मुंबई, 23 मई (वेब वार्ता)। मुंबई के बांद्रा पूर्व स्थित गरीब नगर में चल रही झुग्गी हटाओ कार्रवाई के बीच पूर्व सांसद और अभिनेता सुनील दत्त एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गए हैं। रेलवे भूमि पर बनी झुग्गियों को हटाने की कार्रवाई से प्रभावित लोगों के बीच दत्त की यादें ताजा हो गई हैं। स्थानीय निवासियों का कहना है कि दत्त साहब के दौर में झुग्गीवासियों की आवाज को राजनीतिक संरक्षण मिलता था और प्रशासनिक कार्रवाई के समय वे खुलकर उनके साथ खड़े दिखाई देते थे।
गरीब नगर में पश्चिम रेलवे द्वारा अदालत की अनुमति के बाद बड़े स्तर पर अतिक्रमण हटाओ अभियान चलाया जा रहा है। इस कार्रवाई के तहत सैकड़ों झुग्गियों को हटाया गया है और रेलवे भूमि खाली कराई जा रही है। अधिकारियों का कहना है कि यह जमीन रेलवे विस्तार और नई रेल लाइनों के विकास के लिए आवश्यक है।
पश्चिम रेलवे के अनुसार यह अभियान न्यायालय के निर्देशों के अनुरूप चलाया जा रहा है। उच्च न्यायालय ने अवैध ढांचों को हटाने की अनुमति देते हुए पात्र झुग्गीवासियों के हितों की सुरक्षा पर भी जोर दिया था। रेलवे प्रशासन का दावा है कि कार्रवाई केवल उन्हीं ढांचों पर की जा रही है जिन्हें सर्वेक्षण में अवैध पाया गया है।
बताया जा रहा है कि गरीब नगर से खाली कराई जा रही जमीन का उपयोग सांताक्रूज-मुंबई सेंट्रल रेल गलियारे के विस्तार और बांद्रा टर्मिनस के विकास के लिए किया जाएगा। रेलवे अधिकारियों के अनुसार इस परियोजना से भविष्य में लगभग 50 नई ट्रेनों के संचालन का मार्ग प्रशस्त होगा और मुंबई की उपनगरीय रेल व्यवस्था को राहत मिलेगी।
इसी कार्रवाई के बीच सुनील दत्त की राजनीतिक विरासत पर भी चर्चा तेज हो गई है। वर्ष 1984 में राजनीति में आने के बाद पांच बार सांसद रहे दत्त की पहचान केवल अभिनेता के रूप में नहीं, बल्कि झुग्गी बस्तियों के समर्थक नेता के रूप में भी बनी थी। बांद्रा और आसपास के कई झुग्गीवासी आज भी उन्हें ऐसा नेता मानते हैं जो विस्थापन और बुलडोजर कार्रवाई के समय उनके पक्ष में आवाज उठाते थे।
सुनील दत्त से जुड़ा ‘नरगिस दत्त नगर’ भी उनकी इसी छवि का प्रतीक माना जाता है। पत्नी नरगिस दत्त के निधन के बाद उनके नाम पर बसाई गई यह बस्ती समय के साथ बड़ा सामाजिक और राजनीतिक केंद्र बन गई। हालांकि, उनकी इस राजनीति को लेकर मतभेद भी रहे। एक वर्ग उन्हें गरीबों का संरक्षक मानता रहा, जबकि आलोचकों का आरोप था कि इससे अतिक्रमण और अवैध निर्माण को बढ़ावा मिला।
गरीब नगर में जारी कार्रवाई को लेकर स्थानीय लोगों में नाराजगी भी देखने को मिल रही है। कई परिवारों का कहना है कि वर्षों से वहां रहने और पहचान संबंधी दस्तावेज होने के बावजूद उन्हें विस्थापन का सामना करना पड़ रहा है। कुछ स्थानों पर विरोध और तनाव की घटनाएं भी सामने आई हैं।
राजनीतिक और सामाजिक बहस के बीच एक तथ्य स्पष्ट है कि सुनील दत्त के निधन के दो दशक बाद भी बांद्रा की राजनीति और झुग्गी बस्तियों की स्मृतियों में उनका प्रभाव कायम है। गरीब नगर के मलबे और विस्थापन की पीड़ा के बीच कई लोग आज भी उन्हें उस दौर की पहचान के रूप में याद कर रहे हैं, जब उनके अनुसार कोई नेता उनके साथ खड़ा नजर आता था।




