डॉलर के मुकाबले रुपया रिकॉर्ड गिरावट पर, 95 तक पहुंचने की आशंका; अर्थव्यवस्था पर खतरे के संकेत

नई दिल्ली, डेस्क | वेब वार्ता

मिडिल ईस्ट में युद्ध जैसे हालात और कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल के बीच भारतीय रुपया लगातार दबाव में है। 18 मार्च को रुपया गिरकर अमेरिकी डॉलर के मुकाबले अपने अब तक के सबसे निचले स्तर 92.62 पर पहुंच गया। वैश्विक निवेश बैंक गोल्डमैन सैक्स के अनुसार, यदि मौजूदा हालात जारी रहे तो रुपया अगले वर्ष 95 प्रति डॉलर तक कमजोर हो सकता है, जो भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर संकेत माना जा रहा है।

रुपये में लगातार गिरावट, RBI कर रहा हस्तक्षेप

पिछले एक महीने में ही रुपये में करीब 1.77 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। बाजार में अस्थिरता को देखते हुए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) लगातार हस्तक्षेप कर रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक, एक ही सप्ताह में आरबीआई ने लगभग 18 से 20 अरब डॉलर की बिक्री कर रुपये को संभालने की कोशिश की है, लेकिन वैश्विक दबाव के चलते स्थिति चुनौतीपूर्ण बनी हुई है।

रुपये पर दबाव के प्रमुख कारण

कारणप्रभाव
विदेशी निवेश निकासी5.5 अरब डॉलर निकाले गए
शेयर बाजार गिरावटनिफ्टी 50 में ~8% गिरावट
तेल कीमतों में उछालआयात बिल बढ़ा
भू-राजनीतिक तनावडॉलर की मांग बढ़ी

मार्च महीने में विदेशी निवेशकों ने करीब 5.5 अरब डॉलर भारतीय इक्विटी बाजार से निकाल लिए, जिससे बाजार पर दबाव बढ़ा और रुपया कमजोर हुआ। 17 मार्च को रुपया 92.41 तक पहुंचा और बाद में 92.46 पर बंद हुआ, जो पिछले 12 महीनों में लगभग 6.75 प्रतिशत की गिरावट दर्शाता है।

  • रुपया 92.62 के ऐतिहासिक निचले स्तर पर पहुंचा
  • एक महीने में 1.77% की गिरावट
  • आरबीआई ने 20 अरब डॉलर तक की बिक्री की

95 प्रति डॉलर तक गिरने का अनुमान

गोल्डमैन सैक्स के अर्थशास्त्री शांतनु सेनगुप्ता के अनुसार, अमेरिकी-इजरायल तनाव और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के संभावित बंद होने से चालू खाते के घाटे में वृद्धि हो सकती है। इसी आधार पर रुपये के 95 प्रति डॉलर तक गिरने की आशंका जताई गई है।

ग्रोथ और महंगाई पर संभावित असर

आर्थिक संकेतकनया अनुमान
जीडीपी वृद्धि दर (FY27)7.0% से घटकर 6.5%
महंगाई दर+30 बेसिस प्वाइंट
चालू खाता घाटा (CAD)0.8% बढ़कर 1.2% GDP

रिपोर्ट के अनुसार, रुपये की कमजोरी का असर देश की आर्थिक वृद्धि पर भी पड़ सकता है। जीडीपी ग्रोथ रेट को 7% से घटाकर 6.5% किया गया है, जबकि महंगाई बढ़ने और चालू खाता घाटा बढ़ने की संभावना जताई गई है।

निष्कर्ष

रुपये की लगातार गिरावट केवल मुद्रा बाजार की समस्या नहीं है, बल्कि यह व्यापक आर्थिक दबाव का संकेत है। वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव, बढ़ती तेल कीमतें और विदेशी निवेश की निकासी मिलकर भारतीय अर्थव्यवस्था पर दबाव बना रहे हैं। यदि हालात नहीं सुधरे, तो आने वाले समय में महंगाई और आर्थिक वृद्धि दोनों प्रभावित हो सकती हैं।


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