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अमेरिका की सख्त नीति और भारतीय टेक कर्मियों का बढ़ता संकट

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-कांतिलाल मांडोत- Kantilal Mandot
अमेरिका में भारतीय टेक पेशेवरों पर छाया संकट अब केवल नौकरी तक सीमित नहीं रह गया है बल्कि यह उनके भविष्य परिवार बच्चों की पढ़ाई और पूरी जीवन व्यवस्था पर असर डालने लगा है। पिछले कुछ महीनों में अमेरिका की बड़ी टेक कंपनियों में बड़े पैमाने पर छंटनी हुई है। मेटा अमेजोन  और ओरेकल जैसी कंपनियों ने हजारों कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखाया है। इन छंटनियों में सबसे अधिक प्रभावित भारतीय कर्मचारी हुए हैं क्योंकि अमेरिकी टेक सेक्टर में एच वन बी वीजा पर काम करने वाले पेशेवरों की संख्या बहुत बड़ी है। अनुमान है कि करीब पंद्रह हजार भारतीय टेक कर्मियों की नौकरी चली गई है और अब उनके सामने डिपोर्टेशन का खतरा खड़ा हो गया है।
अमेरिका का एच वन बी वीजा सिस्टम लंबे समय से भारतीय इंजीनियरों और आईटी पेशेवरों के लिए अवसर का बड़ा माध्यम रहा है। हर साल लाखों भारतीय युवा अमेरिका जाकर वहां की टेक कंपनियों में काम करते रहे हैं। बेहतर वेतन आधुनिक जीवनशैली और वैश्विक अवसरों की वजह से अमेरिका भारतीय युवाओं का सपना माना जाता रहा है। लेकिन अब वही सपना डर और असुरक्षा में बदलता दिखाई दे रहा है। नौकरी जाने के बाद एच वन बी वीजा धारकों को केवल साठ दिन का समय मिलता है जिसमें उन्हें नई नौकरी ढूंढनी होती है। यदि इस समय के भीतर नया नियोक्ता नहीं मिलता तो उनका वीजा स्टेटस समाप्त हो सकता है और उन्हें अमेरिका छोड़ना पड़ सकता है।
पहले स्थिति इतनी कठिन नहीं थी क्योंकि टेक इंडस्ट्री में लगातार भर्ती होती रहती थी। नौकरी जाने के बाद भी कुछ ही दिनों में नया अवसर मिल जाता था। लेकिन अब वैश्विक आर्थिक सुस्ती आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित ऑटोमेशन और कंपनियों की लागत घटाने की नीति के कारण नई नौकरियां कम हो गई हैं। इंटरव्यू प्रक्रिया लंबी हो चुकी है और कंपनियां विदेशी कर्मचारियों को स्पॉन्सर करने से बच रही हैं। इसका सबसे बड़ा असर भारतीय पेशेवरों पर पड़ा है क्योंकि वे एच वन बी वीजा पर पूरी तरह निर्भर हैं। अमेरिकी प्रशासन की नई सख्त इमिग्रेशन नीति ने हालात को और गंभीर बना दिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की नीतियों के बाद विदेशी कर्मचारियों की जांच और दस्तावेज सत्यापन काफी कड़ा कर दिया गया है। छोटी सी गलती भी वीजा रद्द होने का कारण बन सकती है। अब केवल नौकरी होना पर्याप्त नहीं है बल्कि कंपनी को यह साबित करना पड़ रहा है कि उस पद के लिए अमेरिकी नागरिक उपलब्ध नहीं था। इससे भारतीयों के लिए नौकरी पाना पहले से ज्यादा कठिन हो गया है।
ग्रीन कार्ड प्रक्रिया में बदलाव ने भी भारतीयों की चिंता बढ़ा दी है। पहले अमेरिका में रहते हुए एडजस्टमेंट ऑफ स्टेटस के जरिए ग्रीन कार्ड प्रक्रिया पूरी हो जाती थी लेकिन अब नई नीति के तहत आवेदकों को अपने देश लौटकर अमेरिकी दूतावास से प्रक्रिया पूरी करनी होगी। इससे न केवल समय बढ़ेगा बल्कि नौकरी और अमेरिका वापसी दोनों पर अनिश्चितता पैदा होगी। भारतीय पेशेवरों के लिए यह स्थिति इसलिए भी कठिन है क्योंकि ग्रीन कार्ड बैकलॉग में भारतीयों की संख्या सबसे अधिक है। लाखों भारतीय वर्षों से इंतजार कर रहे हैं और कई मामलों में प्रतीक्षा अवधि दस से पंद्रह साल तक पहुंच चुकी है।
