-सचिन कुमार गौतम
पूरे गीत में किसी का नाम नहीं है, लेकिन जनता समझदार है। वह गीत की पंक्तियों के पीछे छिपे इशारों को पहचान लेती है और जान जाती है कि किसके बारे में बात हो रही है। वैसे इस गीत को सार्थक बनाने वाली घटनाएं भी लगातार घटित होती जा रही हैं। अभी का ताजा प्रसंग युवा छायाकार रेहान वाड्रा का है, जिनकी तस्वीरों की प्रदर्शनी दिल्ली के बीकानेर हाउस में विवाद का विषय बन गई है।
रेहान वाड्रा की खींची तस्वीरों की प्रदर्शनी पहले भी लग चुकी है। दिल्ली के बीकानेर हाउस में ही उन्होंने जुलाई 2021 में अपनी तस्वीरों की पहली प्रदर्शनी आयोजित की थी। इस बार उनकी प्रदर्शनी का शीर्षक था ‘नो आइडिया इज़ फाइनल’। यह शीर्षक खुद अपने आप में एक सवाल है—क्या कोई विचार, कोई तस्वीर, कोई आंदोलन या कोई जन-भावना कभी पूरी तरह मिट सकती है? बुधवार शाम सात बजे यह प्रदर्शनी शुरू होनी थी, लेकिन उससे कुछ घंटे पहले इसका चेहरा बदल दिया गया।
रेहान वाड्रा के अनुसार बीकानेर हाउस प्रबंधन ने उनसे कहा कि प्रदर्शनी में रखी गई कई तस्वीरें उनकी नीति के अनुकूल नहीं हैं। उन्होंने बताया कि कुल 105 तस्वीरों में से लगभग 70 से अधिक तस्वीरें हटाने को कहा गया। ये तस्वीरें मुख्य रूप से पिछले एक साल के दौरान दिल्ली में हुए युवा आंदोलनों और विरोध प्रदर्शनों से जुड़ी थीं। रेहान का कहना था कि उन्होंने प्रदर्शनी का पूरा लेआउट पहले ही साझा कर दिया था, लेकिन तब कोई आपत्ति नहीं जताई गई।
यह मामला केवल एक प्रदर्शनी की तकनीकी तैयारी का नहीं है। यह कला, अभिव्यक्ति और सार्वजनिक स्मृति पर हस्तक्षेप का सवाल है। दुनिया भर में फोटोग्राफी कभी केवल सुंदर चेहरों, पहाड़ों, जानवरों या शहरों की रंगीन झलक नहीं रही। कैमरा इतिहास का गवाह बनता है। वह उन क्षणों को कैद करता है, जिन्हें सत्ता चाहे तो फाइलों में दबा सकती है, पर जनता की याददाश्त से नहीं मिटा सकती।
रेहान वाड्रा कौन हैं
रेहान वाड्रा कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी और रॉबर्ट वाड्रा के बेटे हैं। वे अक्सर अपनी मां के साथ सार्वजनिक कार्यक्रमों में दिखाई देते हैं, लेकिन राजनीतिक मंच पर सक्रिय रूप से भाषण नहीं देते। फिर भी जब भी वे किसी सार्वजनिक आयोजन या वीडियो में नजर आते हैं, उनके राजनीति में आने की अटकलें तेज हो जाती हैं। दो साल पहले 2024 की दीपावली पर राहुल गांधी ने उनके साथ एक वीडियो साझा कर जनता को बधाई दी थी, जिसमें रेहान दीवारों पर रंग-रोगन करने वाले कामगारों के साथ दिखे थे।
लेकिन रेहान वाड्रा की पहचान केवल राजनीतिक परिवार से जुड़े होने तक सीमित नहीं है। वे एक युवा विजुअल आर्टिस्ट और फोटोग्राफर के रूप में अपनी अलग पहचान बना रहे हैं। उनका काम वन्यजीव, स्ट्रीट फोटोग्राफी, एब्स्ट्रैक्ट कला और समकालीन सामाजिक मुद्दों को दर्ज करने तक फैला हुआ है। इस बार उनकी प्रदर्शनी में दिल्ली के युवा आंदोलनों की तस्वीरें शामिल थीं, और यही उनकी प्रदर्शनी का सबसे संवेदनशील हिस्सा बन गया।
रेहान ने साफ कहा कि उनकी राजनीति उनकी तस्वीरों में झलकती है। वे बतौर छायाकार उन लोगों को फ्रेम में लाना चाहते हैं, जो आमतौर पर सुर्खियों से दूर रहते हैं—सड़कों पर उतरे युवा, नारे लगाने वाले छात्र, अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाने वाले नागरिक। यही कारण है कि उनकी प्रदर्शनी को लेकर उठा विवाद केवल एक परिवार से जुड़े व्यक्ति के साथ की गई कार्रवाई नहीं लगती; यह उन आवाजों पर लगाई गई रोक भी प्रतीत होती है, जिन्हें तस्वीरों के माध्यम से दर्ज किया जा रहा था।
