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इंसानों की सुरक्षा सर्वोपरि : आवारा कुत्तों पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला और समाज की जिम्मेदारी

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-कांतिलाल मांडोत- Kantilal Mandot
देश में बढ़ते डॉग बाइट के मामलों, रेबीज के खतरे और आम नागरिकों की सुरक्षा को लेकर सुप्रीम कोर्ट का हालिया फैसला एक महत्वपूर्ण सामाजिक और मानवीय हस्तक्षेप के रूप में सामने आया है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि प्रत्येक नागरिक को कुत्तों के हमलों के भय से मुक्त होकर गरिमा के साथ जीने का अधिकार है। सार्वजनिक स्थानों से पकड़े गए आवारा कुत्तों को शेल्टर होम में रखने तथा अत्यधिक आक्रामक, असाध्य रूप से बीमार या रेबीज संक्रमित कुत्तों के संबंध में आवश्यक स्थिति में दया-मृत्यु की अनुमति देने वाला यह फैसला केवल कानूनी आदेश नहीं, बल्कि समाज और प्रशासन को चेताने वाला संदेश भी है।
भारत में आवारा कुत्तों की समस्या वर्षों से गंभीर होती जा रही है। शहरों, कस्बों और गांवों में सड़कों पर घूमते कुत्तों की संख्या लगातार बढ़ रही है। इसके कारण आए दिन बच्चों, बुजुर्गों और राहगीरों पर हमलों की घटनाएं सामने आती रहती हैं। स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि देश में हर वर्ष लाखों लोग डॉग बाइट का शिकार होते हैं। इसका अर्थ यह है कि प्रतिदिन हजारों नागरिक भय, पीड़ा और असुरक्षा का सामना कर रहे हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार रेबीज से होने वाली मौतों में भारत की हिस्सेदारी चिंताजनक रूप से अधिक है। यह स्थिति केवल स्वास्थ्य संकट नहीं, बल्कि सामाजिक व्यवस्था और प्रशासनिक जिम्मेदारी का प्रश्न भी बन चुकी है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में जिस संवेदनशीलता और व्यावहारिक दृष्टिकोण का परिचय दिया है, वह उल्लेखनीय है। अदालत ने यह माना कि पशुओं के प्रति दया और करुणा आवश्यक है, लेकिन मानव जीवन की सुरक्षा उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है। यदि कोई बच्चा स्कूल जाते समय कुत्तों के झुंड से घिर जाए, कोई बुजुर्ग सुबह की सैर में घायल हो जाए या कोई विदेशी पर्यटक सड़कों पर भय महसूस करे, तो यह किसी सभ्य समाज के लिए उचित स्थिति नहीं कही जा सकती। अदालत ने इसी वास्तविकता को स्वीकारते हुए कहा कि राज्य मूकदर्शक नहीं बन सकता।
दरअसल, पिछले कुछ वर्षों में पशु अधिकारों के नाम पर एक ऐसा वातावरण बन गया था जिसमें प्रशासनिक अधिकारी भी कार्रवाई करने से डरने लगे थे। कई बार नगर निगमों और स्थानीय प्रशासन ने आवारा कुत्तों को नियंत्रित करने की कोशिश की, लेकिन उन पर पशु क्रूरता के आरोप लगने लगे। परिणाम यह हुआ कि सड़कों पर कुत्तों की संख्या बढ़ती चली गई और आम नागरिकों की परेशानी भी बढ़ती गई। सुप्रीम कोर्ट ने अब यह स्पष्ट कर दिया है कि ईमानदारी से कार्य करने वाले अधिकारियों के खिलाफ केवल इसलिए आपराधिक कार्रवाई नहीं की जा सकती क्योंकि उन्होंने जनता की सुरक्षा के लिए कदम उठाए हैं। यह टिप्पणी प्रशासन को जिम्मेदारी निभाने का साहस देती है।
यह भी सत्य है कि पशु प्रेम और जीव दया भारतीय संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं। भारतीय समाज सदियों से पशुओं के प्रति करुणा, सह-अस्तित्व और संरक्षण की भावना रखता आया है। गाय, कुत्ता, पक्षी और अन्य जीवों को भोजन कराना पुण्य माना जाता है। लेकिन करुणा का अर्थ अराजकता नहीं हो सकता। यदि किसी व्यवस्था के कारण मनुष्यों का जीवन संकट में पड़ने लगे तो संतुलन स्थापित करना आवश्यक हो जाता है। जीव दया का वास्तविक अर्थ यह नहीं कि शहरों की सड़कें खतरनाक बन जाएं और बच्चे घर से निकलने में डरने लगें।
