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घटना के बाद कड़ी कार्रवाई की घोषणा

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— लक्ष्मीकान्त पाठक —

हमारे समय की सबसे सफल संस्था यदि कोई है, तो वह घोषणा है। घोषणा कभी थकती नहीं, कभी असफल नहीं होती, कभी कटघरे में नहीं खड़ी की जाती। हर दुर्घटना, हर घोटाले, हर लापरवाही और हर सार्वजनिक विफलता के बाद वह नए वस्त्र पहनकर फिर मंच पर आ जाती है।

जैसे ही कोई घटना घटती है, सत्ता की भाषा तुरंत सक्रिय हो जाती है। सबसे पहले दुख व्यक्त किया जाता है, फिर दोषियों को बख्शे न जाने का संकल्प दोहराया जाता है और अंत में “कड़ी कार्रवाई” का ऐसा दीप प्रज्वलित किया जाता है, जिसकी रोशनी कैमरों तक तो पहुँचती है, लेकिन अक्सर न्याय की चौखट तक नहीं।

घोषणाएँ हमारे लोकतंत्र की सबसे अनुशासित कर्मचारी हैं। वे कभी हड़ताल नहीं करतीं, कभी छुट्टी नहीं माँगतीं। पुल गिरे तो घोषणा, अस्पताल में अव्यवस्था मिले तो घोषणा, परीक्षा का प्रश्नपत्र लीक हो जाए तो घोषणा, किसी कार्यालय में भ्रष्टाचार पकड़ा जाए तो घोषणा। मानो शासन का सबसे प्रभावी विभाग वही हो, जहाँ शब्द तैयार किए जाते हैं।

जनता भी अब इस व्यवस्था की अनुभवी दर्शक बन चुकी है। उसे मालूम है कि घटना से पहले लापरवाही थी, घटना के बाद संवेदना होगी और फिर जाँच का लंबा गलियारा शुरू होगा, जहाँ फाइलें चलती कम और समय अधिक चलता है।

सबसे रोचक बात यह है कि इस पूरे नाटक का कोई स्थायी खलनायक नहीं होता। पात्र बदलते रहते हैं, संवाद वही रहते हैं। हर नया अधिकारी अपने पूर्ववर्ती की भाषा विरासत में पाता है और हर नई सरकार पुराने आश्वासनों को नए शब्दों में दोहराती है। लोकतंत्र आगे बढ़ता रहता है, घोषणाएँ उससे भी तेज़ चलती रहती हैं।

कभी-कभी लगता है कि हमारे यहाँ न्याय से अधिक उसका विज्ञापन विकसित हुआ है, उत्तरदायित्व से अधिक उसका प्रचार और परिणाम से अधिक उसकी प्रस्तावना। इसलिए घोषणाएँ इतिहास में दर्ज होती हैं, जबकि कार्रवाई अक्सर फाइलों की धूल में अपना पता खो देती है।

विडंबना यह है कि “कड़ी कार्रवाई” हमारे सार्वजनिक जीवन का सबसे अधिक प्रयुक्त और सबसे कम सिद्ध होने वाला वाक्यांश बन चुका है। यह हर संकट के बाद सुनाई देता है, पर बहुत कम अवसरों पर अपने अंतिम परिणाम तक पहुँचता है। यदि कार्रवाई सचमुच कड़ी होती, तो शायद हर नई त्रासदी के बाद वही पुरानी घोषणा दोहराने की आवश्यकता ही न पड़ती।

लोकतंत्र का सौंदर्य केवल चुनावों में नहीं, बल्कि प्रश्न पूछने की संस्कृति में है। जिस दिन नागरिक प्रश्न पूछना छोड़ देगा और केवल घोषणाएँ सुनकर संतुष्ट हो जाएगा, उसी दिन शब्द शासन करने लगेंगे और सच नागरिकता खो देगा।

(लक्ष्मीकांत पाठक, वरिष्ठ पत्रकार)

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