लेखतनवीर जाफरीईरान कैसे बना महाशक्ति

ईरान कैसे बना महाशक्ति

— तनवीर जाफ़री — 

अमेरिका और इज़राइल द्वारा ईरान पर जून 2025 में 12 दिन का और उसके बाद 28 फरवरी 2026 को लगभग 40 दिन का युद्ध थोपा गया था। अचानक थोपे गए इस युद्ध में हालांकि ईरान को जान-माल का काफ़ी नुकसान हुआ, परंतु ईरान ने भी परमाणु शक्ति संपन्न हुए बिना ही इन दोनों परमाणु शस्त्र संपन्न देशों को ऐसा करारा जवाब दिया कि आखिरकार स्वयं को विश्वविजेता कहलाने वाले अमेरिका को युद्ध से बाहर निकलने के रास्ते तलाशने पड़े। इतने कम समय के युद्ध में अमेरिका व इज़राइल को इतना नुकसान पहले कभी नहीं उठाना पड़ा। आज अमेरिका से लेकर इज़राइल तक की जनता यह स्वीकार कर रही है कि इस युद्ध में हर मोर्चे पर ईरान ही विजेता रहा है। क्योंकि ईरान-अमेरिका द्वारा युद्धोपरांत हस्ताक्षर किए गए सहमति पत्र में स्वीकार की गई अधिकांश बातें ईरान के हक़ में तथा ईरान को फ़ायदा पहुँचाने वाली हैं। हालांकि अमेरिका द्वारा पुनः युद्धविराम के समझौते का उल्लंघन कर ईरान पर कई बड़े हमले करने व ईरान द्वारा भी कुवैत व बहरीन में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर कड़ी जवाबी कार्रवाई करने के समाचार हैं। ऐसे में सवाल यह है कि लगभग 50 वर्षों से वैश्विक प्रतिबंधों का भी सामना करने वाले इस देश ने अत्यंत सीमित संसाधनों के बावजूद अमेरिका व इज़राइल जैसे शक्तिशाली, चालबाज़ व छल-कपट में माहिर देशों का एक साथ मुक़ाबला कैसे किया?

इसमें कोई संदेह नहीं कि ईरानी लोग मुसलमानों के उस शिया वर्ग से संबंध रखते हैं, जो हज़रत अली, हज़रत इमाम हुसैन व कर्बला की उस घटना से प्रेरणा लेते हैं, जो असत्य, अन्याय व अत्याचार के आगे कभी सिर न झुकाने की सीख देती है। इसके साथ-साथ ईरान ने धरातल पर जो दूरगामी व सधी हुई रणनीति अपनाई, उसी ने ईरान को न केवल अमेरिका व इज़राइल जैसे परमाणु शक्ति संपन्न देशों पर विजय दिलाई, बल्कि ईरान को विश्व की महाशक्तियों की सूची में भी शामिल कर दिया। अमेरिका व इज़राइल की नाराज़गी के भय से पूरे युद्ध के दौरान आधिकारिक रूप से किसी भी देश ने ईरान की सहायता नहीं की, न ही ईरान ने खाने-पीने की चीज़ों व दवाइयों तक के लिए कोई अपील जारी की। युद्ध शुरू होते ही रोटी, पेट्रोल और डीज़ल ईरानियों के लिए निःशुल्क कर दिए गए, ताकि उन्हें युद्ध के बोझ का एहसास न हो। अमेरिकी व इज़राइली भीषण बमबारी के बावजूद एक भी ईरानी नागरिक ने पलायन नहीं किया। हाँ, विदेशों में रहने वाले हज़ारों ईरानी अपने देश की रक्षा की गरज़ से स्वदेश वापस ज़रूर लौटे। युद्ध के दौरान कई प्रमुख मंत्री अमेरिका विरोधी प्रदर्शनों में प्रदर्शनकारियों के साथ निडर होकर सारी-सारी रात सड़कों पर नज़र आए। हद तो यह है कि ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान स्वयं बाज़ारों में जाकर वस्तुओं के मूल्य व जनसुविधाओं का जायज़ा लेते नज़र आए।

