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कच्चे तेल की कीमत घटी, फिर भी सस्ता क्यों नहीं हुआ पेट्रोल-डीजल? जानिए क्यों उपभोक्ताओं तक नहीं पहुंच रहा राहत का फायदा

नई दिल्ली | कारोबार डेस्क | वेब वार्ता।

अंतरराष्ट्रीय बाजार में Crude Oil Price एक बार फिर ईरान-अमेरिका तनाव से पहले के स्तर तक पहुंच गई है। वैश्विक बेंचमार्क Brent Crude लगभग 72 डॉलर प्रति बैरल के आसपास कारोबार कर रहा है, जबकि भारत के लिए आयातित कच्चे तेल की औसत कीमत भी पहले की तुलना में काफी नीचे आई है। इसके बावजूद देशभर में Petrol Price और Diesel Price में कोई राहत नहीं मिली है। ऐसे में आम उपभोक्ताओं के मन में सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब कच्चा तेल सस्ता हो चुका है, तो पेट्रोल और डीजल के दाम अब तक क्यों नहीं घटे? आखिर तेल कंपनियों की मूल्य निर्धारण प्रणाली क्या है, सरकार की भूमिका कितनी है और आने वाले महीनों में क्या लोगों को राहत मिल सकती है? आइए इस पूरे विषय को विस्तार से समझते हैं।

संक्षिप्त वार्ता

  • ब्रेंट क्रूड लगभग 72 डॉलर प्रति बैरल तक लौटा
  • ईरान संकट के दौरान कीमतें 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंची थीं
  • भारत अपनी जरूरत का लगभग 88 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है
  • पेट्रोल-डीजल की खुदरा कीमतों में अभी तक कोई बदलाव नहीं
  • विशेषज्ञों के अनुसार राहत मिलने में 2 से 3 महीने लग सकते हैं

कैसे गिरे अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम?

पिछले कुछ महीनों में पश्चिम एशिया में तनाव के कारण वैश्विक ऊर्जा बाजार में जबरदस्त उतार-चढ़ाव देखने को मिला। ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते तनाव तथा अमेरिका की सैन्य गतिविधियों के चलते निवेशकों को आशंका थी कि दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण तेल आपूर्ति लाइन Hormuz Strait प्रभावित हो सकती है। इसी आशंका के कारण कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़कर लगभग 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थीं।

हालांकि बाद में अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम होने तथा समुद्री मार्गों के सामान्य होने के संकेत मिलने के बाद बाजार में घबराहट कम हुई। परिणामस्वरूप तेल की कीमतें लगातार नीचे आने लगीं और अब वे युद्ध से पहले के स्तर के आसपास पहुंच चुकी हैं।

भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है कच्चे तेल का सस्ता होना?

भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा Crude Oil Importer है। देश अपनी कुल आवश्यकता का लगभग 88 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में थोड़ा सा बदलाव भी भारत की अर्थव्यवस्था पर सीधा प्रभाव डालता है।

सस्ता कच्चा तेल मिलने से भारत का आयात बिल घटता है, विदेशी मुद्रा की बचत होती है, चालू खाते का घाटा कम हो सकता है तथा महंगाई पर भी सकारात्मक असर पड़ता है। यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की हर बड़ी हलचल पर भारत की सरकार, रिजर्व बैंक और तेल कंपनियां लगातार नजर बनाए रखती हैं।

क्या है ‘इंडियन बास्केट’ और इससे कैसे तय होती है कीमत?

भारत अलग-अलग देशों से विभिन्न प्रकार का कच्चा तेल खरीदता है। इनमें रूस, इराक, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, अमेरिका, ब्राजील, मैक्सिको सहित लगभग 40 देशों का तेल शामिल होता है। इन सभी स्रोतों से खरीदे गए तेल की औसत कीमत को Indian Basket Price कहा जाता है।

यानी भारत सीधे केवल ब्रेंट क्रूड के आधार पर तेल नहीं खरीदता। इसलिए कई बार वैश्विक बाजार में ब्रेंट की कीमत तेजी से गिरने के बावजूद भारतीय बास्केट की औसत कीमत कुछ समय तक अपेक्षाकृत अधिक बनी रहती है। यही वजह है कि खुदरा ईंधन कीमतों में तत्काल बदलाव दिखाई नहीं देता।

अगर कच्चा तेल सस्ता हो गया तो पेट्रोल-डीजल तुरंत सस्ता क्यों नहीं होता?

