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नैतिकता नहीं,भारी युवा आक्रोश के चलते हुआ शिक्षा मंत्री का इस्तीफ़ा

-तनवीर जाफ़री- Tanvir Jafri

केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े की मांग को लेकर दिल्ली के जंतर मंतर पर चल रहा छात्रों व युवाओं का आंदोलन अभी लगभग पूरे देश में फैलता ही जा रहा था कि गत शनिवार सरकार को उन्हें पद से हटाना ही पड़ गया। आंदोलित छात्रों को केवल विपक्ष या अन्य तमाम सेलेब्रिटीज़ का ही समर्थन नहीं मिला बल्कि उन्हें भाजपा के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व केंद्रीय शिक्षा मंत्री मुरली मनोहर जोशी का भी समर्थन हासिल हुआ। जोशी ने छात्र आंदोलन को अपना समर्थन देते हुये कहा था कि ‘महिलाओं और कम उम्र की लड़कियों के साथ बेरहमी से बुरा व्यवहार किया गया, जिससे उन्हें गहरा दुख हुआ। उन्होंने कहा कि छात्र कई दिनों से नई दिल्ली की सड़कों पर हैं और उनकी चिंताएँ वाजिब हैं, जिनका समाधान सहानुभूति और संवाद के माध्यम से होना चाहिए था, न कि केवल क़ानून-व्यवस्था का मामला मानकर बल प्रयोग से’। परन्तु अहंकारी सत्ता ने समय रहते शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को हटाने की उनकी मांग पूरी करने के बजाय पुलिस बल का प्रयोग कर उन्हें भयभीत करने की रणनीति अपनाई। और आख़िरकार पुलिस की दमनकारी नीति सरकार को और भारी पड़ गयी।

सवाल यह है कि जिस धर्मेंद्र प्रधान के जुलाई 2021 से जुलाई 2026 तक के शिक्षा मंत्री के कार्यकाल के दौरान देश में अलग-अलग स्तरों पर लगभग 70 से 80 बार पेपर लीक के मामले सामने आए हैं। जिस धर्मेंद्र प्रधान के शिक्षा मंत्री मंत्री रहते विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं (विशेषकर NEET और UGC-NET) में हुई पेपर लीक की घटनाओं और उनके मानसिक तनाव के कारण और उसके बाद उनके भविष्य को लेकर पैदा हुई अनिश्चितता के चलते पिछले कुछ हफ़्तों में ही 21 छात्रों ने आत्महत्या कर ली। और देश के करोड़ों छात्रों का भविष्य सीधे तौर पर प्रभावित हुआ,केवल NEET परीक्षा के पेपर लीक, परिणाम रद्द होने और री-टेस्ट (Re-exam) के कारण अकेले 22 लाख से अधिक (2.2 मिलियन) छात्रों का भविष्य अधर में लटक गया और उन्हें दोबारा भीषण मानसिक तनाव में परीक्षा की तैयारी करनी पड़ी। इसी तरह UGC-NET परीक्षा,डार्क नेट पर पेपर लीक होने की वजह से रातों-रात परीक्षा रद्द होने के कारण 9 लाख से अधिक छात्रों का कैरियर सीधे प्रभावित हुआ। ऐसे शिक्षा मंत्री को हटाने में सरकार को आख़िर इतना समय क्यों लगा?

दरअसल धर्मेंद्र प्रधान बचपन से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा और उसकी सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधियों से गहराई से जुड़े रहे हैं। उनका पूरा राजनीतिक और सामाजिक आधार संघ से ही प्रेरित रहा है। धर्मेंद्र प्रधान के पिता डॉ. देबेंद्र प्रधान ओडिशा में भाजपा के शुरुआती नेताओं में से थे और स्वयं संघ के आजीवन कार्यकर्ता रहे। डॉ. देबेंद्र प्रधान 1998-2004 के मध्य वाजपेयी सरकार में केंद्रीय राज्य मंत्री भी रहे । जुलाई 2021 में जब धर्मेंद्र प्रधान को केंद्रीय शिक्षा मंत्री के पद की ज़िम्मेदारी दी गई, तो उन्होंने देश की राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) को लागू करने पर अपना पूरा ध्यान केंद्रित किया। इस दौरान उन्होंने पाठ्यपुस्तकों की समीक्षा कर भारतीय महापुरुषों और स्वदेशी इतिहास को प्रमुखता से शामिल करने का कार्य किया, जिसे संघ के सांस्कृतिक और शैक्षिक दृष्टिकोण के अनुकूल माना जाता है।

