नई दिल्ली, 20 सितंबर (वेब वार्ता)। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने नए H-1B वीजा आवेदनों पर 1 लाख डॉलर के भुगतान की शर्त को एक और वर्ष के लिए बढ़ा दिया है। अब यह व्यवस्था 21 सितंबर 2027 तक लागू रहेगी। हालांकि, यह शर्त सभी H-1B मामलों पर समान रूप से लागू नहीं होगी। आदेश में मौजूदा वीजा धारकों और कुछ विशेष श्रेणियों के आवेदकों के लिए अपवाद भी रखे गए हैं।
व्हाइट हाउस के अनुसार, यह फैसला H-1B वीजा कार्यक्रम के कथित दुरुपयोग को रोकने और अमेरिकी कर्मचारियों के रोजगार की सुरक्षा के उद्देश्य से लिया गया है। अमेरिकी प्रशासन का आरोप है कि कुछ आईटी स्टाफिंग और आउटसोर्सिंग कंपनियां कम वेतन वाले विदेशी कर्मचारियों के माध्यम से अमेरिकी कर्मचारियों के स्थान पर नियुक्तियां कर रही थीं।
1 लाख डॉलर की फीस की शर्त क्यों बढ़ाई गई?
ट्रंप प्रशासन ने सितंबर 2025 में कुछ नए H-1B आवेदनों पर 1 लाख डॉलर का भुगतान अनिवार्य किया था। 18 सितंबर के नए आदेश के तहत इस व्यवस्था को अगले 12 महीनों के लिए बढ़ा दिया गया है।
व्हाइट हाउस के मुताबिक, यह शर्त मुख्य रूप से उन नए H-1B कर्मचारियों पर लागू होती है, जो अमेरिका से बाहर हैं और जिनके लिए नई H-1B याचिका दाखिल की जा रही है। प्रशासन का दावा है कि वर्ष 2025 में यह व्यवस्था लागू होने के बाद बड़ी आईटी आउटसोर्सिंग कंपनियों द्वारा दाखिल किए गए H-1B पंजीकरण में करीब 92 प्रतिशत की कमी आई।
अमेरिकी प्रशासन इस गिरावट को कम वेतन वाले और कम-कुशल H-1B कर्मचारियों की भर्ती में कमी के रूप में देख रहा है।
किन H-1B आवेदकों पर लागू नहीं होगी 1 लाख डॉलर की शर्त?
नए आदेश में कुछ महत्वपूर्ण अपवाद भी रखे गए हैं। मौजूदा H-1B धारकों के सामान्य नवीनीकरण पर यह शर्त लागू नहीं होगी। इसके अलावा, अमेरिका में पहले से मौजूद ऐसे लोगों के मामलों में भी अलग नियम लागू होंगे, जो छात्र वीजा से H-1B स्थिति में परिवर्तन कर रहे हैं।
नए आदेश का मुख्य लक्ष्य उन H-1B कर्मचारियों पर है, जो अमेरिका से बाहर हैं और नई H-1B याचिका के आधार पर अमेरिका में प्रवेश करना चाहते हैं। अमेरिकी सरकार राष्ट्रीय हित से जुड़े कुछ मामलों में इस भुगतान से छूट भी दे सकती है।
भारतीय आईटी कर्मचारियों के लिए क्यों अहम है फैसला?
