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वैश्विक कूटनीति से तीसरी महाशक्ति बनने की ओर बढ़ता भारत

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-कांतिलाल मांडोत- Kantilal Mandot
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी  की नॉर्वे और स्वीडन यात्रा ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत अब केवल क्षेत्रीय शक्ति नहीं, बल्कि वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था का निर्णायक केंद्र बनने की दिशा में तेज़ी से आगे बढ़ रहा है। ओस्लो में नॉर्वे के प्रधानमंत्री योनास स्टोर के साथ हुई वार्ता के बाद भारत और नॉर्वे ने अपने संबंधों को “ग्रीन स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप” तक विस्तारित करने की घोषणा की। इसके तहत हरित ऊर्जा, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, अंतरिक्ष अनुसंधान, डिजिटल हेल्थ, ब्लू इकोनॉमी, समुद्री सुरक्षा और जलवायु निगरानी जैसे क्षेत्रों में व्यापक सहयोग पर सहमति बनी। नॉर्वे की अंतरिक्ष एजेंसी और इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन के बीच हुए समझौते ने अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में नई संभावनाओं के द्वार खोले हैं।
इस यात्रा का सबसे बड़ा आकर्षण तब बना जब नॉर्वे के राजा हेराल्ड पंचम ने प्रधानमंत्री मोदी को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान “ग्रैंड क्रॉस ऑफ द रॉयल नॉर्वेजियन ऑर्डर ऑफ मेरिट” से सम्मानित किया। यह सम्मान नॉर्वे के अंतरराष्ट्रीय संबंधों को मजबूत करने और वैश्विक नेतृत्व में योगदान के लिए दिया जाता है। यह प्रधानमंत्री मोदी का 32वां अंतरराष्ट्रीय सम्मान बन गया है। इससे पहले स्वीडन ने भी उन्हें “रॉयल ऑर्डर ऑफ द पोलर स्टार कमांडर ग्रैंड क्रॉस” से सम्मानित किया था।
प्रधानमंत्री मोदी ने हर बार की तरह इस सम्मान को व्यक्तिगत उपलब्धि न बताते हुए 140 करोड़ भारतीयों का सम्मान कहा। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यह पुरस्कार भारत की जनता, भारतीय लोकतंत्र, संस्कृति और वैश्विक शांति के प्रति भारत की प्रतिबद्धता का सम्मान है। पिछले वर्षों में संयुक्त अरब अमीरात, फ्रांस, रूस, अमेरिका, सऊदी अरब, फिलिस्तीन, मिस्र, फिजी, पापुआ न्यू गिनी, ग्रीस, ब्राजील और अब नॉर्वे सहित अनेक देशों ने मोदी को अपने सर्वोच्च सम्मानों से अलंकृत किया है।
वर्ष 2014 में सत्ता संभालने के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने भारतीय विदेश नीति को नई गति दी। नेबरहुड फर्स्ट, एक्ट ईस्ट, इंडो-पैसिफिक,, ग्लोबल साउथ और “वसुधैव कुटुंबकम्” जैसे दृष्टिकोणों के माध्यम से भारत ने अपनी कूटनीतिक उपस्थिति को मजबूत किया। सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2014 से अब तक प्रधानमंत्री मोदी 85 से अधिक देशों की यात्राएं कर चुके हैं। कई देशों में किसी भारतीय प्रधानमंत्री की यह पहली यात्रा रही।
पीएम मोदी इन यात्राओं का प्रभाव केवल कूटनीतिक तस्वीरों तक सीमित नहीं रहा। भारत का वैश्विक व्यापार लगातार बढ़ा है। 2013-14 में भारत का कुल व्यापार लगभग 760 अरब डॉलर के आसपास था, जो अब बढ़कर 1.6 ट्रिलियन डॉलर के करीब पहुंच चुका है। भारत का निर्यात भी रिकॉर्ड स्तर तक पहुंचा है। पेट्रोलियम, फार्मास्यूटिकल्स, मोबाइल निर्माण, रक्षा उपकरण, आईटी सेवाएं और इंजीनियरिंग उत्पादों के निर्यात में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। वहीं ऊर्जा सुरक्षा के लिए भारत ने खाड़ी देशों, रूस और यूरोप के साथ बड़े समझौते किए हैं।
