लक्ष्मीकान्त पाठक
हरदोई (वेबवार्ता)। त्योहारों पर जब घर रोशनी से जगमगाते हैं और चारों ओर खुशियां बिखरी होती हैं, तब कुछ संवेदनशील मन ऐसे भी होते हैं, जिन्हें किसी जरूरतमंद की सूनी देहरी और मायूस चेहरा अपनी खुशियों में पूरी तरह शामिल नहीं होने देता। भाजपा के पूर्व जिलाध्यक्ष सौरभ मिश्रा का व्यक्तित्व इसी मानवीय संवेदना की मिसाल पेश करता है।राजनीति की चकाचौंध और पद-प्रतिष्ठा से अलग सौरभ मिश्रा त्योहारों को केवल उत्सव नहीं, बल्कि दूसरों के दुख-दर्द को महसूस करने का अवसर मानते हैं। वर्षों से होली और दीपावली जैसे पर्वों पर घर आने के बावजूद वे उत्सव की औपचारिकताओं से खुद को सीमित रखते हैं। आसपास किसी जरूरतमंद की उदासी उन्हें अपनी खुशियों में पूरी तरह डूबने नहीं देती। उनका मानना है कि समाज के किसी एक चेहरे पर पसरी मायूसी भी त्योहार के उल्लास को अधूरा कर देती है।
अपनी संवेदनाओं को व्यक्त करते हुए सौरभ मिश्रा कहते हैं—
“ईश्वर तो नहीं हो सकता, लेकिन अपने सीमित दायरे में किसी के चेहरे पर मुस्कान लाने का प्रयास जरूर कर सकता हूं। ईश्वर ने सामर्थ्य दी तो भविष्य में जरूरतमंदों के जीवन में खुशियों का उजाला भरने के लिए कुछ और प्रयास किए जा सकेंगे।”
उनके लिए किसी जरूरतमंद के घर मिठाई पहुंचाना, निराश परिवार का सहारा बनना या किसी दुखी व्यक्ति के चेहरे पर मुस्कान लाने का प्रयास करना कोई राजनीतिक गतिविधि नहीं, बल्कि मानवीय कर्तव्य है।आज जब राजनीति में अक्सर उपलब्धियों और आयोजनों के जरिए व्यक्तित्व का आकलन होता है, तब सौरभ मिश्रा की यह सोच नेतृत्व के एक संवेदनशील पहलू को सामने लाती है। यह संदेश भी देती है कि त्योहार की वास्तविक सार्थकता केवल अपने घर को रोशन करने में नहीं, बल्कि उस घर तक खुशियों का उजाला पहुंचाने में है, जहां अभाव के कारण उम्मीदों के दीप मद्धिम पड़ गए हैं।
क्योंकि किसी नेता की असली पहचान उसके पद या काफिले से नहीं, बल्कि इस बात से होती है कि उसके प्रयासों से कितने मायूस चेहरों पर मुस्कान लौटती है।




