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रुपये में रिकॉर्ड गिरावट, क्या डॉलर के मुकाबले 100 तक पहुंचेगी भारतीय मुद्रा?

नई दिल्ली, 20 मई (वेब वार्ता)। भारतीय रुपया लगातार दबाव में बना हुआ है और डॉलर के मुकाबले नए निचले स्तर दर्ज कर रहा है। 19 मई को रुपया 96.52 प्रति डॉलर तक पहुंच गया, जो अब तक का सबसे कमजोर स्तर माना जा रहा है। वर्ष की शुरुआत में लगभग 89 के आसपास रहने वाली भारतीय मुद्रा अब तक उल्लेखनीय गिरावट दर्ज कर चुकी है। इस स्थिति ने बाजार, निवेशकों और आम नागरिकों के बीच यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या रुपया आने वाले समय में 100 प्रति डॉलर के मनोवैज्ञानिक स्तर को पार कर सकता है।

विशेषज्ञों के अनुसार रुपये पर दबाव के पीछे कई वैश्विक और घरेलू कारण सक्रिय हैं। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, विशेष रूप से ईरान और अमेरिका के बीच टकराव ने कच्चे तेल की कीमतों को ऊंचे स्तर पर पहुंचा दिया है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए तेल महंगा होने से आयात व्यय बढ़ता है और विदेशी मुद्रा की मांग में तेजी आती है। इसका सीधा असर रुपये की विनिमय दर पर पड़ता है।

दूसरी ओर विदेशी संस्थागत निवेशकों द्वारा भारतीय बाजारों से लगातार पूंजी निकासी भी रुपये की कमजोरी का बड़ा कारण बन रही है। चालू वर्ष में अब तक बड़ी मात्रा में विदेशी निवेश बाहर जाने से पूंजी बाजार पर दबाव बढ़ा है और डॉलर की मांग में वृद्धि हुई है। आर्थिक विश्लेषकों का कहना है कि निवेशकों का रुख आने वाले महीनों में मुद्रा की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएगा।

रुपये के भविष्य को लेकर विशेषज्ञों की राय एक जैसी नहीं है। अर्थशास्त्री संतोष मेहरोत्रा का मानना है कि यदि मौजूदा दबाव बना रहा तो भारतीय मुद्रा अगले कुछ महीनों में 100 प्रति डॉलर के स्तर को छू सकती है। उनका कहना है कि रुपये की तेज गिरावट का असर मुद्रास्फीति पर भी दिखाई देगा और इससे उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ सकता है।

मुद्रा बाजार विशेषज्ञ के. एन. डे ने भी रुपये में जारी कमजोरी को गंभीर संकेत बताया है। उनका कहना है कि हाल के दिनों में गिरावट की गति ने बाजार को चौंकाया है और इस समय किसी स्थिर निचले स्तर का स्पष्ट अनुमान लगाना कठिन है। उनके अनुसार यदि वैश्विक हालात नहीं सुधरे तो 100 की ओर मनोवैज्ञानिक गिरावट संभव हो सकती है।

हालांकि सभी विशेषज्ञ इस आशंका से सहमत नहीं हैं। वित्तीय रणनीतिकार धीरज निम का मानना है कि भारतीय रिजर्व बैंक इतनी तेज गिरावट को नियंत्रित करने के लिए हस्तक्षेप करेगा और निकट भविष्य में रुपये को 100 के स्तर तक नहीं जाने देगा। इसी तरह अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों के कुछ आकलन भी यह संकेत देते हैं कि वर्ष के अंत तक रुपया कमजोर रह सकता है, लेकिन 100 के स्तर से नीचे ही टिके रहने की संभावना अधिक है।

वित्तीय क्षेत्र के विशेषज्ञ मितुल कोटेचा ने भी स्पष्ट किया है कि 100 प्रति डॉलर उनका आधिकारिक अनुमान नहीं है, हालांकि उन्होंने स्वीकार किया कि रुपये की गिरावट अपेक्षा से अधिक तेज रही है। उनका कहना है कि बाजार ने पहले से तय कई अनुमानित स्तरों को पार कर लिया है, जिससे निवेशकों की चिंता बढ़ी है।

इस बीच निवेश प्रबंधन क्षेत्र से जुड़े निलेश शाह अपेक्षाकृत संतुलित दृष्टिकोण रखते हैं। उनका मानना है कि भविष्य में रुपया तीन अंकों के स्तर तक पहुंच सकता है, लेकिन असली चिंता गिरावट की गति और स्वरूप को लेकर होनी चाहिए। यदि अवमूल्यन नियंत्रित और क्रमबद्ध तरीके से होता है, तो इसे प्रतिस्पर्धी अर्थव्यवस्था के लिए पूरी तरह नकारात्मक नहीं माना जा सकता।

विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले समय में भारतीय रिजर्व बैंक की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रहने वाली है। देश के पास पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार मौजूद है, जिसके माध्यम से केंद्रीय बैंक अत्यधिक उतार-चढ़ाव को सीमित कर सकता है। यदि पश्चिम एशिया में तनाव कम होता है और विदेशी निवेश का प्रवाह सुधरता है तो रुपये को राहत मिल सकती है। लेकिन यदि वैश्विक परिस्थितियां और जटिल होती हैं, तो 100 प्रति डॉलर का स्तर केवल आशंका नहीं बल्कि वास्तविक संभावना भी बन सकता है।

फिलहाल विशेषज्ञों की राय भले ही विभाजित हो, लेकिन इस बात पर व्यापक सहमति है कि आने वाले महीने भारतीय अर्थव्यवस्था और मुद्रा बाजार के लिए चुनौतीपूर्ण रहने वाले हैं। भारतीय रुपये की दिशा अब वैश्विक घटनाक्रम, ऊर्जा बाजार और निवेशकों के विश्वास पर काफी हद तक निर्भर करेगी।

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