैमाना केवल दर्ज मामलों या बनाए गए कानूनों की संख्या नहीं, बल्कि यह भी है कि संकट में फंसी महिला को कितनी जल्दी मदद, कितना सम्मान और कितना न्याय मिलता है।
सलमा की अपील साफ है—जागरूक बनिए, गलत के खिलाफ आवाज उठाइए और अपने आसपास के लोगों को सुरक्षित रहने के लिए प्रेरित कीजिए। क्योंकि किसी भी सभ्य समाज में पीड़िता को शर्मिंदा नहीं, बल्कि न्याय और सम्मान मिलना चाहिए।
Disclaimer: The views expressed are of social activist Salma Francis – The news agency does not give any editorial opinion on this.




