-सचिन कुमार गौतम
मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को वापस लेने, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने और वोट चोरी के आरोपों की जांच कराने की मांग को लेकर देश में इन दिनों एक बड़ा राजनीतिक आंदोलन खड़ा हो गया है। यह आंदोलन अब किसी एक दल का मुद्दा नहीं रह गया है। इसमें इंडिया ब्लॉक के नेता, कार्यकर्ता, सामाजिक संगठन, छात्र संगठन और आम नागरिक शामिल हो रहे हैं। सोमवार शाम राहुल गांधी के नेतृत्व में जिस तरह बड़ी संख्या में लोग सुप्रीम कोर्ट तक मार्च किए, उसने साफ संदेश दिया कि मतदाता सूची और चुनाव प्रक्रिया को लेकर उठे सवाल अब दबाए नहीं जा सकते। इस मार्च में कथित तौर पर दो से ढाई लाख लोग जुटे। इतनी बड़ी संख्या में लोगों का सड़क पर उतरना इस बात का प्रमाण है कि चुनाव प्रणाली पर भरोसा बहाल करने का मुद्दा जनता तक पहुंच चुका है।
एसआईआर के खिलाफ आवाजें पहले से उठ रही थीं, लेकिन 2 अक्टूबर के बाद यह आंदोलन अधिक संगठित रूप लेने लगा। पहले कॉकरोच जनता पार्टी, सिविल सोसायटी और कांग्रेस अलग-अलग मोर्चों से इस मुद्दे पर बोल रहे थे। लेकिन राहुल गांधी ने साफ किया कि लोकतंत्र बचाने की लड़ाई में सभी एक साथ हैं, क्योंकि सबका उद्देश्य एक ही है। उद्देश्य है कि हर वैध मतदाता का नाम मतदाता सूची में बना रहे, कोई नागरिक अपने वोट के अधिकार से वंचित न हो और चुनाव आयोग अपनी स्वतंत्रता व निष्पक्षता साबित करे। राजनीतिक दलों के बीच मतभेद हो सकते हैं, रणनीतियां अलग हो सकती हैं, लेकिन संविधान, मतदान के अधिकार और लोकतांत्रिक प्रक्रिया की रक्षा जैसे मुद्दों पर एकजुटता जरूरी है।
मंगलवार को राहुल गांधी ने इस आंदोलन से जुड़े लोगों को चाय पर बुलाया और फिर सबके साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस की। इससे स्पष्ट हुआ कि यह लड़ाई किसी एक व्यक्ति या दल की नहीं, बल्कि लोकतंत्र की लड़ाई है। राहुल गांधी ने बार-बार यही संदेश दिया कि चुनाव चोरी के खिलाफ लड़ाई में सब साथ हैं। इसके बाद बुधवार सुबह जब अभिजीत दिपके के साथी आशुतोष रांका और सौरव दास को जंतर-मंतर पर तिरंगा फहराने के आरोप में तिहाड़ जेल भेजा गया, तब भी राहुल गांधी ने पोस्ट करके कहा कि लोकतंत्र बचाने की लड़ाई में सब साथ हैं और जंतर-मंतर पर तिरंगा फहराना कोई अपराध नहीं है। यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि राष्ट्रध्वज और संविधान के प्रति सम्मान को दमन का बहाना नहीं बनाया जा सकता।
भाजपा इसी दिन की कल्पना से डरती थी जब राहुल गांधी को विपक्ष का सर्वमान्य नेता माना जाने लगे। इसीलिए उसने लगातार कोशिश की कि कांग्रेस और राहुल गांधी को अन्य विपक्षी दलों से अलग-थलग किया जाए। उन पर विभिन्न आरोप लगाए गए, उनकी राजनीतिक प्रासंगिकता पर सवाल उठाए गए और उन्हें चुनाव चोरी के मुद्दे से अलग करने की कोशिश की गई। लेकिन अब यह रणनीति अपेक्षित असर नहीं दे रही है। जब चुनाव चोरी के खिलाफ आंदोलन में जनता भी जुड़ने लगी, तो भाजपा के लिए केवल छोटे नेताओं के बयान पर्याप्त नहीं रहे। 2 अक्टूबर के बाद कई भाजपा नेताओं ने इस मुद्दे पर राहुल गांधी को घेरने की कोशिश की, लेकिन उनके तर्क जनता के सामने प्रभावी नहीं हो पाए।