संयुक्त अरब अमीरात के साथ हुए समझौते इसका बड़ा उदाहरण हैं। हाल की यात्रा में भारत और यूएई ने रक्षा, ऊर्जा, एलपीजी आपूर्ति, साइबर सुरक्षा और समुद्री सहयोग के क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण करार किए। यूएई की कंपनी एडीएनओसी भारत में रणनीतिक तेल भंडारण क्षमता बढ़ाने पर सहमत हुई है। इससे भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूती मिलेगी।
स्वीडन यात्रा के दौरान भारत और स्वीडन ने एआइ कॉरिडोर बनाने, इनोवेशन साझेदारी बढ़ाने, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी केंद्र स्थापित करने और अगले पांच वर्षों में व्यापार तथा निवेश को दोगुना करने पर सहमति व्यक्त की। यह केवल आर्थिक समझौता नहीं बल्कि भविष्य की तकनीकी दुनिया में भारत की भूमिका को मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है। भारत आज दुनिया का सबसे तेजी से बढ़ता डिजिटल बाजार बन चुका है और एआइ तथा सेमीकंडक्टर क्षेत्र में भी वैश्विक निवेश आकर्षित कर रहा है।
प्रधानमंत्री मोदी की विदेश नीति का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि उन्होंने भारत को “तीसरी महाशक्ति” के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया है। दुनिया लंबे समय तक अमेरिका और चीन के बीच शक्ति संतुलन पर केंद्रित रही, लेकिन भारत ने अब स्वतंत्र वैश्विक धुरी बनने की दिशा में अपनी पहचान बनाई है। रूस-यूक्रेन युद्ध हो या पश्चिम एशिया संकट, भारत ने संतुलित और रणनीतिक नीति अपनाई है। यही कारण है कि अमेरिका, रूस, यूरोप, अरब देश और अफ्रीकी राष्ट्र सभी भारत को महत्वपूर्ण साझेदार मान रहे हैं।
भारत आज क्वाड, जी-20, ब्रिक्स, शंघाई सहयोग संगठन और ग्लोबल साउथ जैसे मंचों पर निर्णायक भूमिका निभा रहा है। जी-20 की अध्यक्षता के दौरान भारत ने अफ्रीकी संघ को स्थायी सदस्यता दिलाकर विकासशील देशों की आवाज को वैश्विक मंच पर नई ताकत दी। यही वजह है कि प्रधानमंत्री मोदी को लगातार अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिल रहे हैं।
प्रधानमंत्री मोदी की विदेश यात्राओं के दौरान केवल राजनीतिक समझौते ही नहीं हुए, बल्कि निवेश, रक्षा उत्पादन, डिजिटल पेमेंट, हरित ऊर्जा और स्टार्टअप सहयोग जैसे क्षेत्रों में भी बड़ी उपलब्धियां हासिल हुईं। यूपीआई को वैश्विक स्तर पर ले जाने के प्रयासों में नॉर्वे और अन्य यूरोपीय देशों के साथ त्रिपक्षीय सहयोग समझौते महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं। भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था अब वैश्विक मॉडल बनती जा रही है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि मोदी सरकार की विदेश नीति का सबसे बड़ा प्रभाव यह रहा कि भारत की वैश्विक छवि बदली है। पहले भारत को केवल एक विकासशील देश के रूप में देखा जाता था, लेकिन अब उसे टेक्नोलॉजी, अंतरिक्ष, स्वास्थ्य, डिजिटल नवाचार और हरित ऊर्जा के क्षेत्र में विश्वसनीय साझेदार माना जा रहा है। कोविड महामारी के दौरान वैक्सीन मित्र अभियान और संकटग्रस्त देशों को सहायता पहुंचाने की नीति ने भी भारत की साख को मजबूत किया।
नॉर्वे और स्वीडन सहित यूरोप के देशों के साथ हुए नए समझौते आने वाले वर्षों में भारत की अर्थव्यवस्था, तकनीकी क्षमता और वैश्विक प्रभाव को नई ऊंचाई देने वाले साबित हो सकते हैं। भारत अब केवल दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र नहीं, बल्कि तेजी से उभरती आर्थिक और रणनीतिक शक्ति भी बन रहा है। प्रधानमंत्री मोदी की कूटनीतिक सक्रियता ने यह संकेत दे दिया है कि आने वाले दशक में भारत विश्व राजनीति की दिशा तय करने वाले देशों में शामिल होगा।
