-लक्ष्मीकान्त पाठक
हरदोई19सितम्बर(वेबवार्ता) राजनीति में पांच दशक एक लंबा अरसा होता है। इस दौरान चेहरे बदल जाते हैं, दल बदल जाते हैं, नारों की भाषा बदल जाती है और मतदाताओं की प्राथमिकताएं भी नए सिरे से आकार लेती हैं। लेकिन हरदोई सदर की चुनावी कहानी में एक नाम ऐसा है, जो इन तमाम बदलावों के बावजूद लगातार प्रासंगिक बना रहा—अग्रवाल परिवार।वर्ष 1974 में श्रीशचंद्र अग्रवाल से शुरू हुई यह राजनीतिक यात्रा आज तीसरी पीढ़ी तक पहुंच चुकी है। पिता ने नींव रखी, बेटे नरेश अग्रवाल ने उसे मजबूत सियासी आधार दिया और पोते नितिन अग्रवाल ने उसी विरासत को नए दौर और नए राजनीतिक मंच पर आगे बढ़ाया।
यह केवल तीन नेताओं की कहानी नहीं है, बल्कि एक परिवार के उस लंबे राजनीतिक सफर की गाथा है, जिसमें कांग्रेस, निर्दलीय, समाजवादी पार्टी (सपा), बहुजन समाज पार्टी (बसपा) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) जैसे विभिन्न पड़ाव आए। इसके बावजूद, हरदोई सदर की चुनावी जमीन से इस परिवार का रिश्ता कभी नहीं टूटा।
1974: जब पड़ी राजनीतिक विरासत की पहली ईंट
अग्रवाल परिवार की यह कहानी वर्ष 1974 से शुरू होती है। कांग्रेस के टिकट पर चुनाव मैदान में उतरे श्रीशचंद्र अग्रवाल ने 16,663 वोट हासिल कर निर्दलीय प्रत्याशी उदय प्रताप सिंह को 3,342 मतों से पराजित किया।
उस समय शायद किसी ने यह नहीं सोचा होगा कि यह जीत आगे चलकर हरदोई सदर की राजनीति में एक ऐसी लंबी गाथा की शुरुआत बनेगी, जिसे पांच दशक बाद भी याद किया जाएगा। श्रीशचंद्र अग्रवाल की यह जीत परिवार की राजनीतिक यात्रा की पहली ईंट थी, जिस पर आगे चलकर उनके पुत्र नरेश अग्रवाल ने एक मजबूत राजनीतिक ढांचा खड़ा किया।
1980: पिता की विरासत बेटे के हाथ
वर्ष 1980 में श्रीशचंद्र अग्रवाल के पुत्र नरेश चंद्र अग्रवाल ने चुनावी राजनीति में कदम रखा। कांग्रेस (आई) के टिकट पर चुनाव लड़ते हुए उन्होंने 28,597 वोट हासिल किए और भाजपा के गंगा भक्त सिंह को 14,302 मतों के बड़े अंतर से हराया।यह केवल एक जीत नहीं थी, बल्कि उस राजनीतिक विरासत के सफल हस्तांतरण का पहला बड़ा संकेत था। हालांकि, आगे चलकर नरेश अग्रवाल की राजनीतिक यात्रा किसी एक दल की सीमाओं तक सीमित नहीं रही।
1989: जब चुनाव चिह्न से बड़ी हो गई व्यक्तिगत पहचान
1989 का चुनाव इस कहानी का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय है। कांग्रेस से टिकट न मिलने पर नरेश अग्रवाल ने पीछे हटने के बजाय निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ने का फैसला किया। उनके सामने कांग्रेस की उमा त्रिपाठी थीं।
जब परिणाम आए, तो संदेश बिल्कुल साफ था—दल बदला, लेकिन जनता पर पकड़ नहीं। नरेश अग्रवाल ने 36,402 वोट हासिल कर उमा त्रिपाठी को 10,195 मतों से पराजित किया। हरदोई सदर की राजनीति में इस चुनाव ने सिद्ध कर दिया कि उनके पास दल के बिना भी चुनाव जीतने की क्षमता थी।
