राज्यउत्तर प्रदेश2027 की आहट: आंकड़ों के आइने में शाहाबाद...

2027 की आहट: आंकड़ों के आइने में शाहाबाद की चुनावी सियासत और सौरभ मिश्रा‘नीरज’ की दावेदारी


लक्ष्मीकान्त पाठक। वेबवार्ता

हरदोई। 2027 के विधानसभा चुनाव की आहट के साथ शाहाबाद की सियासत में पुराने समीकरणों, बदलते मतदाता आधार और नए नेतृत्व की संभावनाओं पर चर्चा तेज हो गई है। शाहाबाद की चुनावी राजनीति को यदि 2022 विधानसभा, 2023 नगर पालिका, 2024 लोकसभा और 2026 के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR के आंकड़ों के साथ पढ़ा जाए तो तस्वीर कई महत्वपूर्ण संकेत देती है।
2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा की रजनी तिवारी ने 94,561 वोट हासिल कर सपा के आसिफ खां ‘बब्बू’ को 88,082 वोट पर रोकते हुए 6,479 वोटों से जीत दर्ज की थी। यानी भाजपा के पक्ष में जीत का अंतर बहुत बड़ा नहीं था। यही आंकड़ा 2027 के लिए इस सीट की संवेदनशीलता को समझने की पहली कड़ी है।इसके बाद 2023 के नगर पालिका चुनाव ने शाहाबाद के शहरी राजनीतिक मिजाज का दूसरा संकेत दिया। सपा की नसरीन बानो लगातार दूसरी बार नगर पालिका अध्यक्ष निर्वाचित हुईं, जबकि भाजपा प्रत्याशी संजय मिश्रा को पराजय का सामना करना पड़ा। स्थानीय चुनावी विश्लेषण में भाजपा के भीतर अंतर्कलह और भितरघात को भी हार के कारणों में गिना गया था।यह परिणाम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि नगर पालिका का क्षेत्र भाजपा विधायक रजनी तिवारी का विधानसभा क्षेत्र है। ऐसे में शहरी क्षेत्र में भाजपा प्रत्याशी की हार ने यह सवाल जरूर खड़ा किया कि विधानसभा चुनाव में भाजपा के पक्ष में रहा शहरी राजनीतिक आधार क्या उसी मजबूती से कायम है?

2024 ने बदली तस्वीर

2024 के लोकसभा चुनाव में शाहाबाद विधानसभा खंड का परिणाम इस राजनीतिक कहानी को और महत्वपूर्ण बना देता है। यहां सपा की उषा वर्मा को 92,101 वोट, जबकि भाजपा के जय प्रकाश रावत को 85,162 वोट मिले। यानी 2022 में भाजपा जिस विधानसभा क्षेत्र से 6,479 वोट आगे थी, वहीं 2024 में सपा 6,939 वोट की बढ़त लेने में सफल रही।
दोनों चुनावों के बीच देखें तो यह लगभग 13,418 वोट का राजनीतिक उलटफेर है। यही कारण है कि 2027 के लिए शाहाबाद को भाजपा की सुरक्षित सीट मानकर चलना राजनीतिक रूप से उचित नहीं होगा।

SIR ने बदला मतदाता आधार

अब 2026 का विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR इस पूरे समीकरण में सबसे बड़ा नया तत्व है। शाहाबाद विधानसभा क्षेत्र में SIR से पहले 3,68,429 मतदाता थे, जबकि पुनरीक्षण के बाद संख्या 3,28,975 रह गई। यानी कुल 39,454 मतदाताओं की कमी, लगभग 10.71 प्रतिशत।
इस बदलाव का सबसे बड़ा हिस्सा महिला मतदाताओं में दिखाई देता है। पहले 1,74,859 महिला मतदाता थीं, जो घटकर 1,47,887 रह गईं—यानी 26,972 की कमी। पुरुष मतदाता 1,93,560 से घटकर 1,81,079 रह गए, यानी 12,481 की कमी। थर्ड जेंडर मतदाता भी 10 से घटकर 9 रह गए।यहां राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बात यह है कि SIR में घटे सभी मतदाताओं को किसी एक दल के समर्थन से जोड़ना उचित नहीं होगा। लेकिन 39,454 मतदाताओं का पुनर्संयोजन इतना बड़ा है कि 2022 और 2024 के पुराने आंकड़ों को 2027 में सीधे लागू नहीं किया जा सकता। बूथवार नई मतदाता संरचना और नए मतदाताओं की भूमिका निर्णायक हो सकती है।