क्या हुआ बीकानेर हाउस में
रेहान वाड्रा के मुताबिक प्रदर्शनी खुलने से पहले उन्हें बताया गया कि कुछ तस्वीरों में राजनीतिक संदेश है। उन्होंने सहयोग का भाव दिखाते हुए कहा कि यदि किसी तस्वीर पर आपत्ति है, तो कारण बताया जाए। लेकिन उनके अनुसार स्पष्ट जवाब नहीं मिला और बाद में लगभग 70 तस्वीरों को हटाने का निर्देश दिया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि दोपहर करीब 3:30 बजे नोटिस दिया गया कि यदि शाम 5 बजे तक तस्वीरें नहीं हटाई गईं, तो प्रदर्शनी रद्द कर दी जाएगी।
रेहान ने यह भी कहा कि उन्होंने तिरंगे से जुड़ी दो तस्वीरें लगाई थीं, पर उन्हें भी हटाने को कहा गया। उनका सवाल स्वाभाविक था—जब राष्ट्रध्वज की तस्वीर को ही नीति के विरुद्ध माना जा सकता है, तो उस नीति की सीमा क्या है? बीकानेर हाउस प्रबंधन ने बाद में कहा कि कुछ तस्वीरें उनकी नीति के असंगत पाई गईं, इसलिए उनकी हटाई जाने की मांग की गई और बाकी तस्वीरें प्रदर्शित रहीं।
यहां सबसे बड़ी विडंबना यह है कि प्रदर्शनी का नाम ही ‘नो आइडिया इज़ फाइनल’ था। यानी कोई विचार अंतिम नहीं होता। लेकिन प्रबंधन की कार्रवाई ने यह संदेश दे दिया कि सेंसर का फैसला अंतिम हो सकता है। खाली दीवारें, जिन पर तस्वीरें लटकी थीं, अब उन खाली कीलों के साथ एक नई तस्वीर बन गई हैं। यह तस्वीर शायद रेहान की किसी भी फोटोग्राफ से ज्यादा बोल रही है।
तिरंगे पर भी सवाल
इस घटना को केवल कला प्रदर्शनी से जोड़कर देखा जाए तो इसका अर्थ सीमित रह जाएगा। पिछले कुछ समय में दिल्ली में तिरंगे और विरोध को लेकर कई घटनाएं सामने आई हैं। कनॉट प्लेस में ‘लहराओ तिरंगा’ अभियान को रोकने की खबरें चर्चा में रहीं। इससे पहले जंतर-मंतर पर तिरंगा लेकर जाने के आरोप में सौरव दास और आशुतोष रांका को हिरासत में लिए जाने की बात सामने आई थी। इन घटनाओं ने एक सवाल खड़ा किया है कि क्या राष्ट्रध्वज और शांतिपूर्ण विरोध की जगह लोकतंत्र में सिमटती जा रही है?
रेहान वाड्रा की प्रदर्शनी में तिरंगे की तस्वीरों पर आपत्ति इसी संदर्भ में और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। जब एक युवा कलाकार कहता है कि उसने तिरंगे की तस्वीर लगाई थी और उसे हटाने को कहा गया, तो यह केवल एक व्यक्तिगत शिकायत नहीं रह जाती। यह उस माहौल पर सवाल उठाता है, जहां विरोध को अराजकता, तस्वीर को राजनीति और कला को खतरा समझा जाने लगा है।
बेशक, बीकानेर हाउस प्रबंधन का तर्क है कि उसकी बुकिंग नीति में राजनीतिक सामग्री, सांप्रदायिक विषय या अश्लीलता पर रोक है। लेकिन सवाल यह है कि जब लेआउट पहले से साझा किया जा चुका हो और तब कोई आपत्ति न आए, तो प्रदर्शनी शुरू होने से घंटों पहले बड़े पैमाने पर तस्वीरें हटवाना किस संवेदनशीलता का परिणाम है? यह सवाल प्रबंधन को जवाब देना होगा।
भाजपा के लिए राजनीतिक मंच
राजनीतिक रूप से यह मामला भाजपा के लिए आसान नहीं है। बीकानेर हाउस राजस्थान सरकार से जुड़ा स्थान है और राजस्थान में भाजपा की सरकार है। इसलिए कांग्रेस ने इसे सीधे सेंसरशिप और लोकतंत्र पर हमले से जोड़ा है। भाजपा चाहे तो कहे कि यह प्रबंधन का निर्णय था, लेकिन जनता के सामने सवाल यही रहेगा कि आखिर ऐसी कौन-सी तस्वीरें थीं, जिन्हें देखना खतरनाक समझा गया?