H-1B वीजा अमेरिकी कंपनियों को विशेष कौशल वाले विदेशी कर्मचारियों को नौकरी देने की अनुमति देता है। भारतीय पेशेवर लंबे समय से इस कार्यक्रम के सबसे बड़े लाभार्थी समूहों में शामिल रहे हैं। विशेष रूप से आईटी और तकनीकी क्षेत्र में बड़ी संख्या में भारतीय पेशेवर H-1B वीजा के माध्यम से अमेरिका में काम करते हैं।
नई व्यवस्था का असर उन भारतीय पेशेवरों और कंपनियों पर अधिक पड़ सकता है, जो अमेरिका के बाहर से नए कर्मचारियों को वहां भेजना चाहती हैं। 1 लाख डॉलर की अतिरिक्त लागत कंपनियों के लिए भर्ती प्रक्रिया को महंगा बना सकती है।
हालांकि, अमेरिका में पहले से पढ़ाई या नौकरी कर रहे लोगों और मौजूदा H-1B धारकों की स्थिति अलग होगी। इसलिए इस फैसले का असर प्रत्येक भारतीय H-1B आवेदक पर एक जैसा नहीं होगा।
H-1B आवेदनों की होगी कड़ी जांच
फीस की शर्त बढ़ाने के साथ ट्रंप प्रशासन ने H-1B वीजा आवेदनों की जांच सख्त करने के लिए अलग कार्यकारी आदेश भी जारी किया है।
इसके तहत विदेश विभाग, श्रम विभाग और होमलैंड सिक्योरिटी विभाग को H-1B आवेदनों की समीक्षा के दौरान यह भी देखना होगा कि संबंधित नियोक्ता ने हाल में समान पदों पर काम करने वाले अमेरिकी कर्मचारियों की छंटनी की है या भविष्य में ऐसी छंटनी की योजना है।
इसका अर्थ है कि यदि कोई कंपनी अमेरिकी कर्मचारियों की छंटनी करने के बाद उन्हीं तरह के पदों पर H-1B कर्मचारियों की नियुक्ति करने का प्रयास करती है, तो ऐसे मामलों की अधिक गहन जांच हो सकती है।
श्रम विभाग को 30 दिन में समीक्षा शुरू करने का निर्देश
नए आदेश में अमेरिकी श्रम विभाग को भी अतिरिक्त जिम्मेदारी दी गई है। विभाग के वेज एंड आवर डिविजन को पहले जमा किए गए लेबर कंडिशन एप्लीकेशन से जुड़े आंकड़ों की समीक्षा शुरू करने के लिए 30 दिन की समयसीमा दी गई है।
इस समीक्षा का उद्देश्य यह पता लगाना है कि H-1B कर्मचारियों को प्रायोजित करने वाले नियोक्ताओं के खिलाफ आगे किसी कार्रवाई की आवश्यकता है या नहीं।
ट्रंप प्रशासन का क्या कहना है?
व्हाइट हाउस का कहना है कि H-1B कार्यक्रम मूल रूप से अत्यधिक कुशल और विशेष विशेषज्ञता रखने वाले विदेशी कर्मचारियों को अमेरिका में अस्थायी रूप से काम करने का अवसर देने के लिए बनाया गया था।
प्रशासन का आरोप है कि कुछ कंपनियों, तीसरे पक्ष की नियुक्ति एजेंसियों और आउटसोर्सिंग कंपनियों ने इस व्यवस्था का दुरुपयोग किया। ट्रंप प्रशासन के अनुसार, कम वेतन वाले विदेशी कर्मचारियों के माध्यम से अमेरिकी कर्मचारियों का स्थान भरने से अमेरिकी श्रमिकों के वेतन और रोजगार के अवसर प्रभावित हो सकते हैं।
दूसरी ओर, H-1B कार्यक्रम का समर्थन करने वाले कारोबारी और तकनीकी क्षेत्र के प्रतिनिधियों का तर्क है कि यह योजना उन क्षेत्रों के लिए आवश्यक है, जहां विशेष कौशल वाले कर्मचारियों की कमी है। इस नीति को लेकर कानूनी चुनौती भी जारी है।
H-1B नियमों में आगे क्या होगा?
18 सितंबर के आदेश के तहत 1 लाख डॉलर के भुगतान की व्यवस्था को 12 महीने के लिए आगे बढ़ाया गया है। इसके साथ ही अमेरिकी प्रशासन ने H-1B कार्यक्रम में वेतन, छंटनी, आवेदन प्रक्रिया और नियोक्ताओं की भूमिका की जांच बढ़ाने का फैसला किया है।
इसका असर अमेरिकी कंपनियों के साथ-साथ भारत की आईटी और आउटसोर्सिंग कंपनियों पर भी पड़ सकता है, विशेष रूप से उन कंपनियों पर, जो अमेरिका के बाहर से नए कर्मचारियों को H-1B वीजा के माध्यम से भेजती हैं।
हालांकि, किसी विशेष कंपनी या कर्मचारी पर वास्तविक प्रभाव उसके वीजा मामले, अमेरिका में उसकी मौजूदा स्थिति और लागू अपवादों पर निर्भर करेगा।




