— लक्ष्मीकान्त पाठक
हरदोई (वेबवार्ता)उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले की 155-शाहाबाद विधानसभा सीट राज्य की राजनीति में हमेशा से एक संवेदनशील, उतार-चढ़ाव भरी और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण प्रयोगशाला रही है। वर्ष 2012 से लेकर 2024 तक के चुनावी आंकड़े और जमीनी अनुभव यह स्पष्ट संदेश देते हैं कि शाहाबाद का जनाधार किसी एक राजनीतिक दल या परिवार की बपौती नहीं रहा। यहां का मतदाता समय, परिस्थितियों, प्रत्याशियों की छवि और स्थानीय ध्रुवीकरण के अनुसार लगातार अपने जनाधार का पुनर्गठन करता रहा है।
पिछले तीन विधानसभा चुनावों (2012, 2017 और 2022) के साथ-साथ 2023 के नगर पालिका चुनाव और 2024 के लोकसभा चुनाव के आंकड़ों को एक सूत्र में पिरोकर देखें, तो यह बात पूरी तरह साफ हो जाती है कि इस क्षेत्र में पारंपरिक राजनीतिक ताकतें स्थिर नहीं हैं।
1. 2012 से 2022 तक: वर्चस्व, उभार और सीधी टक्कर का सफर
2012: सपा का दबदबा और बसपा की चुनौती
वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में शाहाबाद की राजनीतिक धुरी समाजवादी पार्टी (सपा) और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के इर्द-गिर्द घूमती थी। उस समय सपा के बाबू खां ने 89,947 वोट हासिल कर बड़ी जीत दर्ज की थी, जबकि बसपा के आसिफ खान 78,813 वोटों के साथ दूसरे स्थान पर रहे थे। हार-जीत का अंतर 11,134 वोटों का था। उस चुनाव में भारतीय जनता पार्टी तीसरे पायदान पर काफी पीछे छूट गई थी और उसके प्रत्याशी अखिलेश पाठक को मात्र 13,022 वोट ही मिल सके थे। इस चुनाव ने साबित किया था कि शाहाबाद में मुख्य मुकाबला सपा और बसपा के बीच ही था।
2017: भाजपा का तूफानी उभार
वर्ष 2017 के चुनाव ने शाहाबाद के राजनीतिक परिदृश्य को पूरी तरह पलट दिया। भाजपा की रजनी तिवारी ने 99,624 वोट हासिल कर पहली बार इस सीट पर ऐतिहासिक सफलता पाई। हालांकि, बसपा के आसिफ खान ‘बब्बू’ ने 95,364 वोट लाकर बेहद कड़ा मुकाबला दिया था और भाजपा की जीत का अंतर महज 4,260 वोटों तक सीमित रहा। इस चुनाव में सपा प्रत्याशी सरताज खान मात्र 15,767 वोटों पर सिमट गए थे। भाजपा ने 2012 के 13,022 वोटों से सीधी छलांग लगाते हुए करीब एक लाख वोटों का नया जनाधार खड़ा कर लिया था।
2022 का निर्णायक मोड़: बसपा का बिखराव और सपा की वापसी
2022 का विधानसभा चुनाव शाहाबाद की राजनीति का सबसे बड़ा टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ। 2017 में 95 हजार से अधिक वोट पाने वाली बसपा, अहिवरन सिंह लोधी के नेतृत्व में मात्र 37,475 वोटों पर सिमट गई। यानी महज पांच वर्षों में बसपा को 57,889 वोटों का अभूतपूर्व नुकसान उठाना पड़ा।
बसपा के इस बिखराव का सीधा लाभ सपा को मिला। सपा प्रत्याशी आसिफ अली खां ‘बब्बू’ ने 88,082 वोट हासिल कर भाजपा की घेराबंदी मजबूत कर दी। यद्यपि भाजपा की रजनी तिवारी 94,561 वोट लेकर अपनी सीट बचाने में सफल रहीं, लेकिन उनकी जीत का अंतर घटकर मात्र 6,479 वोट रह गया। भाजपा के वोट भी 2017 की तुलना में करीब 5,000 कम हुए। इस चुनाव ने शाहाबाद की राजनीति को त्रिकोणीय मुकाबले से निकालकर सीधे भाजपा बनाम सपा के आमने-सामने के संघर्ष में बदल दिया।
2. निकाय और लोकसभा चुनाव: आंकड़ों में सिमटती बढ़त
विधानसभा चुनाव जीतने के बाद के दो चुनावों ने सत्ताधारी दल (भाजपा) के सामने जमीनी स्तर पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
2023 का नगर पालिका चुनाव: शहरी संकेत
निकाय चुनाव में सपा की नसरीन बानो (24,045 वोट) ने भाजपा के संजय मिश्रा (19,456 वोट) को 4,589 वोटों से मात देकर यह साबित किया कि 2017 के बाद से जिस शहरी मतदाता को भाजपा का मजबूत गढ़ माना जा रहा था, वहां सपा अपनी पैठ बना चुकी है।
2024 का लोकसभा चुनाव: शाहाबाद खंड का परिणाम