यही सबसे बड़ा सवाल है। आम धारणा है कि जैसे ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत गिरती है, वैसे ही पेट्रोल और डीजल भी सस्ता हो जाना चाहिए। लेकिन वास्तविकता इससे कहीं अधिक जटिल है।

भारत में तेल कंपनियां आज जो पेट्रोल बेच रही हैं, उसका कच्चा तेल कई सप्ताह या कई बार दो से ढाई महीने पहले खरीदा गया होता है। उस समय अंतरराष्ट्रीय कीमतें काफी अधिक हो सकती थीं। इसके बाद उस तेल को जहाजों के माध्यम से भारत लाया जाता है, रिफाइनरियों में उसकी प्रोसेसिंग होती है, फिर उसे विभिन्न राज्यों तक पहुंचाया जाता है और अंत में पेट्रोल पंपों तक सप्लाई की जाती है।

यानी अंतरराष्ट्रीय बाजार में आज जो कीमत दिखाई दे रही है, उसका असर उपभोक्ताओं तक पहुंचने में समय लगता है। यही कारण है कि विशेषज्ञ तत्काल राहत की उम्मीद नहीं जता रहे हैं।

पेट्रोल और डीजल की कीमत किन-किन चीजों से मिलकर बनती है?

घटकभूमिका
कच्चे तेल की कीमतअंतरराष्ट्रीय बाजार से खरीद
रिफाइनिंग लागतकच्चे तेल को पेट्रोल-डीजल में बदलना
परिवहन एवं वितरणरिफाइनरी से डिपो और पेट्रोल पंप तक
केंद्र सरकार का उत्पाद शुल्कExcise Duty
राज्य सरकार का VATराज्य के अनुसार अलग-अलग
डीलर कमीशनपेट्रोल पंप संचालकों का मार्जिन

स्पष्ट है कि कच्चा तेल खुदरा कीमत का केवल एक हिस्सा होता है। टैक्स, रिफाइनिंग, परिवहन और अन्य लागतें भी अंतिम कीमत को प्रभावित करती हैं।

तेल कंपनियां फिलहाल क्या कर रही हैं?

उद्योग से जुड़े सूत्रों के अनुसार सार्वजनिक क्षेत्र की तेल विपणन कंपनियां वर्तमान में पेट्रोल की बिक्री पर अपेक्षाकृत बेहतर मार्केटिंग मार्जिन प्राप्त कर रही हैं, जबकि डीजल में लाभ का स्तर अभी भी सीमित बताया जा रहा है। पिछले महीनों में अंतरराष्ट्रीय बाजार में आए भारी उतार-चढ़ाव के दौरान कंपनियों पर लागत का दबाव बढ़ा था। ऐसे में कंपनियां पहले अपने वित्तीय संतुलन को मजबूत करने की कोशिश कर रही हैं।

विश्लेषकों का मानना है कि यदि अगले कुछ सप्ताह तक कच्चे तेल की कीमतें स्थिर बनी रहती हैं, तभी कंपनियां उपभोक्ताओं को राहत देने पर विचार कर सकती हैं।

सरकार की भूमिका और टैक्स नीति क्यों है महत्वपूर्ण?

भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतें पूरी तरह केवल अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों पर निर्भर नहीं करतीं। केंद्र सरकार द्वारा लगाए जाने वाले Excise Duty और राज्य सरकारों के Value Added Tax (VAT) का भी अंतिम खुदरा मूल्य पर बड़ा प्रभाव पड़ता है। पिछले कुछ वर्षों में कई अवसरों पर देखा गया है कि जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट आई, तब सरकारों ने करों में समायोजन कर राजस्व संतुलित रखने का प्रयास किया। वहीं, कीमतों में तेज वृद्धि के दौरान उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए उत्पाद शुल्क में कटौती भी की गई।

ऊर्जा क्षेत्र के विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार को एक ओर उपभोक्ताओं को राहत देने और दूसरी ओर राजकोषीय संतुलन बनाए रखने के बीच संतुलन साधना पड़ता है। पेट्रोलियम उत्पादों से मिलने वाला कर राजस्व केंद्र और राज्यों दोनों की आय का महत्वपूर्ण स्रोत है। इसलिए केवल कच्चे तेल की कीमत कम होने से खुदरा दरों में स्वतः कमी आना आवश्यक नहीं होता।

क्यों बंद हुई अंतर-मंत्रालयी ब्रीफिंग?

पश्चिम एशिया में सैन्य तनाव बढ़ने के बाद केंद्र सरकार ने ऊर्जा आपूर्ति की स्थिति पर नजर रखने के लिए विभिन्न मंत्रालयों के अधिकारियों की नियमित बैठकें शुरू की थीं। इन बैठकों में पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय, वित्त मंत्रालय तथा अन्य संबंधित विभागों के अधिकारी शामिल होते थे और आपूर्ति, आयात तथा संभावित जोखिमों की समीक्षा करते थे।

बाजार में तनाव कम होने और समुद्री आपूर्ति सामान्य होने के संकेत मिलने के बाद इन बैठकों की आवृत्ति पहले कम की गई और बाद में नियमित ब्रीफिंग रोक दी गई। विशेषज्ञ इसे इस बात का संकेत मानते हैं कि फिलहाल भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर तत्काल संकट नहीं है, हालांकि सरकार स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए है।

विशेषज्ञ क्या कहते हैं?