भारत की विदेश नीति और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हालिया नॉर्वे-स्वीडन यात्रा को केंद्र में रखकर लिखा गया यह विश्लेषण भारत की बदलती वैश्विक भूमिका को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करता है। इसमें यह स्पष्ट दिखाई देता है कि भारत अब केवल दक्षिण एशिया की क्षेत्रीय शक्ति नहीं रह गया, बल्कि वैश्विक राजनीति, अर्थव्यवस्था और तकनीकी नेतृत्व में अपनी निर्णायक उपस्थिति दर्ज करा रहा है।
नॉर्वे के साथ “ग्रीन स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप” का विस्तार केवल एक कूटनीतिक समझौता नहीं, बल्कि भविष्य की वैश्विक अर्थव्यवस्था में भारत की भूमिका का संकेत है। हरित ऊर्जा, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ब्लू इकोनॉमी, डिजिटल हेल्थ और अंतरिक्ष विज्ञान जैसे क्षेत्रों में सहयोग यह दर्शाता है कि भारत अब पारंपरिक राजनीति से आगे बढ़कर भविष्य की तकनीकों और सतत विकास के एजेंडे का केंद्र बनना चाहता है। इंडियन स्पेस Space रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन और नॉर्वे की अंतरिक्ष एजेंसी के बीच सहयोग भारत की अंतरिक्ष कूटनीति को नई ऊंचाई देता है।
प्रधानमंत्री मोदी को नॉर्वे और स्वीडन द्वारा दिए गए सर्वोच्च नागरिक सम्मान केवल व्यक्तिगत उपलब्धियां नहीं हैं, बल्कि भारत की बढ़ती वैश्विक प्रतिष्ठा के प्रतीक हैं। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की स्वीकार्यता अब केवल जनसंख्या या बाजार के कारण नहीं, बल्कि उसकी रणनीतिक क्षमता, स्थिर लोकतंत्र और संतुलित विदेश नीति के कारण बढ़ी है। यही कारण है कि यूरोप, अमेरिका, खाड़ी देश, रूस और अफ्रीका—सभी भारत को अपने विश्वसनीय साझेदार के रूप में देख रहे हैं।
वर्ष 2014 के बाद भारत की विदेश नीति में जो बदलाव आया, उसने देश की वैश्विक छवि को पूरी तरह बदल दिया। “नेबरहुड फर्स्ट, एक्ट ईस्ट इंडो-पैसिफिक और ग्लोबल साउथ जैसे दृष्टिकोणों ने भारत को बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में एक स्वतंत्र धुरी के रूप में स्थापित किया। रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया संकट जैसे जटिल मुद्दों पर भारत ने जिस संतुलित नीति का प्रदर्शन किया, उसने यह संदेश दिया कि भारत अब किसी एक शक्ति-गुट का अनुसरण करने वाला देश नहीं, बल्कि अपने हितों और वैश्विक स्थिरता के आधार पर निर्णय लेने वाली शक्ति है।
भारत की आर्थिक प्रगति भी इस कूटनीतिक सक्रियता से सीधे जुड़ी दिखाई देती है। पिछले दशक में भारत का व्यापार दोगुना होना, मोबाइल निर्माण, रक्षा निर्यात, फार्मास्यूटिकल्स और डिजिटल सेवाओं का तेजी से विस्तार, यह साबित करता है कि विदेश यात्राएं केवल औपचारिकता नहीं रहीं, बल्कि आर्थिक अवसरों का माध्यम बनी हैं। संयुक्त अरब अमीरात के साथ ऊर्जा और रणनीतिक तेल भंडारण समझौते भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करते हैं, वहीं स्वीडन के साथ एआइ और इनोवेशन साझेदारी भारत को भविष्य की तकनीकी प्रतिस्पर्धा में अग्रणी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
आज भारत जी 20, ब्रिक्स  संघई कॉरपोरेशन ऑर्गेनाइजेशन और क्वाड जैसे मंचों पर सक्रिय और निर्णायक भूमिका निभा रहा है। जी-20 की अध्यक्षता के दौरान अफ्रीकी संघ को स्थायी सदस्यता दिलाना भारत की उस नीति को दर्शाता है, जिसमें वह विकासशील देशों की आवाज को वैश्विक मंच पर सशक्त बनाना चाहता है। यह “वसुधैव कुटुंबकम्” की भारतीय अवधारणा का आधुनिक वैश्विक स्वरूप भी है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार, साहित्यकार एवं स्तम्भकार है)
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