2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान जब शाहाबाद विधानसभा क्षेत्र के आंकड़ों को अलग करके देखा गया, तो स्थिति और भी चौंकाने वाली रही। इस खंड में सपा की ऊषा वर्मा को 98,331 वोट मिले, जबकि भाजपा के जय प्रकाश को 92,161 वोट प्राप्त हुए। सपा ने इस विधानसभा क्षेत्र में भाजपा पर 6,170 वोटों की सीधी बढ़त हासिल की।
12,649 वोटों के स्विंग का गणित
2022 के विधानसभा चुनाव में जहां भाजपा सपा से 6,479 वोटों से आगे थी, वहीं 2024 के लोकसभा चुनाव में वह 6,170 वोटों से पीछे हो गई। महज दो वर्षों के भीतर शाहाबाद क्षेत्र में लगभग 12,649 वोटों का राजनीतिक झुकाव (स्विंग) दर्ज किया गया, जो सत्ताधारी दल के लिए गहन आत्मचिंतन का विषय है।
3. जमीनी हकीकत: ‘पंच प्यारों’ की घेराबंदी और जन-असंतोष
शाहाबाद में भाजपा के वोट बैंक में आई इस गिरावट को केवल जातीय समीकरणों या राष्ट्रीय लहरों से जोड़कर देखना अधूरी तस्वीर होगी। इसका एक बड़ा कारण स्थानीय स्तर पर निर्मित प्रशासनिक और राजनीतिक माहौल है।
‘पंच प्यारों’ की घेराबंदी और संवादहीनता
स्थानीय स्तर पर सत्ता के संरक्षण में सक्रिय कुछ प्रभावशाली लोगों—जिन्हें स्थानीय राजनीति में ‘पंच प्यारे’ कहा जा रहा है—ने जनप्रतिनिधि के इर्द-गिर्द ऐसा अभेद्य दायरा बना लिया, जिसने उन्हें जमीनी हकीकत से दूर कर दिया। सुबह से शाम तक आम जनता और समर्पित कार्यकर्ताओं की सुलभ पहुंच को बाधित कर दिया गया।
विकास की आड़ में निजी चमक-दमक
विकास कार्यों के नाम पर अपनी व्यक्तिगत साख और लाभ चमकाने की होड़ ने पार्टी की छवि और निष्ठावान कार्यकर्ताओं के मनोबल को गहरा आघात पहुंचाया।
कैडर का मोहभंग
चुनाव समर्पित कैडर के बल पर लड़े जाते हैं। जब आम कार्यकर्ता खुद को उपेक्षित महसूस करता है और उसकी सुनवाई बंद हो जाती है, तो वह चुनाव में निष्क्रिय हो जाता है। 2023 और 2024 में भाजपा के पिछड़ने का एक प्रमुख कारण कार्यकर्ताओं का यह मौन विरोध भी रहा।
4. सौरभ मिश्रा ‘नीरज’ का विकल्प: क्या भाजपा पाट पाएगी खाई?
शाहाबाद की वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों और भाजपा के खिसकते जनाधार के बीच पूर्व जिलाध्यक्ष सौरभ मिश्रा ‘नीरज’ की भूमिका बेहद प्रासंगिक होकर उभरी है। कार्यकर्ताओं और क्षेत्र के प्रबुद्ध वर्ग के बीच यह चर्चा आम है कि क्या सौरभ मिश्रा का चेहरा भाजपा को 2027 में जीत के शिखर पर ले जा सकता है?
सौरभ मिश्रा ‘नीरज’ के पक्ष में मजबूत बिंदु
सुलभता और कैडर पर पकड़: जिलाध्यक्ष के रूप में उनका कार्यकाल संगठन को बूथ स्तर तक सक्रिय करने के लिए जाना जाता है। वर्तमान व्यवस्था में बनी ‘संवादहीनता’ के विपरीत नीरज की छवि एक सहज, सुलभ और कार्यकर्ता-हितैषी नेता की है।
असंतोष को समेटने की क्षमता: यदि वर्तमान नेतृत्व से सवर्ण, प्रबुद्ध और समर्पित कैडर का एक वर्ग दूर छिटक रहा है, तो सौरभ मिश्रा ‘नीरज’ इस असंतोष को फिर से पार्टी के पाले में लाने के लिए एक स्वाभाविक विकल्प के रूप में देखे जाते हैं।
संस्थागत अनुभव: पूरे जिले और विशेष रूप से शाहाबाद के बूथवार प्रबंधन पर उनकी पकड़ 2024 के 6,170 वोटों के नुकसान की भरपाई करने में कारगर साबित हो सकती है।
शाहाबाद का चुनावी इतिहास साक्षी है कि यहां का मतदाता किसी भी राजनीतिक दल का स्थायी बंधक नहीं रहा है। 2022 की विधानसभा जीत के बावजूद, उसके बाद के दो लगातार चुनावों (निकाय और लोकसभा) में सपा का बेहतर प्रदर्शन भाजपा के लिए एक बड़ी राजनीतिक चेतावनी है।
यदि भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने समय रहते शाहाबाद में जारी ‘आंतरिक घेराबंदी’ को नहीं तोड़ा, आम कार्यकर्ताओं और जनता से सीधा संवाद बहाल नहीं किया और अपने सामाजिक ध्रुवीकरण को धार नहीं दी, तो सपा के बढ़ते प्रभाव के चक्रव्यूह को 2027 के विधानसभा चुनाव में भेदना भाजपा के लिए अत्यधिक चुनौतीपूर्ण साबित होगा।
शाहाबाद का सियासी गणित: बदलते रुझान, जनाधार का पुनर्गठन और 2027 की आहट

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