होर्मुज, 24 अप्रैल (वेब वार्ता)। मध्य पूर्व में जारी तनाव के बीच होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने से वैश्विक ऊर्जा बाजार को गहरा झटका लगा है। तेल की आपूर्ति बुरी तरह प्रभावित हुई है और इसे अब तक का सबसे बड़ा आपूर्ति संकट माना जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय आकलनों के अनुसार प्रतिदिन 12 मिलियन बैरल से अधिक तेल की आपूर्ति बाधित हो रही है, जो वैश्विक मांग का लगभग 11.5 प्रतिशत है।
विशेषज्ञों के मुताबिक बीते 52 दिनों में करीब 624 मिलियन बैरल तेल बाजार से गायब हो चुका है। यह गिरावट इतिहास के प्रमुख ऊर्जा संकटों से भी अधिक गंभीर मानी जा रही है। वर्ष 1973 के अरब तेल प्रतिबंध, 1979 की ईरान क्रांति और 1991 के खाड़ी युद्ध के दौरान भी इतनी व्यापक आपूर्ति बाधित नहीं हुई थी।
सिर्फ कच्चा तेल ही नहीं, बल्कि प्राकृतिक गैस, परिष्कृत ईंधन जैसे डीजल और विमान ईंधन तथा उर्वरक उत्पादन पर भी इसका व्यापक असर पड़ा है। खाड़ी क्षेत्र की रिफाइनरियों में उत्पादन घटने से परिवहन और विमानन सेवाओं पर दबाव बढ़ गया है।
कतर में गैस उत्पादन प्रभावित होने से तरलीकृत प्राकृतिक गैस की आपूर्ति भी बाधित हुई है। वर्तमान समय में विश्व पहले की तुलना में गैस पर अधिक निर्भर हो चुका है, ऐसे में यह संकट और गंभीर रूप लेता जा रहा है।
ऊर्जा बाजार में कीमतों पर भी इसका सीधा असर देखने को मिला है। कच्चे तेल की कीमत लगभग 70 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 95 डॉलर के आसपास पहुंच गई है और इसके और बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे प्रमुख निर्यातक देश भी प्रभावित हुए हैं, क्योंकि जलडमरूमध्य बंद होने से वे निर्यात नहीं कर पा रहे हैं।
आंकड़ों के अनुसार तेल की आपूर्ति में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है। अनुमान है कि महीने के अंत तक करीब 650 मिलियन बैरल तेल की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। प्रतिदिन लगभग 13 मिलियन बैरल तेल की आपूर्ति रुक चुकी है, जबकि अतिरिक्त प्रतिबंधों के कारण ईरान का तेल भी बाजार तक नहीं पहुंच पा रहा है।
समुद्री मार्ग से होने वाले निर्यात के आंकड़े स्थिति की गंभीरता को स्पष्ट करते हैं। मार्च के अंत तक वैश्विक स्तर पर 6.9 मिलियन बैरल प्रतिदिन की कमी दर्ज की गई थी, जो अप्रैल के तीसरे सप्ताह तक बढ़कर कुल 8.8 मिलियन बैरल प्रतिदिन की गिरावट तक पहुंच गई। यदि यही स्थिति बनी रहती है तो यह महामारी काल के बाद का सबसे निचला स्तर हो सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह संकट वर्ष 1973 के तेल संकट से भी अधिक गंभीर हो सकता है। उस समय वैश्विक आपूर्ति में लगभग 7 प्रतिशत की कमी आई थी, जबकि वर्तमान में करीब 13 प्रतिशत आपूर्ति प्रभावित हो चुकी है। मध्य पूर्व दुनिया की लगभग 30 प्रतिशत तेल आपूर्ति करता है, ऐसे में हालात और बिगड़ने पर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर गहरा असर पड़ सकता है।
विश्लेषकों के अनुसार भले ही तनाव जल्द कम हो जाए, लेकिन आपूर्ति को सामान्य स्थिति में लौटने में महीनों से लेकर वर्षों तक का समय लग सकता है।