अंततः गृहमंत्री अमित शाह को खुद मैदान में उतरना पड़ा। उन्होंने एसआईआर और वोट चोरी के आरोपों पर बयान दिया। लेकिन यहीं एक बड़ा सवाल खड़ा होता है कि जब आरोप मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर लगाए गए, तो जवाब अमित शाह क्यों दे रहे हैं? चुनाव आयोग संवैधानिक संस्था है और उसे अपने फैसलों की व्याख्या स्वयं करनी चाहिए। यदि चुनाव आयोग की प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी और कानूनी है, तो उसे खुद सबूत, आंकड़े और तथ्यों के साथ जवाब देना चाहिए। गृहमंत्री का जवाब देना इस धारणा को और मजबूत करता है कि चुनाव आयोग की स्वतंत्रता पर सवाल उठाए जाने की स्थिति में सत्ताधारी पार्टी भी सीधे उसकी रक्षा में उतर आई है।
अमित शाह को कायदे से यह कहना चाहिए था कि वे चुनाव आयोग की स्वतंत्रता को स्वीकार करते हैं और यदि आरोप गलत हैं तो ज्ञानेश कुमार की जगह किसी अन्य व्यक्ति की नियुक्ति पर भी आपत्ति नहीं होगी। ऐसा करके वे यह साबित कर सकते थे कि भाजपा जो चुनाव जीत रही है, वह चुनाव आयोग की किसी गड़बड़ी से नहीं, बल्कि अपने दम पर जीत रही है। लेकिन इसके बजाय उन्होंने ऐसे बयान दिए, जिनसे सवाल और बढ़ गए। उन्होंने दावा किया कि 2029 में भी भाजपा भारी बहुमत से चुनाव जीतेगी और कांग्रेस को बड़ी हार मिलेगी। लोकतंत्र में कोई भी नेता चुनाव से तीन साल पहले इतना निश्चित दावा नहीं कर सकता। जनता ही तय करती है कि कौन जीतेगा और कौन हारेगा। चुनाव से पहले ही परिणाम का ऐलान करना लोकतांत्रिक संवेदनशीलता के खिलाफ जाता है।
एसआईआर पर सवाल उठाने वाले लोग पूछ रहे हैं कि बिना ठोस आधार के मतदाताओं के नाम काटे क्यों जा रहे हैं और अचानक नए नाम क्यों जोड़े जा रहे हैं। यह भी पूछा जा रहा है कि किसी मतदान केंद्र पर मतदान समाप्त होने तक कितने वोट पड़े, इसका सही आंकड़ा तुरंत क्यों नहीं आ पाता। शाम तक अचानक वोट प्रतिशत बढ़ जाता है और दो-तीन दिन बाद उसमें और इजाफा हो जाता है। एक मतदान केंद्र पर कितने लोग वोट डालने आए, इसकी सही गिनती रखना इतना कठिन क्यों हो सकता है? ये सवाल गंभीर हैं क्योंकि लोकतंत्र की नींव भरोसे पर टिकी होती है। जब मतदाता को लगे कि उसके वोट की गिनती, उसकी सूची में उपस्थिति और उसकी भागीदारी पर सवाल हैं, तो चुनाव प्रक्रिया पर भरोसा कमजोर होता है।
इन सवालों का जवाब देने की बजाय अमित शाह ने कहा कि राहुल गांधी घुसपैठियों को बचाना चाहते हैं। यह आरोप गंभीर है, लेकिन इसका जवाब भी उतना ही गंभीर है। क्या जिन करोड़ों लोगों को एसआईआर के दौरान मतदाता सूची से बाहर किया गया है, वे सभी घुसपैठिए हैं? यदि ऐसा है, तो गृहमंत्री के रूप में अमित शाह की जिम्मेदारी क्या है? देश की सीमाओं को लांघकर इतनी बड़ी संख्या में लोग अगर घुस आए हैं, तो यह सरकार की बड़ी नाकामी है। ऐसी स्थिति में गृहमंत्री को जवाबदेह होना चाहिए। लेकिन अमित शाह ने जवाबदेही की बजाय विपक्ष पर हमला बोला और कांग्रेस की राजनीतिक हालत पर टिप्पणी की।
