-कपिल बर्मन- 
दलित आंदोलनों की सबसे बड़ी विडंबना यह रही है कि वे बहुत जल्द सामाजिक चेतना और सांस्कृतिक सुधार के रास्ते को छोड़कर शुद्ध चुनावी गुणा-भाग में उलझ जाते हैं। हाल ही में भीम आर्मी के राष्ट्रीय अध्यक्ष विनय रतन सिंह का एक वीडियो क्लिप में अपना दर्द बयां करना, चंद्रशेखर आजाद पर तानाशाही और अहसानफरामोशी का आरोप लगाना तथा अपमान की ग्लानि में ‘आत्महत्या के अहसास’ तक पहुंच जाना, इसी सांगठनिक पतन का एक और ताजा और कड़वा उदाहरण है।
दबाव समूह (Pressure Group) बनाम सत्ता की भूख:
भीम आर्मी का उदय सहारनपुर के संघर्षों से हुआ था, जिसने ‘ग्रेट चमार’ के नारे के साथ युवाओं में मान-सम्मान और स्वाभिमान की एक नई लहर पैदा की थी। समाज ने इस सामाजिक संगठन को पलकों पर बिठाया क्योंकि इसमें एक सशक्त ‘प्रेशर ग्रुप’ बनने की क्षमता थी, जो सरकार की आंखों में आंखें डालकर समाज के हक की बात कर सके।
लेकिन जैसे ही इस सामाजिक ऊर्जा को ‘आजाद समाज पार्टी’ के रूप में राजनीतिक महत्वाकांक्षा की भेंट चढ़ाया गया, मूल उद्देश्य पीछे छूट गया। जो संगठन कभी ‘ग्रेट चमार’ कहने पर गर्व करता था, वह चुनावी समीकरणों और सर्वसमाज के वोट हासिल करने की मजबूरी में अपनी मूल पहचान और आक्रामकता से ही कतराने लगा।
मान्यवर कांशीराम का दर्शन और आधुनिक भटकाव :
आधुनिक दलित नेतृत्व जिस कांशीराम साहब को अपना महानायक मानता है, उनके वैचारिक दर्शन और आज के आचरण में जमीन-आसमान का अंतर है। कांशीराम साहब का स्पष्ट मानना था कि राजनीतिक सत्ता बहुजन समाज के सामाजिक और आर्थिक उद्धार की ‘मास्टर की’ है, लेकिन वे सत्ता को केवल एक साधन समझते थे, साध्य (लक्ष्य) नहीं।
“राजनीतिक सत्ता के बिना सामाजिक आंदोलन अधूरा है, लेकिन वैचारिक और सामाजिक चेतना के बिना राजनीतिक सत्ता एक नशा है जो आंदोलन को ही निगल जाती है।” मान्यवर कांशीराम
बहुजन समाज पार्टी (बसपा) का सफर इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। बामसेफ और डीएस-४ के वैचारिक धरातल पर खड़ी हुई पार्टी जब पूर्ण बहुमत की सत्ता तक पहुंची, तो वैचारिक समझौतों का दौर शुरू हुआ। ‘तिलक, तराजू, तलवार और…” के आक्रामक नारे से “हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा विष्णु महेश है” तक की यात्रा ने आंदोलन की वैचारिक रीढ़ को ही कमजोर कर दिया। सत्ता को ही अंतिम लक्ष्य मानने की जो गलती मायावती ने अपने उत्तर-दौर में की, वही गलती भीम आर्मी ने अपने शुरुआती दौर से ही शुरू कर दी।
भाजपा के ‘महासागर’ में विलीन होते नायक :
रामविलास पासवान ने कभी ‘हर झोपड़ी में दीया जलाने’ का संकल्प लेकर दलित पैंथर्स के दौर से अपनी पहचान बनाई थी, उदित राज ने सामाजिक मुद्दों पर मुखरता दिखाई, और रामदास अठावले रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (RPI) के उत्तराधिकारी बनकर उभरे। लेकिन अंततः ये सभी नेता और दल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और भाजपा के विशाल राजनीतिक महासागर में समाहित हो गए।
इसकी मुख्य वजह यह है कि जब कोई आंदोलन अपनी स्वतंत्र सामाजिक और आर्थिक जमीन खो देता है, तो चुनावी वैतरणी पार करने और अपनी प्रासंगिकता बचाए रखने के लिए वह शासक वर्ग के सामने घुटने टेकने को मजबूर हो जाता है।
इसके विपरीत, आरएसएस ने अपने 100 वर्षों के इतिहास में पहले 50 साल केवल सामाजिक, सांस्कृतिक और वैचारिक नेटवर्क बनाने में लगाए। उसने सत्ता को लक्ष्य नहीं, बल्कि अपने एजेंडे को लागू करने का साधन माना, जिसके कारण आज वह देश के अधिकांश राज्यों में वैचारिक रूप से हावी है।
व्यक्ति-पूजा और आंतरिक लोकतंत्र का अभाव :
भीम आर्मी के भीतर विनय रतन सिंह का बिखराव और दर्द यह दिखाता है कि इन आंदोलनों में संस्थागत लोकतंत्र की जगह ‘व्यक्ति-पूजा’ (Personality Cult) ले लेती है। जब कोई एक नेता खुद को आंदोलन से बड़ा समझने लगता है, तो कंधे से कंधा मिलाकर चलने वाले जमीनी साथी हाशिए पर धकेल दिए जाते हैं। वैचारिक प्रतिबद्धता की कमी के कारण ये आंदोलन किसी संस्था की तरह काम करने के बजाय व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं के अखाड़े बन जाते हैं।
क्या है भविष्य का सबक?
इतिहास गवाह है कि जब तक कोई सामाजिक आंदोलन वैचारिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं होगा और जब तक बहुजन महापुरुषों (बाबासाहब अंबेडकर, ज्योतिबा फुले, शाहू जी महाराज) के सिद्धांतों को केवल चुनावी पोस्टरों तक सीमित रखा जाएगा, तब तक आंदोलनों के खड़े होने और बिखरने का यह चक्र जारी रहेगा। दलित मूवमेंट को यदि अपनी साख बचानी है, तो उसे चुनावी सत्ता की अंधी दौड़ से बाहर निकलकर पहले समाज में एक ईमानदार और दीर्घकालिक सांस्कृतिक व आर्थिक दबाव समूह के रूप में खुद को पुनर्जीवित करना होगा।