आंकड़ों के बीच सौरभ मिश्रा‘नीरज’ की दावेदारी

इसी बदलते राजनीतिक परिदृश्य में भाजपा के पूर्व जिलाध्यक्ष सौरभ मिश्रा ‘नीरज’ की संभावित दावेदारी चर्चा का विषय बनती दिखाई दे रही है। शाहाबाद विधानसभा क्षेत्र के गांव गुजीदेई से उनका संबंध, क्षेत्र कीसामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों की गहरी समझ और लंबे समय कासंगठनात्मक अनुभव उनकी दावेदारी को अन्य संभावित चेहरों से अलग आधार देता है।
नीरज केवल चुनावी प्रत्याशी के रूप में नहीं, बल्कि लंबे समय से संगठन में सक्रिय चेहरे के रूप में देखे जाते हैं। जिला संगठन में उनकी लंबी भूमिका, कार्यकर्ताओं के बीच संपर्क और युवाओं में पकड़ उनके पक्ष में महत्वपूर्ण राजनीतिक पूंजी बन सकती है। विशेष रूप से तब, जब 2024 के परिणाम ने यह संकेत दिया है कि शाहाबाद में भाजपा को केवल अपने पुराने वोट बैंक पर निर्भर रहने के बजाय नए सिरे से सामाजिक और संगठनात्मक समीकरण बनाने होंगे।

भाजपा के सामने असली सवाल

शाहाबाद में भाजपा के सामने सवाल केवल यह नहीं है कि 2022 में पार्टी जीती थी। असली सवाल यह है कि क्या 2022 वाला चुनावी समीकरण 2027 में भी उसी रूप में मौजूद है?2022 में भाजपा की जीत 6,479 वोट से हुई। 2023 में शहरी निकाय में सपा ने अध्यक्ष पद हासिल किया। 2024 में सपा ने शाहाबाद विधानसभा खंड में भाजपा पर 6,939 वोट की बढ़त बना ली। इसके बाद SIR में मतदाता सूची का आकार ही 39,454 मतदाताओं से बदल गया।इन चार पड़ावों को एक साथ देखने पर शाहाबाद की राजनीति में एक बात स्पष्ट दिखाई देती है कि 2027 का चुनाव पुराने आंकड़ों के सहारे नहीं जीता जा सकता।भाजपा के लिए यह प्रत्याशी चयन और संगठन दोनों की परीक्षा होगी। वहीं सपा के लिए 2024 की बढ़त को विधानसभा चुनाव तक बनाए रखना चुनौती होगी। ऐसे में भाजपा यदि क्षेत्रीय स्वीकार्यता,संगठनात्मक अनुभव, युवाओं में पकड़ और बूथ स्तर पर प्रभाव रखने वाले चेहरे को आगे करती है, तो वह बदलते समीकरण को फिर अपने पक्ष में मोड़ने की कोशिश कर सकती है।यही वह बिंदु है जहां सौरभ मिश्रा ‘नीरज’ की दावेदारी राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि पार्टी उन्हें प्रत्याशी बनाती है तो चुनाव केवल मौजूदा विधायक के खिलाफ मुकाबला नहीं होगा, बल्कि भाजपा के लिए शाहाबाद में बदलते राजनीतिक समीकरण को पुनर्गठित करने की कोशिश भी होगी।
शाहाबाद में 2027 की लड़ाई इसलिए केवल सत्ता और विपक्ष की लड़ाई नहीं दिख रही; यह पुराने जनाधार, बदलते मतदाता आधार, शहरी संकेतों और नए नेतृत्व की स्वीकार्यता के बीच होने वाली राजनीतिक परीक्षा बनने जा रही है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

- Advertisement -spot_img
- Advertisement -spot_img

Latest

- Advertisement -spot_img
- Advertisement -

More articles

- Advertisement -
- Advertisement -