महानगरदिल्ली-एनसीआरदिल्ली एसआईआर और ‘वीआईपी मतदाता’ का सवाल

दिल्ली एसआईआर और ‘वीआईपी मतदाता’ का सवाल

-सचिन कुमार गौतम

दिल्ली में जारी विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर पहले से ही गंभीर सवाल उठ रहे हैं। मतदाता सूची से लाखों नाम हटाए जाने, बड़ी संख्या में लोगों को नोटिस जारी किए जाने और दावों-आपत्तियों की प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक दलों तथा नागरिक संगठनों ने चिंता जताई है। इन सबके बीच 20 सितंबर को दिल्ली चुनाव आयोग की ओर से जारी एक प्रेस नोट ने विवाद को और गहरा कर दिया है। इस विज्ञप्ति में “वीआईपी/चिह्नित मतदाता” जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया गया है। सवाल यह है कि लोकतंत्र में मतदाता वीआईपी कैसे हो सकता है?

भारतीय संविधान के अनुसार चुनावी अधिकार का आधार समानता है। संविधान के अनुच्छेद 326 के तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के आधार पर कराए जाने का प्रावधान है। इसका सीधा अर्थ है कि देश के प्रत्येक वयस्क नागरिक को बिना किसी भेदभाव के मतदान का अधिकार प्राप्त है। नागरिक की जाति, धर्म, लिंग, भाषा, आर्थिक स्थिति, शिक्षा, पद या राजनीतिक प्रभाव उसके मताधिकार की वैधता और महत्व को प्रभावित नहीं कर सकते।

भारत में जब कोई नागरिक मतदान केंद्र पर पहुंचता है तो वह प्रधानमंत्री हो, उद्योगपति हो, मुख्यमंत्री हो, सरकारी अधिकारी हो या किसी गरीब बस्ती में रहने वाला मजदूर—कानून की नजर में सभी मतदाता समान होते हैं। मतदान केंद्र पर सभी एक ही कतार में खड़े होते हैं और प्रत्येक नागरिक को एक वोट डालने का अधिकार होता है। किसी व्यक्ति का पद या संपत्ति उसके वोट को अतिरिक्त मूल्य नहीं देती। नरेन्द्र मोदी का वोट और किसी गरीब नागरिक का वोट संवैधानिक दृष्टि से समान महत्व रखता है। यही लोकतंत्र का मूल सिद्धांत है—एक व्यक्ति, एक वोट और हर वोट का समान मूल्य।

इसलिए “वीआईपी मतदाता” जैसी शब्दावली केवल भाषाई भूल नहीं मानी जा सकती। चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था की किसी विज्ञप्ति में प्रयुक्त शब्द लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रति उसके दृष्टिकोण का संकेत देते हैं। यदि कुछ मतदाताओं को वीआईपी और बाकी को सामान्य माना जाएगा, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या चुनाव आयोग मतदाताओं के साथ अलग-अलग व्यवहार कर रहा है? क्या प्रभावशाली लोगों के मामलों में तेजी और आम नागरिकों के मामलों में औपचारिकता बरती जाएगी?

भारत ने सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार को संविधान लागू होने के साथ ही स्वीकार किया था। 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू हुआ और देश के सभी वयस्क नागरिकों को मतदान का अधिकार मिला। यह निर्णय उस दौर में बेहद प्रगतिशील था, जब दुनिया के कई लोकतांत्रिक देशों में भी महिलाओं, अश्वेतों, गरीबों और अन्य वंचित समुदायों को समान मतदान अधिकार हासिल नहीं था। भारत ने जाति, धर्म, लिंग, संपत्ति और शिक्षा जैसी किसी भी शर्त को नागरिक के मताधिकार के रास्ते में बाधा नहीं बनने दिया।

शुरुआत में भारत में मतदान की उम्र 21 वर्ष थी। वर्ष 1988 में 61वें संविधान संशोधन के माध्यम से इसे घटाकर 18 वर्ष किया गया। आज 18 वर्ष या उससे अधिक आयु का प्रत्येक भारतीय नागरिक, यदि वह कानूनन अयोग्य घोषित नहीं है, मतदाता बनने का अधिकार रखता है। यह अधिकार किसी सरकार या चुनाव आयोग की कृपा नहीं, बल्कि संविधान द्वारा नागरिक को दिया गया अधिकार है।

दिल्ली एसआईआर की प्रक्रिया को लेकर सामने आए आंकड़े इस चिंता को और गंभीर बनाते हैं। आरोप है कि ड्राफ्ट मतदाता सूची जारी करते समय पिछली सूची की तुलना में 47 लाख से अधिक नाम हटा दिए गए। ड्राफ्ट सूची में शामिल 33 लाख से अधिक लोगों को अलग-अलग कारणों से नोटिस भेजे जा रहे हैं। इन नागरिकों को चुनाव अधिकारियों के समक्ष उपस्थित होकर अपने मतदाता होने का दावा पेश करना होगा।