ऊर्जा बाजार से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि उपभोक्ताओं को तत्काल राहत मिलने की संभावना सीमित है। उनका तर्क है कि भारत तक तेल पहुंचने, उसके रिफाइन होने और खुदरा नेटवर्क तक वितरण में कई सप्ताह का समय लगता है। इसलिए आज खरीदे गए अपेक्षाकृत सस्ते कच्चे तेल का प्रभाव आने वाले महीनों में दिखाई देगा।

कुछ विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें लगातार नीचे बनी रहती हैं और पश्चिम एशिया में नया तनाव उत्पन्न नहीं होता, तो आगामी महीनों में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में आंशिक राहत मिल सकती है। हालांकि यह निर्णय अंततः तेल विपणन कंपनियों और सरकार की नीतिगत प्राथमिकताओं पर निर्भर करेगा।

भारत की अर्थव्यवस्था को क्या होगा लाभ?

कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट केवल ईंधन तक सीमित प्रभाव नहीं डालती, बल्कि इसका असर पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। भारत का आयात बिल कम होने से विदेशी मुद्रा की बचत होती है, चालू खाते के घाटे (Current Account Deficit) में कमी आने की संभावना रहती है और रुपये पर दबाव भी घट सकता है।

इसके अलावा परिवहन लागत कम होने से लॉजिस्टिक्स सेक्टर को राहत मिल सकती है। यदि यह राहत उद्योगों तक पहुंचती है तो उत्पादन लागत घट सकती है, जिससे खाद्य पदार्थों, उपभोक्ता वस्तुओं और अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतों पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। इससे महंगाई नियंत्रित रखने में मदद मिल सकती है।

महंगाई और आम उपभोक्ता पर संभावित असर

यदि आने वाले महीनों में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में कटौती होती है, तो इसका सीधा लाभ परिवहन, कृषि, उद्योग और सेवा क्षेत्र को मिलेगा। सार्वजनिक परिवहन से लेकर ट्रक परिवहन तक लागत कम होने की संभावना होगी, जिसका प्रभाव धीरे-धीरे रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों पर भी दिखाई दे सकता है।

हालांकि विशेषज्ञ यह भी स्पष्ट करते हैं कि केवल कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट से महंगाई पूरी तरह नियंत्रित नहीं होती। वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला, मानसून, खाद्य उत्पादन, मुद्रा विनिमय दर और कर संरचना जैसे कई अन्य कारक भी कीमतों को प्रभावित करते हैं।

क्या सितंबर तक मिल सकती है राहत?

ऊर्जा बाजार के कई विश्लेषकों का अनुमान है कि यदि वर्तमान परिस्थितियां बनी रहती हैं और वैश्विक बाजार में कोई नया भू-राजनीतिक संकट उत्पन्न नहीं होता, तो सितंबर तक भारतीय उपभोक्ताओं को पेट्रोल और डीजल की कीमतों में कुछ राहत मिल सकती है। इस अवधि तक तेल कंपनियों के पास अपेक्षाकृत कम कीमत पर खरीदा गया कच्चा तेल बाजार में उपलब्ध होने लगेगा और यदि सरकार भी कर ढांचे में कोई बदलाव करती है, तो खुदरा कीमतों में कमी की संभावना बढ़ सकती है।

अब आगे क्या होगा?

  • वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों पर लगातार नजर रहेगी।
  • पश्चिम एशिया की भू-राजनीतिक स्थिति राहत या जोखिम तय करेगी।
  • यदि कीमतें लंबे समय तक स्थिर रहीं तो तेल कंपनियां खुदरा कीमतों की समीक्षा कर सकती हैं।
  • सरकार कर ढांचे और राजस्व संतुलन को ध्यान में रखते हुए निर्णय ले सकती है।
  • महंगाई नियंत्रण और त्योहारी सीजन को देखते हुए उपभोक्ताओं को सीमित राहत मिलने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

निष्कर्ष

अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आई गिरावट भारत के लिए निश्चित रूप से सकारात्मक संकेत है, लेकिन इसका लाभ उपभोक्ताओं तक पहुंचने की प्रक्रिया तत्काल नहीं होती। आयात, रिफाइनिंग, वितरण, कर संरचना और तेल कंपनियों की मूल्य निर्धारण नीति जैसे अनेक कारक खुदरा कीमतों को प्रभावित करते हैं। इसलिए केवल वैश्विक बाजार में कीमतें घटने भर से पेट्रोल और डीजल के दाम तुरंत कम नहीं हो जाते। यदि आने वाले महीनों में वैश्विक बाजार स्थिर रहता है और सरकार तथा तेल कंपनियां अनुकूल निर्णय लेती हैं, तो भारतीय उपभोक्ताओं को राहत मिलने की संभावना बढ़ सकती है। फिलहाल पूरे घटनाक्रम पर ऊर्जा बाजार और सरकार दोनों की नजर बनी हुई है।

 

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