धर्मेंद्र प्रधान के शिक्षा मंत्री रहते हुए, राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) और नए नेशनल Curriculum फ़्रेम वर्क (NCF-SE 2023) के तहत स्कूली पाठ्यक्रमों (विशेषकर NCERT किताबों) में व्यापक बदलाव किए गए। इसमें वेदों, प्राचीन भारतीय ग्रंथों, पारंपरिक ज्ञान, प्राचीन खगोल विज्ञान और भारत की समृद्ध गणितीय विरासत (जैसे प्राचीन गणितज्ञों के योगदान) से जुड़े संदर्भों को पाठ्यक्रम में शामिल किया गया। कक्षा 6 से ही कोडिंग, वित्तीय साक्षरता,कृत्रिम बुद्धिमत्ता, और स्थानीय शिल्पकला (जैसे मिट्टी के बर्तन बनाना, बाग़बानी आदि) जैसे व्यावहारिक विषयों को मुख्य पाठ्यक्रम में जोड़ा गया। स्कूली स्तर पर स्वास्थ्य, कल्याण और योग को शारीरिक शिक्षा के अनिवार्य और मुख्य मूल्यांकन का हिस्सा बनाया गया। इसी तरह NCERT की कक्षा 6 से 12वीं तक की किताबों से पाठ्यक्रम का लगभग 30% हिस्सा हटा दिया गया, जिसे लेकर काफ़ी विवाद भी हुआ। इतिहास की किताबों (विशेषकर कक्षा 12वीं) से ‘मुग़ल दरबार’, मुग़ल शासकों के इतिहास और उनके प्रशासनिक तौर-तरीक़ों से जुड़े कुछ विस्तृत अध्यायों और अंशों को हटाया या छोटा किया गया।

सामाजिक विज्ञान की किताबों से 2002 के गुजरात दंगे, देश में लागू हुआ आपातकाल, नक्सली आंदोलन और शीत युद्ध के दौर से जुड़े कई महत्वपूर्ण संदर्भों और अध्यायों को पूरी तरह हटा दिया गया। कक्षा 9वीं और 10वीं की विज्ञान की किताबों से जीवों के विकास के सिद्धांत यानी ‘डार्विन का सिद्धांत’ और आवर्त सारणी (Periodic Table) के कुछ बुनियादी अध्यायों को मुख्य पाठ्यक्रम से हटाया गया। कक्षा 10वीं के नागरिक शास्त्र से ‘लोकतंत्र और विविधता’, ‘लोकप्रिय संघर्ष और आंदोलन’ तथा ‘लोकतंत्र की चुनौतियां’ जैसे अध्यायों को पाठ्यक्रम से बाहर किया गया। उस समय शिक्षा मंत्रालय और NCERT ने इन बदलावों पर स्पष्टीकरण देते हुए कहा था कि यह बदलाव विशेषज्ञों की राय, विभिन्न स्तरों पर पाठों के दोहराव को रोकने और छात्रों को आधुनिक समय की ज़रूरतों के अनुरूप तैयार करने के लिए किए गए हैं, न कि किसी राजनीतिक एजेंडे के तहत।

शायद यही वजह थी कि संघ के एजेंडे को लागू करने वाली नई शिक्षा नीति के कार्यान्वन के मध्य सरकार प्रधान को हटाना नहीं चाह रही थी। परन्तु अब राजनीतिक गलियारों में अपुष्ट रूप से यह चर्चा भी हो रही है कि युवा आंदोलन के मध्य संघ प्रमुख मोहन भागवत द्वारा सरकार को युवाओं के साथ ‘संवाद और संवेदनशीलता’ बरतने के दिए गए हालिया सुझाव के बाद ही सरकार ने उन्हें मंत्रिमंडल से हटाने का फ़ैसला किया है। बहरहाल शिक्षा मंत्री के इस्तीफ़े के बाद देश भर में युवाओं में दौड़ती ख़ुशी के लहर इस बात का सुबूत है कि धर्मेंद्र प्रधान ने नैतिकता के चलते नहीं बल्कि भारी युवा आक्रोश के चलते शिक्षा मंत्री के पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा है जिसे देश की युवा शक्ति अपनी बड़ी सफलता और जीत के रूप में देख रही है।

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