यह प्रक्रिया अपने आप में आम नागरिकों के लिए कठिन है। दिल्ली जैसे महानगर में लाखों लोग नौकरी, कारोबार, मजदूरी और छोटे-मोटे व्यवसाय पर निर्भर हैं। यदि उन्हें अपने मतदाता अधिकार को बचाने के लिए बार-बार सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ें, दस्तावेज जुटाने पड़ें और अधिकारियों के सामने व्यक्तिगत रूप से पेश होना पड़े, तो इसका सबसे अधिक असर गरीब, प्रवासी, किरायेदार, बुजुर्ग, महिलाओं और कमजोर वर्गों पर पड़ेगा। प्रभावशाली लोगों के पास कानूनी और प्रशासनिक सहायता उपलब्ध होती है, लेकिन आम नागरिक के लिए एक नोटिस भी गंभीर परेशानी बन सकता है।

एसआईआर से जुड़ी प्रक्रिया में कई प्रमुख लोगों को नोटिस जारी होने की खबरों ने चुनाव आयोग की तैयारियों और डेटा प्रबंधन पर सवाल खड़े किए हैं। दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता, पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, भाजपा सांसद बांसुरी स्वराज, विदेश मंत्री एस. जयशंकर, विदेश सचिव विक्रम मिसरी, सेबी चेयरमैन तुहिन कांत पांडे और प्रधानमंत्री के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार अजय सूद जैसे नामों का उल्लेख सामने आया है। इनमें कुछ मामलों में नाम पिछली सूची में नहीं मिलने, गलत लिखे जाने या रिकॉर्ड संबंधी त्रुटियों की बात कही गई है।

सबसे चौंकाने वाला मामला पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी से जुड़ा बताया गया है। उन्हें इसलिए नोटिस जारी होने की बात सामने आई कि वर्ष 2002 की मतदाता सूची में उनका नाम नहीं मिला। इसी तरह प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद से जुड़े रहे बिबेक देबरॉय के नाम पर भी नोटिस जारी होने की खबर है, जबकि वर्ष 2024 में उनका निधन हो चुका था। यदि मतदाता सूची में मृत व्यक्ति का नाम सक्रिय रूप से मौजूद है या रिकॉर्ड की गलत व्याख्या के आधार पर ऐसे व्यक्ति को नोटिस भेजा जाता है, तो यह पूरी प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाता है।

मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता के मामले में चुनाव आयोग ने शीघ्र स्पष्टीकरण जारी किया और बताया कि उनका नाम मतदाता सूची में शामिल कर लिया गया है। यह अच्छी बात है कि किसी त्रुटि को सुधारने के लिए तुरंत कदम उठाया गया। लेकिन इसके साथ ही एक बड़ा सवाल भी पैदा होता है—क्या आम नागरिकों के मामलों में भी चुनाव आयोग ऐसी ही तत्परता दिखाएगा? यदि किसी गरीब, अल्पसंख्यक, किरायेदार या प्रवासी श्रमिक का नाम गलती से हटा दिया गया है, तो क्या उसका आवेदन भी उतनी ही तेजी से सुना जाएगा?

यहीं से “वीआईपी मतदाता” शब्द और अधिक गंभीर हो जाता है। यदि प्रभावशाली लोगों के नामों पर तत्काल कार्रवाई होती है और आम नागरिकों को अपने अधिकार के लिए लंबी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है, तो इससे चुनावी व्यवस्था में असमानता की धारणा मजबूत होगी। चुनाव आयोग की जिम्मेदारी केवल सूची तैयार करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि किसी योग्य नागरिक का नाम गलत तरीके से न हटे और किसी अपात्र व्यक्ति का नाम शामिल न रहे।

मतदाता सूची का शुद्धिकरण आवश्यक है, लेकिन यह प्रक्रिया पारदर्शी, निष्पक्ष और नागरिक-अनुकूल होनी चाहिए। किसी भी पुनरीक्षण में नाम हटाने से पहले पर्याप्त सूचना, स्पष्ट कारण, अपील का अवसर और स्थानीय स्तर पर सहायता उपलब्ध कराना जरूरी है। नोटिस जारी करना अपने आप में पर्याप्त नहीं है। आयोग को यह भी बताना चाहिए कि कितने नाम किस कारण से हटाए गए, कितने दावों का निपटारा हुआ और कितने मामलों में गलतियां पाई गईं।

सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार भारतीय लोकतंत्र की नींव है। इसे कमजोर करने वाला कोई भी प्रशासनिक रवैया लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए खतरा है। चुनाव आयोग को अपनी भाषा और कार्यप्रणाली, दोनों में यह स्पष्ट करना होगा कि भारत में कोई मतदाता वीआईपी नहीं है। सभी नागरिक समान हैं और प्रत्येक वोट का समान महत्व है।

दिल्ली एसआईआर को लेकर उठे सवालों का जवाब केवल प्रेस विज्ञप्तियों से नहीं, बल्कि विस्तृत आंकड़ों, पारदर्शी प्रक्रिया और समान व्यवहार से दिया जाना चाहिए। यदि चुनाव आयोग आम नागरिकों का भरोसा बनाए रखना चाहता है, तो उसे यह साबित करना होगा कि प्रभावशाली लोगों और सामान्य मतदाताओं के लिए अलग-अलग नियम नहीं हैं। लोकतंत्र में मतदाता की पहचान उसके पद से नहीं, उसके संवैधानिक अधिकार से होती है।

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