तेहरान/वाशिंगटन, 11 मई (वेब वार्ता)। ईरान और अमेरिका के बीच जारी कूटनीतिक तनाव एक बार फिर तेज हो गया है। ईरान ने अमेरिका के 14 सूत्रीय प्रस्ताव को खारिज करते हुए अपना नया मसौदा वॉशिंगटन भेज दिया है। हालांकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के इस नए प्रस्ताव को पूरी तरह अस्वीकार कर दिया। इसके बाद भारत और घाना स्थित ईरानी दूतावासों ने ट्रंप के बयान पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है।
भारत में ईरानी दूतावास ने सामाजिक माध्यम मंच पर कहा कि अमेरिका के प्रस्ताव के जवाब में ईरान द्वारा भेजा गया मसौदा देश के मूल अधिकारों और राष्ट्रीय संप्रभुता पर आधारित है। दूतावास ने स्पष्ट किया कि यदि तेहरान अमेरिकी प्रस्ताव स्वीकार कर लेता तो इसका अर्थ ट्रंप प्रशासन की अत्यधिक मांगों के आगे झुकना होता।
ईरानी दूतावास ने अपने बयान में कहा कि नए प्रस्ताव में अमेरिका से युद्ध के नुकसान की भरपाई की मांग की गई है। साथ ही होर्मुज जलडमरूमध्य पर ईरान की संप्रभुता को सुनिश्चित करने और ईरान पर लगाए गए प्रतिबंधों को समाप्त करने पर भी जोर दिया गया है। इसके अतिरिक्त जब्त की गई संपत्तियों और वित्तीय संसाधनों को वापस करने की मांग भी प्रस्ताव का अहम हिस्सा बताई गई है।
वहीं घाना स्थित ईरानी दूतावास ने डोनाल्ड ट्रंप के बयान पर व्यंग्यात्मक टिप्पणी करते हुए कहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति दावा कर रहे हैं कि उन्होंने प्रस्ताव को पढ़ लिया है, लेकिन वास्तविकता यह है कि उसके मूल भाव को वह अब भी समझ नहीं पाए हैं। दूतावास ने तंज कसते हुए कहा कि ट्रंप केवल वैश्विक सुर्खियां बटोरने का प्रयास कर रहे हैं।
ईरानी पक्ष ने यह भी दावा किया कि व्हाइट हाउस के आंतरिक सूत्रों के अनुसार ट्रंप का पूरा कार्यकाल एक महंगे मनोवैज्ञानिक उपचार जैसा बन गया है। दूतावास की इस टिप्पणी को लेकर अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक गलियारों में भी चर्चा तेज हो गई है।
दरअसल अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सामाजिक मंच पर पोस्ट करते हुए कहा था कि उन्होंने ईरान के तथाकथित प्रतिनिधियों का जवाब पढ़ा है और उन्हें यह बिल्कुल पसंद नहीं आया। ट्रंप ने साफ शब्दों में कहा कि वह ईरानी प्रस्ताव को स्वीकार नहीं करेंगे।
ईरान के सरकारी प्रसारक ने भी अमेरिकी प्रस्ताव को ट्रंप प्रशासन के दबाव और लालच के आगे आत्मसमर्पण जैसा बताया। प्रसारक के अनुसार तेहरान का नया मसौदा ईरान के बुनियादी अधिकारों, आर्थिक हितों और रणनीतिक संप्रभुता की रक्षा के उद्देश्य से तैयार किया गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि दोनों देशों के बीच बढ़ती बयानबाजी आने वाले दिनों में पश्चिम एशिया की राजनीतिक स्थिति को और अधिक संवेदनशील बना सकती है। खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर बढ़ता तनाव वैश्विक ऊर्जा बाजारों पर भी असर डाल सकता है।




