इतिहास साक्षी है कि हिंसा को अपनाने वाले समाज अक्सर मुख्यधारा से अलग-थलग पड़ जाते हैं। सामाजिक बहिष्कार, आर्थिक बहिष्कार और राजनीतिक हाशिए पर धकेल दिए जाना उनका भाग्य बन जाता है। चाहे वह व्यक्तिगत स्तर हो या सामूहिक, हिंसा पतन का रास्ता साबित होती है। आज जब कुछ दलित समुदाय के कुछ तथाकथित नेता और कार्यकर्ता अन्याय के विरुद्ध हिंसा के रास्ते को जायज ठहरा रहे हैं, तो इतिहास और संविधान दोनों की रोशनी में इस पर गंभीर चिंतन आवश्यक है।
1857 की क्रांति, जिसे प्रथम स्वतंत्रता संग्राम भी कहा जाता है, इसका स्पष्ट उदाहरण है। गुर्जर, सांसी, कंजर आदि समुदायों ने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध सशस्त्र विद्रोह में सक्रिय भूमिका निभाई। मेरठ, बुलंदशहर, बिजनौर जैसे क्षेत्रों में गुर्जरों का विद्रोह ब्रिटिशों के लिए सबसे बड़ी चुनौती बना। परिणामस्वरूप ब्रिटिश सरकार ने क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट (1871) के तहत इन समुदायों को ‘अपराधी जाति’ घोषित कर दिया। उनके गांवों पर निगरानी, आवागमन पर प्रतिबंध और सामाजिक-आर्थिक बहिष्कार का सिलसिला शुरू हुआ। आज भी इनमें से कई समुदाय मुख्यधारा से अलग-थलग महसूस करते हैं। हिंसा ने स्वतंत्रता की लड़ाई को प्रेरित किया, लेकिन शांतिपूर्ण विकास और सामाजिक स्वीकृति के रास्ते को अवरुद्ध कर दिया।
वर्तमान में कुछ दलित संगठन अन्याय, अत्याचार और शोषण के विरुद्ध हिंसा को विकल्प मान रहे हैं। ऊपरी तौर पर यह प्रतिरोध जायज लग सकता है, लेकिन दीर्घकालिक परिणाम खतरनाक हैं। हिंसा से समाज का ध्रुवीकरण होता है, सामान्य नागरिक दूरी बना लेते हैं। किराए पर मकान, व्यापार, सामाजिक संबंध—सभी क्षेत्रों में अविश्वास बढ़ता है। इतिहास बताता है कि हिंसा करने वाले समूह को न केवल राज्य की शक्ति बल्कि समाज की सामूहिक इच्छाशक्ति भी अलग-थलग कर देती है।
बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर ने स्पष्ट रूप से संवैधानिक मार्ग पर जोर दिया। संविधान सभा में उन्होंने कहा था: “संवैधानिक तरीकों से सामाजिक-आर्थिक उद्देश्यों को प्राप्त करना चाहिए। जहां संवैधानिक रास्ते खुले हैं, वहां असंवैधानिक तरीकों—खूनी क्रांति, सिविल डिसओबिडिएंस या सत्याग्रह—का कोई औचित्य नहीं। ये अनार्की की व्याकरण हैं।” अंबेडकर जानते थे कि लोकतंत्र में शिक्षा, संगठन और मताधिकार ही असली हथियार हैं। हिंसा से न्याय नहीं, अराजकता फैलती है।
कांशीराम जी ने बाबा साहेब के इन्हीं सिद्धांतों को अमल में उतारा। बिना एक भी उंगली उठाए, बिना हिंसा के उन्होंने बहुजन समाज पार्टी (BSP) का निर्माण किया। BAMCEF और DS-4 के माध्यम से जागरूकता फैलाई। 1980-90 के दशक में उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में BSP ने सत्ता हासिल की और देश की तीसरी बड़ी राजनीतिक शक्ति के रूप में खुद को स्थापित किया। मायावती के मुख्यमंत्री बनने और बहुजन हित के कार्यक्रमों ने साबित किया कि संवैधानिक रास्ता सफल है। कांशीराम जी का नारा था—“पहले वोट की ताकत, फिर ताकत का वोट।” उन्होंने दिखाया कि लोकतंत्र की नसों में बहने वाली शक्ति हिंसा नहीं, संगठित वोट है।
बौद्ध धर्म, जिसमें बाबा साहेब ने दीक्षा ली, अहिंसा पर आधारित है। बुद्ध की शिक्षाएं करुणा, मैत्री और अहिंसा को सर्वोपरि मानती हैं। संविधान भी अहिंसा और समानता का प्रतीक है। अनुच्छेद 14, 15, 17 और 21 जैसे प्रावधान शांतिपूर्ण संघर्ष और कानूनी उपचार प्रदान करते हैं।
आज के तथाकथित अंबेडकरवादियों को बाबा साहेब और कांशीराम जी से सबक लेना चाहिए। हिंसा का रास्ता अपनाकर वे 1857 के उन विद्रोही समुदायों की तरह समाज से अलग न हो जाएं। दलित-बहुजन समाज को शिक्षा, आर्थिक सशक्तिकरण और राजनीतिक एकता से आगे बढ़ना है। हिंसा से न्याय नहीं मिलता, बल्कि पीढ़ियों का पतन होता है।
लोकतंत्र में हिंसा अनुचित है। यह न केवल संवैधानिक मूल्यों का उल्लंघन है, बल्कि स्वयं के भविष्य को अंधकारमय बनाती है। शांतिपूर्ण, संवैधानिक और लोकतांत्रिक संघर्ष ही सच्चा मार्ग है। इतिहास गवाह है—हिंसा से कभी कोई समाज ऊंचा नहीं उठा, बल्कि गिरा है।

