ड्रामाटर्जी ग्रुप ने दिखाई हिज़ड़ा समाज की त्रासदी

नई दिल्ली, 05 मई (वेब वार्ता)। राजधानी के श्री राम सेंटर, मंडी हाउस में ड्रामाटर्जी आर्ट्स एंड कल्चर सोसाइटी द्वारा प्रस्तुत नाटक ‘जानेमन’ ने हिजड़ा समुदाय के जीवन की त्रासदी को मंच पर जीवंत कर दर्शकों को गहराई तक प्रभावित किया। मछिंद्र मौर्य द्वारा लिखित इस नाटक का निर्देशन सुनील चौहान और साक्षी ने किया, जिसमें कलाकारों के प्रभावशाली अभिनय ने दर्शकों को भावनात्मक रूप से बांध दिया।

नाटक ‘जानेमन’ समाज के उस कटु सत्य को उजागर करता है, जो अक्सर हंसी-मजाक के पीछे छिपा रह जाता है। इसमें दिखाया गया है कि हिजड़ा समुदाय के अधिकांश लोग जन्म से ऐसे नहीं होते, बल्कि परिस्थितियों और सामाजिक दबावों के कारण उन्हें इस जीवन में धकेल दिया जाता है। यह थोपे गए अस्तित्व की वेदना और उससे उपजे मानसिक, सामाजिक और शारीरिक संघर्ष को बेहद संवेदनशील ढंग से प्रस्तुत करता है।

‘जानेमन’ नाटक के मंचन का दृश्य, कलाकार भावनात्मक अभिनय करते हुए कहानी का केंद्र मुकेश नामक एक युवक है, जो स्त्री जीवन के आकर्षण में अखाड़े तक पहुंचता है। वहां नज्जो और पन्ना उसे अपनाते हैं और धीरे-धीरे वह ‘नगीना’ बन जाता है। शुरुआत में उसे अपनापन और स्नेह मिलता है, लेकिन समय के साथ वह शोषण, यातना और धोखे का शिकार बनता है। उसकी शादी, शारीरिक परिवर्तन और अंततः मानसिक टूटन समाज की कठोर सच्चाइयों को सामने लाती है।

नाटक यह भी स्पष्ट करता है कि हिजड़ा समुदाय की शारीरिक स्थिति कृत्रिम रूप से निर्मित हो सकती है, लेकिन उनकी वास्तविक पीड़ा समाज द्वारा स्वीकार्यता न मिलने और पहचान के संघर्ष से उपजती है। वे जीविका के लिए नाचते-गाते हैं, परंतु भीतर गहरे दर्द और सम्मान की आकांक्षा छिपी होती है।

‘जानेमन’ नाटक के मंचन का दृश्य, कलाकार भावनात्मक अभिनय करते हुएमुख्य भूमिकाओं में दीपक कुमार, मनीष शर्मा, देवांश, सागर साहू, दिवाकर दुबे और अभिषेक यादव ने प्रभावशाली अभिनय किया। सहायक कलाकारों में दुर्गेश कुमार, काजल, राधिका, नितिन, रित्विक उपाध्यक्ष, प्रदीप कुमार, अंश और विजयलक्ष्मी शामिल रहे। नाटक का जीवंत संगीत सौरव सक्सेना, अभ्युदय मिश्रा, कृष चौहान और प्रियांशु त्यागी ने प्रस्तुत किया, जबकि रिकॉर्ड संगीत साक्षी और प्रकाश व्यवस्था का दायित्व सुनील चौहान ने संभाला।

प्रस्तुति के अंत में दर्शक भावुक नजर आए और कलाकारों व निर्देशकों की सराहना करते हुए लंबे समय तक तालियां बजाते रहे। ‘जानेमन’ केवल एक नाटक नहीं, बल्कि समाज के लिए एक सशक्त संदेश है कि किसी भी व्यक्ति की पहचान उसके शरीर से नहीं, बल्कि उसके जीने के अधिकार और सम्मान से तय होती है।

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