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अमेरिकी मनमानी और भारत की संप्रभुता: खेद जताने से नहीं, कदम उठाने से बचेगा राष्ट्रीय स्वाभिमान

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-कपिल बर्मन- Kapil Kumar Berman

संप्रभुता की परीक्षा: क्या वैश्विक दबाव के आगे नतमस्तक हो रहा है आधुनिक भारत?

भारत के संविधान की प्रस्तावना में ‘संप्रभु’ (Sovereign) शब्द का अर्थ बेहद स्पष्ट है- एक ऐसा राष्ट्र जो अपने आंतरिक और बाहरी फैसलों के लिए किसी भी विदेशी शक्ति के अधीन नहीं है। लेकिन हाल ही में ओमान के निकट तीन भारतीय जहाजों पर अमेरिकी कार्रवाई और तीन निर्दोष भारतीय नाविकों की दुखद मौत ने देश की इसी संप्रभुता पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है। इस गंभीर घटना पर सरकार की कथित चुप्पी और कूटनीतिक सुस्ती यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या भारत आज भी अपनी स्वतंत्र विदेश नीति पर कायम है, या फिर वैश्विक महाशक्तियों के अदृश्य दबाव के आगे हमारी आवाज कमजोर पड़ रही है?

‘महाशक्तियों’ का दोहरा मापदंड और भारत की चुप्पी

इतिहास गवाह है कि अमेरिका जैसी वैश्विक शक्तियां भू-राजनीतिक हितों के लिए अक्सर अंतरराष्ट्रीय नियमों को ताक पर रख देती हैं। आज सवाल यह उठ रहा है कि क्या अमेरिका यही हिमाकत चीन या रूस के जहाजों के साथ कर सकता था? निश्चित रूप से नहीं। तो फिर भारतीय नाविकों के खून की कीमत इतनी सस्ती क्यों मान ली गई?

क्या भारत को अपनी ऊर्जा जरूरतें पूरी करने के लिए किससे ईंधन लेना है और किससे नहीं, इसका फैसला वाशिंगटन में होगा? यदि भारत आज भी यह तय करने में खुद को लाचार पाता है, तो यह हमारी उस संप्रभुता का हनन है जिसे हमने दशकों के संघर्ष के बाद हासिल किया है। इस हमले पर सरकार की ओर से केवल ‘खेद’ प्रकट करना पर्याप्त नहीं है; यह राष्ट्रीय स्वाभिमान से समझौता करने जैसा है।

देवयानी खोबरागड़े और इटली मामले से सीख

जब भी भारत की संप्रभुता और कूटनीतिक मर्यादा पर आंच आई है, अतीत में भारत ने कड़ा रुख अपनाया है।

देवयानी खोबरागड़े मामला (2013): जब अमेरिका ने भारतीय राजनयिक देवयानी खोबरागड़े के साथ बदसलूकी की थी, तब तत्कालीन भारत सरकार ने नई दिल्ली में अमेरिकी दूतावास की अतिरिक्त सुरक्षा दीवारें हटा दी थीं और उनके राजनयिकों को मिलने वाली कई विशेष सुविधाएं (जैसे हवाई अड्डों पर विशेष पास और शराब आयात की छूट) तुरंत रद्द कर दी थीं। यह एक संप्रभु राष्ट्र का करारा जवाब था।

इतालवी नाविक (एनरिका लेक्सी) मामला (2012): जब केरल तट के पास दो भारतीय मछुआरों की इतालवी नाविकों द्वारा हत्या कर दी गई, तो भारत ने कड़ा कानूनी रुख अपनाते हुए उन नाविकों को हिरासत में लिया था और अंतरराष्ट्रीय दबाव के बावजूद झुकने से इनकार कर दिया था।

आज जब तीन-तीन नागरिकों की जान चली गई है, तो अमेरिका के खिलाफ वैसी कूटनीतिक आक्रामकता क्यों दिखाई नहीं दे रही है? क्या अमेरिकी दूतावास की सुख-सुविधाओं और कूटनीतिक विशेषाधिकारों पर तुरंत कैंची नहीं चलाई जानी चाहिए?

घरेलू राजनीति बनाम राष्ट्रीय स्वाभिमान

इस पूरे परिदृश्य का सबसे दुखद पहलू जनता की उदासीनता है। भारतीय समाज आज जाति, धर्म और हिंदू-मुस्लिम के नैरेटिव में इस कदर उलझा दिया गया है कि राष्ट्र की संप्रभुता और नागरिकों के जीवन से जुड़े वास्तविक मुद्दे हाशिए पर चले गए हैं। जो जनता तुच्छ राजनीतिक मुद्दों पर सड़कों पर उतर आती है, वह देश के नाविकों की हत्या और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के झुकने पर खामोश क्यों है? यह बौद्धिक और सामाजिक पतन का संकेत है, जहाँ नागरिकों का ध्यान मुख्य मुद्दों से भटका दिया गया है।

आगे की राह: कड़ा रुख और अंतरराष्ट्रीय मंच

भारत को इस मुद्दे को तुरंत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) और अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में उठाना चाहिए। केवल द्विपक्षीय वार्ताओं के बंद कमरों में ‘खेद’ जताने से न्याय नहीं मिलेगा। भारत कोई कमजोर या ‘सरेंडर’ करने वाला देश नहीं रहा है; हमारी सेनाएं और हमारी अर्थव्यवस्था दुनिया में एक विशेष स्थान रखती हैं।

यदि सरकार किसी कूटनीतिक या आर्थिक दबाव के कारण चुप है, तो यह देश के 140 करोड़ नागरिकों के साथ अन्याय है। समय आ गया है कि भारत सरकार अपनी रणनीतिक स्वायत्तता  को साबित करे, अमेरिकी मनमानी के खिलाफ कड़े कदम उठाए और यह संदेश दे कि भारतीय नागरिकों का खून पानी नहीं है। संप्रभुता केवल कागजों पर या भाषणों में नहीं, बल्कि संकट के समय उठाए गए साहसिक कदमों से दिखाई देनी चाहिए।

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