सवाल यह है कि ईरान के लोगों व वहाँ के नेतृत्व में इतना दृढ़ विश्वास आया कहाँ से? तो आइए नज़र डालते हैं कुछ उन छोटी-छोटी सामान्य बातों पर, जिन्हें भले ही दुनिया के अधिकांश देशों के लोग व वहाँ का नेतृत्व सम्मान या सम्पन्नता की नज़रों से क्यों न देखता हो, परंतु ईरान के लोगों ने इनसे दूर रहना ही राष्ट्रहित में समझा। मिसाल के तौर पर ईरान के सुप्रीम लीडर ने अपना निजी मकान तक नहीं खरीदा। ईरान के मंत्रियों और शीर्ष सैन्य अधिकारियों व अन्य आला अफ़सरों के बच्चे विदेश में पढ़ाई करने नहीं जाते। ईरानी सरकार का कोई भी सदस्य और प्रशासनिक अधिकारी विदेशी बैंकों में पैसे जमा नहीं कर सकता। ईरान का कोई भी मंत्री, जनरल या उच्चाधिकारी देश के बाहर कोई दूसरा मकान नहीं बनाता। ईरान के सुप्रीम लीडर बिना दिखावे व प्रचार के रोज़ाना 18 घंटे काम करते हैं। वहाँ कोई भी अमेरिकी या यूरोपीय शिक्षण संस्थान नहीं हैं। ईरान में साक्षरता दर 97 प्रतिशत है क्योंकि शिक्षा मुफ़्त है। इसीलिए वहाँ के अधिकांश लोग डॉक्टर, इंजीनियर, प्रोफ़ेसर आदि हैं, जिसका साक्षात् परिणाम ईरान ने पिछले युद्ध के दौरान अपनी ड्रोन व मिसाइल क्षमता को साबित कर दुनिया को दिखा भी दिया।

तमाम प्रतिबंधों के बावजूद वहाँ जनता की जेब काटने जैसी कोई टैक्स व्यवस्था नहीं है। यदि परिस्थितिवश वहाँ मूल्यवृद्धि होती भी है, तो दूसरी तरफ़ सुप्रीम लीडर के बजट से लोगों को साथ-साथ उतनी ही राहत भी दी जाती है। वहाँ महिलाएँ कम्युनिटी प्रोग्राम में हिस्सा लेती हैं। प्रसव निःशुल्क हैं। साथ ही बच्चे के जन्म पर माँ के खाते में कम से कम 20,000 रुपये का उपहार भी भेजा जाता है। प्रत्येक इलाज का 70 प्रतिशत सरकार देती है, जबकि 30 प्रतिशत मरीज़ देता है। चोरी, डकैती, बेईमानी, बलात्कार जैसे अपराध बिल्कुल नहीं हैं। चंदा या दान की चोरी की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती। वहाँ रॉयल कल्चर या प्रोटोकॉल जैसी कोई चीज़ नहीं है। ईरान भिखारी रहित देश है। वहाँ के नियमानुसार पुलिस सूर्यास्त से सूर्योदय तक किसी अपराधी के घर में नहीं घुस सकती, क्योंकि वह समय उसकी पत्नी और बच्चों का होता है। वहाँ की जेलें खाली हैं, और अगर कोई अपराधी जेल जाता भी है, तो उसे जेल में काम दिया जाता है, जिसकी तनख़्वाह/मज़दूरी उसके घर भेजी जाती है, ताकि उसके परिवार के लोग पैसों के अभाव में किसी अपराध में शामिल न हों।

ईरान में धर्म, जाति जैसी कोई विसंगति नहीं है, इसलिए कभी सांप्रदायिक व जातीय दंगे नहीं होते। छुआछूत, जादू-टोना जैसी कोई प्रथा नहीं है। यहाँ विभिन्न धर्मों के मानने वाले व उनके अनेक पूजा-स्थल हैं। धर्म के मामलों में सभी को पूरी आज़ादी है। यहाँ अध्यापकों को सर्वाधिक सम्मान दिया जाता है। घरेलू नौकर रखने का यहाँ चलन नहीं है। अपने सभी घरेलू काम स्वयं करने पड़ते हैं। इतने अंतरराष्ट्रीय दबाव के बावजूद यहाँ के लोगों के चेहरों पर हँसी, मुस्कान व संतोष नज़र आता है। कोई भी व्यक्ति चिड़ा, कुढ़ा या गुस्से में नज़र नहीं आता। ईरानियों के इसी स्वभाव, हौसले, जज़्बे, कुर्बानी व उनके ईमान की वजह से ही दुनिया के तमाम देश जहाँ अमेरिका व इज़राइल से नफ़रत करने लगे हैं, वहीं वे ईरान से प्यार भी कर रहे हैं और उसका साथ भी दे रहे हैं। इन्हीं व इन जैसे अनेक कारणों की वजह से ही लगभग 50 वर्षों से वैश्विक प्रतिबंध झेलने व अमेरिका जैसी महाशक्ति से लोहा लेने वाला देश आज न केवल ‘विजेता’ बनकर उभरा है, बल्कि इसने विश्व की महाशक्तियों में भी अपना नाम दर्ज करवा लिया है।

 

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