इस संकट का असर केवल नौकरी तक सीमित नहीं है बल्कि यह भारतीय परिवारों के सामाजिक और मानसिक जीवन को भी प्रभावित कर रहा है। अमेरिका में रहने वाले कई भारतीय परिवार अब भविष्य को लेकर असमंजस में हैं। बच्चों की पढ़ाई घर की ईएमआई स्वास्थ्य बीमा और जीवनसाथी के वीजा जैसी समस्याएं लगातार बढ़ रही हैं। कई परिवार बैकअप प्लान बना रहे हैं और भारत लौटने की संभावना पर विचार कर रहे हैं। कुछ लोग अपने बच्चों को भारतीय स्कूलों में दाखिला दिलाने की तैयारी कर रहे हैं जबकि कुछ परिवार आर्थिक बचत बढ़ाने में जुट गए हैं।
भारतीय इंजीनियरों की स्थिति इसलिए भी कठिन हो गई है क्योंकि नौकरी मिलने के बावजूद वीजा स्पॉन्सरशिप आसान नहीं रही। अब कंपनियां हर नियुक्ति में ज्यादा दस्तावेज मांग रही हैं। उम्मीदवार की भूमिका वेतन अनुभव और विशेषज्ञता का विस्तृत रिकॉर्ड देना पड़ रहा है। यदि किसी सॉफ्टवेयर इंजीनियर की नौकरी जाती है तो वह किसी छोटे या अलग क्षेत्र के काम में जाकर एच वन बी स्टेटस नहीं बचा सकता। उसे उसी स्तर की नौकरी और लगभग समान वेतन वाली भूमिका ही ढूंढनी होगी। इससे विकल्प और सीमित हो जाते हैं। अमेरिका में रह रहे भारतीय पेशेवरों के अनुभव इस संकट की गंभीरता को साफ दिखाते हैं। कई इंजीनियर सैकड़ों आवेदन भेजने के बाद भी नई नौकरी नहीं पा रहे हैं। कंपनियों की भर्ती प्रक्रिया कई महीनों तक चल रही है जबकि वीजा नियम केवल साठ दिन की मोहलत देते हैं। इससे मानसिक दबाव तेजी से बढ़ रहा है। लोग बाहर से सामान्य दिखने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन भीतर असुरक्षा और भय गहराता जा रहा है।
यह संकट भारत के लिए भी एक महत्वपूर्ण संकेत है। लंबे समय तक भारतीय युवा विदेशों में रोजगार को सफलता का सबसे बड़ा माध्यम मानते रहे हैं। लेकिन अब यह स्पष्ट हो रहा है कि केवल विदेशी अवसरों पर निर्भर रहना सुरक्षित विकल्प नहीं है। भारत को अपने यहां रोजगार के मजबूत अवसर पैदा करने होंगे ताकि प्रतिभाशाली युवा विदेश जाने को मजबूरी न समझें। साथ ही भारतीय शिक्षा व्यवस्था को भी बदलने की जरूरत है। केवल डिग्री आधारित शिक्षा अब पर्याप्त नहीं है। युवाओं को नई तकनीक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस साइबर सुरक्षा डेटा साइंस और डिजिटल स्किल्स में दक्ष बनाना होगा ताकि वे वैश्विक बदलावों के अनुरूप खुद को ढाल सकें।
भारत के लिए यह समय आत्मनिर्भर तकनीकी ढांचा विकसित करने का भी है। यदि देश में मजबूत स्टार्टअप इकोसिस्टम रिसर्च और नवाचार को बढ़ावा मिलेगा तो लाखों युवाओं को देश के भीतर ही अवसर मिल सकते हैं। इससे विदेशी नीतियों और वीजा नियमों पर निर्भरता कम होगी। सरकार और निजी क्षेत्र दोनों को मिलकर ऐसा वातावरण तैयार करना होगा जहां प्रतिभा को सम्मान और अवसर दोनों मिलें।
अमेरिका में भारतीय टेक कर्मियों पर आया यह संकट केवल इमिग्रेशन या नौकरी का मुद्दा नहीं है बल्कि यह वैश्विक अर्थव्यवस्था बदलती तकनीक और अस्थिर रोजगार व्यवस्था की बड़ी तस्वीर को भी दिखाता है। आने वाले समय में वही देश और वही युवा सफल होंगे जो तेजी से बदलती परिस्थितियों के अनुसार खुद को तैयार करेंगे। भारतीय युवाओं के लिए यह चुनौती भी है और अवसर भी कि वे केवल विदेश पर निर्भर रहने के बजाय अपनी क्षमता और कौशल के दम पर नए रास्ते तैयार करें।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार, साहित्यकार एवं स्तम्भकार है)
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