उन्होंने कहा कि भाजपा का संगठन हर गली-कूचे और दूर-दराज के इलाकों में मौजूद है, जबकि कांग्रेस खेत-खलिहानों, नदी-पहाड़ों से गायब है। उन्होंने गुजरात, बंगाल और उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों में कांग्रेस की हार का हवाला दिया। लेकिन एसआईआर पर उठे सवालों को कांग्रेस की हार से नहीं टाला जा सकता। चुनाव आयोग की प्रक्रिया, मतदाता सूची की सटीकता और वोटों की पारदर्शी गिनती किसी एक पार्टी की जीत-हार से जोड़कर नहीं देखी जा सकती। यदि किसी दल की कमजोर स्थिति है, तो भी उसके मतदाताओं का अधिकार बरकरार रहना चाहिए। लोकतंत्र में हर नागरिक का वोट समान महत्व रखता है, चाहे वह किसी भी दल को वोट दे।
अमित शाह चाहें तो राहुल गांधी को अपने किसी मंच पर आमंत्रित करके आमने-सामने सवाल-जवाब कर सकते हैं। इससे उनके तर्क का वजन भी बढ़ेगा और जनता को स्पष्ट जानकारी भी मिलेगी। लेकिन प्रेस ब्रीफिंग के नाम पर केवल चुनिंदा एजेंसियों के सामने तैयार बयान पढ़ना जनता के सवालों का जवाब नहीं है। जब नेता केवल अपने पक्ष की बात कहते हैं और विरोधी के सवालों का सीधा उत्तर नहीं देते, तो संदेह और गहरा जाता है। लोकतंत्र में संवाद, पारदर्शिता और जवाबदेही ही भरोसा बनाते हैं।
इस बीच पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओ.पी. रावत ने भी एसआईआर के दौरान एक बड़े कानूनी मुद्दे की ओर ध्यान दिलाया है। उनके अनुसार, यदि चुनाव से पहले संशोधित मतदाता सूची को अंतिम रूप से प्रकाशित नहीं किया जाता, तो पहले प्रकाशित सूची का ही उपयोग होना चाहिए। फिर भी पश्चिम बंगाल में संशोधित सूची के आधार पर चुनाव कराए गए, जबकि लाखों योग्य मतदाता सूची से बाहर रह गए और उनकी अपीलें लंबित थीं। यही स्थिति बिहार में भी बताई जाती है। यदि यह सही है, तो यह केवल प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि मतदाताओं के मौलिक अधिकार से जुड़ा गंभीर मामला है। अदालत से यह उम्मीद की जाती है कि वह इस पर गंभीरता से विचार करे।
अंततः यह कहना गलत नहीं होगा कि अमित शाह का एसआईआर पर जवाब देना विपक्ष के चुनाव चोरी के आरोपों को और मजबूत कर गया है। जब चुनाव आयोग पर उठे सवालों का जवाब चुनाव आयोग की बजाय गृहमंत्री देते हैं, जब मतदाता सूची की समस्या को कांग्रेस की हार से जोड़ा जाता है और जब चुनाव से तीन साल पहले जीत का दावा किया जाता है, तो जनता के मन में सवाल और बढ़ते हैं। लोकतंत्र की रक्षा के लिए जरूरी है कि मतदाता सूची पारदर्शी हो, चुनाव आयोग स्वतंत्र रहे, हर वैध मतदाता का नाम सूची में रहे और हर वोट की गिनती भरोसे के साथ हो। यही असली लोकतांत्रिक जिम्मेदारी है।