असल में रेहान वाड्रा पर दबाव बनाकर भाजपा ने खुद उनके लिए एक बड़ा राजनीतिक मंच तैयार कर दिया है। गुरुवार को मीडिया में यही बात सबसे ज्यादा चर्चित रही कि क्या भाजपा एक युवा फोटोग्राफर की तस्वीरों से डर गई है? यह सवाल चाहे पार्टी को असहज करे, पर यह अब जनता के बीच उठ चुका है। और जब कोई सरकार या सत्ताधारी ढांचा अभिव्यक्ति पर रोक लगाने की कोशिश करता है, तो उस रोक का असर अक्सर उल्टा होता है।
रेहान वाड्रा की उम्र, उनका माध्यम और उनकी पहचान—तीनों इस मुद्दे को जेन जेड की राजनीति से जोड़ देते हैं। सौरव दास और आशुतोष रांका पर तर्क दिया जा सकता था कि वे जेन जेड के प्रतिनिधि नहीं हैं, लेकिन रेहान वाड्रा खुद युवा पीढ़ी के कलाकार हैं। उनकी तस्वीरें उसी पीढ़ी के अनुभव, आक्रोश और संघर्ष को दर्ज कर रही हैं, जो सड़कों पर उतर रही है।
मिटाई जा सकती हैं तस्वीरें?
एक हॉल के भीतर लगी चंद तस्वीरें वैसे भी बड़ी जनता की नजरों से दूर होती हैं। बीकानेर हाउस में इन्हें देखने कुछ सौ लोग ही जाते। लेकिन जंतर-मंतर, दिल्ली के अन्य हिस्सों, बिहार के छात्र आंदोलन या मुंबई के आजाद मैदान जैसी जगहों पर हुए विरोध प्रदर्शनों की तस्वीरें अब केवल गैलरी तक सीमित नहीं हैं। वे मोबाइल फोन, सोशल मीडिया, रील्स, मीम्स और वीडियो के जरिए करोड़ों स्क्रीन तक पहुंच चुकी हैं।
आज के दौर में किसी आंदोलन को दबाने के लिए उसकी तस्वीरें हटाना पर्याप्त नहीं है। एक बार तस्वीर इंटरनेट पर आ जाए, तो वह हजारों बार शेयर, रिपोस्ट और पुनर्निर्मित हो जाती है। उसे एक प्रदर्शनी से हटाया जा सकता है, पर लाखों मोबाइलों से नहीं। और यदि मान भी लिया जाए कि डिजिटल तस्वीरें मिटाई जा सकती हैं, तो भी लोगों के दिमाग में कैद यादें मिटाना असंभव है।
सरकार या सत्ता के सहयोगी ढांचे को यह समझना होगा कि आंदोलन केवल तस्वीरों से नहीं बनते। वे बेरोजगारी, शिक्षा, नौकरी, भ्रष्टाचार, नागरिक अधिकारों और अपमान की भावना से बनते हैं। जब तक ये समस्याएं मौजूद हैं, तस्वीरें बनती रहेंगी। नारे उठेंगे, वीडियो बनेंगे और नई पीढ़ी अपने तरीके से सवाल पूछेगी।
असली खतरा किसका
इससे पहले भी किसी कार्टून पर आपत्ति हुई, किसी स्टैंडअप कॉमेडियन के खिलाफ कार्रवाई हुई, किसी फिल्म या किताब पर रोक लगाने की कोशिश हुई। लेकिन इन कदमों से सरकार विरोधी आवाजें खत्म नहीं हुईं। बल्कि हर बार यह सवाल और तेज हुआ कि आखिर डर किस बात का है? जब तिरंगा, कैमरा, कार्टून, जोक और युवाओं की आवाज सब पर सवाल उठने लगें, तो लोकतंत्र की जगह संकुचित होती जाती है।
रेहान वाड्रा की प्रदर्शनी से तस्वीरें हटाना शायद एक छोटा प्रशासनिक निर्णय लगा हो, लेकिन उसका राजनीतिक संदेश बड़ा है। उसने यह बता दिया है कि सत्ता अब केवल भाषण या नारे नहीं, बल्कि तस्वीरों को भी खतरा मानने लगी है। लेकिन इतिहास गवाह है कि जो तस्वीरें दबाई जाती हैं, वे अक्सर और ज्यादा याद रह जाती हैं। खाली दीवारें भी बयान देती हैं, और यह बयान अब बीकानेर हाउस की दीवारों से निकलकर पूरे देश तक पहुंच चुका है।