मेनका गांधी ने भी यह गंभीर मुद्दा उठाया है कि कई बार अमीर कॉलोनियों से आवारा कुत्तों को पकड़कर गरीब बस्तियों में छोड़ दिया जाता है। इससे समस्या का समाधान नहीं होता, बल्कि गरीब और कमजोर वर्गों पर खतरा और बढ़ जाता है। वास्तव में सबसे अधिक शिकार वही लोग बनते हैं जिनके पास सुरक्षित आवास, निजी वाहन या बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं होतीं। झुग्गी-बस्तियों में रहने वाले बच्चे, मजदूर, सड़क किनारे काम करने वाले लोग और बुजुर्ग सबसे अधिक प्रभावित होते हैं। इसलिए यह मुद्दा सामाजिक न्याय से भी जुड़ जाता है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि उसने केवल कठोरता की बात नहीं की, बल्कि वैज्ञानिक और मानवीय समाधान पर बल दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी आक्रामक या बीमार कुत्ते के संबंध में कार्रवाई पशु चिकित्सकों की जांच और कानूनी प्रक्रिया के बाद ही होगी। अर्थात उद्देश्य क्रूरता नहीं, बल्कि संतुलित व्यवस्था स्थापित करना है। शेल्टर होम, नसबंदी अभियान, टीकाकरण और पशु जन्म नियंत्रण केंद्रों को मजबूत करना इस समस्या का स्थायी समाधान हो सकता है।
आज जरूरत इस बात की है कि नगर निगम, राज्य सरकारें और समाज मिलकर दीर्घकालिक योजना बनाएं। केवल अदालत के आदेश से समस्या समाप्त नहीं होगी। शहरों में कचरे का उचित निपटान नहीं होने के कारण भी आवारा कुत्तों की संख्या बढ़ती है। खुले में फेंका गया भोजन और गंदगी उनके लिए भोजन का स्रोत बनती है। यदि स्वच्छता व्यवस्था सुधरे, नसबंदी अभियान नियमित हों और पशु आश्रय केंद्र बेहतर बनाए जाएं तो स्थिति काफी हद तक नियंत्रित हो सकती है।
साथ ही, लोगों में जागरूकता फैलाना भी आवश्यक है। बच्चों को सिखाया जाए कि वे कुत्तों को उकसाएं नहीं, उनके झुंड के बीच न जाएं और किसी कुत्ते के आक्रामक व्यवहार की सूचना तुरंत दें। डॉग बाइट होने पर प्राथमिक उपचार और रेबीज वैक्सीन के बारे में भी समाज को जागरूक करना होगा। भारत में कई लोग आज भी अंधविश्वास या घरेलू उपचार के भरोसे रहते हैं, जिससे खतरा और बढ़ जाता है।
यह भी समझना जरूरी है कि अदालत का फैसला पशु विरोधी नहीं है। यह निर्णय मानव जीवन की रक्षा और सामाजिक संतुलन के पक्ष में है। यदि किसी समाज में इंसान ही भय और असुरक्षा में जीने लगे तो विकास, संवेदनशीलता और सभ्यता के सारे दावे कमजोर पड़ जाते हैं। इसलिए यह आवश्यक है कि हम भावनाओं के बजाय व्यावहारिकता और जिम्मेदारी के साथ इस विषय को देखें।
जीव दया प्रेमियों की भावनाएं अपनी जगह महत्वपूर्ण हैं। पशुओं के प्रति संवेदनशीलता बनी रहनी चाहिए। लेकिन यह संवेदनशीलता इंसानों की सुरक्षा और जीवन के अधिकार से ऊपर नहीं हो सकती। एक छोटे बच्चे की जान, किसी बुजुर्ग की सुरक्षा और आम नागरिक का निर्भय जीवन सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। यदि इसके लिए प्रशासन को कठोर निर्णय लेने पड़ें तो समाज को उसका समर्थन करना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला वास्तव में एक संतुलित संदेश देता है कि करुणा और सुरक्षा दोनों साथ-साथ चल सकते हैं। आवश्यकता केवल ईमानदार नीयत, वैज्ञानिक सोच और प्रभावी प्रशासनिक व्यवस्था की है। देश को ऐसी नीति चाहिए जिसमें पशुओं के प्रति संवेदनशीलता भी बनी रहे और नागरिकों का जीवन भी सुरक्षित हो। आखिर किसी भी लोकतांत्रिक और सभ्य समाज की पहली जिम्मेदारी अपने नागरिकों की रक्षा करना ही होती है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार, साहित्यकार एवं स्तम्भकार है)
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