1991 से 1996: कड़े मुकाबलों के बीच वर्चस्व
1991 में नरेश अग्रवाल पुनः कांग्रेस में लौट आए। इस बेहद कड़े मुकाबले में उन्हें 30,370 वोट मिले और उन्होंने भाजपा के महेश नाथ महेंद्र के खिलाफ महज 1,017 वोटों के सूक्ष्म अंतर से जीत हासिल की। इस जीत ने दर्शाया कि राजनीति में कभी-कभी एक हजार से भी कम का अंतर सफर को जारी रखने के लिए काफी होता है।इसके बाद 1993 के चुनाव में नरेश अग्रवाल ने पुनः कांग्रेस के टिकट पर 41,605 वोट प्राप्त किए और 13,297 मतों से जीत दर्ज की। 1996 में उन्होंने कांग्रेस के प्रत्याशी के रूप में 56,744 वोट हासिल किए और भाजपा के सुरेंद्र कुमार दुबे को 22,010 मतों के बड़े अंतर से हराया। इसके साथ ही हरदोई सदर में नरेश अग्रवाल एक स्थायी राजनीतिक स्तम्भ बन गए।
2002 और 2007: सपा के साथ जीत का सातवां कीर्तिमान
समय के साथ नरेश अग्रवाल समाजवादी पार्टी में शामिल हो गए। वर्ष 2002 में सपा के टिकट पर उन्होंने 63,825 वोट पाए और बसपा के शिव प्रसाद को 26,583 मतों के अंतर से हराया।
2007 के चुनाव में भी जीत का यह क्रम जारी रहा। उन्होंने सपा के टिकट पर 67,317 वोट हासिल किए और बसपा के राम कुमार कुरिल को 23,249 मतों से पराजित किया। यह जीत इसलिए खास थी क्योंकि इसके साथ ही नरेश अग्रवाल ने हरदोई सदर सीट से अपनी लगातार सातवीं विधानसभा जीत दर्ज की।
2008: तीसरी पीढ़ी के हाथों में कमान
साल 2008 में अग्रवाल परिवार की राजनीति ने नया मोड़ लिया। नरेश अग्रवाल के विधानसभा से इस्तीफा देने के बाद हरदोई सदर में उपचुनाव हुआ। इस बार मैदान में उतरे उनके पुत्र नितिन अग्रवाल।
बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के टिकट पर पहली बार चुनाव लड़ रहे नितिन अग्रवाल ने 65,533 वोट हासिल कर जीत दर्ज की। इसके साथ ही परिवार की राजनीतिक विरासत तीसरी पीढ़ी के हाथों में सुरक्षित हो गई।
2012 से 2017: एक लाख से अधिक मतों का नया कीर्तिमान
2012 में नितिन अग्रवाल सपा प्रत्याशी के रूप में मैदान में उतरे। उन्होंने 1,10,063 वोट प्राप्त किए और बसपा के राजा बक्स सिंह को 43,682 मतों के भारी अंतर से हराया। यह पहला अवसर था जब हरदोई सदर में परिवार के किसी उम्मीदवार ने एक लाख से अधिक मत प्राप्त किए।
2017 की लहर में मुकाबला कड़ा था। सपा के टिकट पर नितिन अग्रवाल को 97,735 वोट मिले और उन्होंने कड़े मुकाबले में भाजपा के राजा बक्स सिंह को 5,109 मतों के अंतर से हराकर अपनी सीट बचाए रखी।
2022: भाजपा के नए मंच पर ऐतिहासिक जीत
वर्ष 2018 में नरेश अग्रवाल और नितिन अग्रवाल भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए। जिस परिवार की यात्रा कांग्रेस से शुरू होकर निर्दलीय, सपा और बसपा तक पहुंची थी, वह अब भाजपा के मंच पर था।
2022 के चुनाव में नितिन अग्रवाल ने भाजपा प्रत्याशी के रूप में उतरकर 1,26,750 वोट (53.19% मत) हासिल किए और सपा के अनिल वर्मा को 42,411 मतों के बड़े अंतर से पराजित कर नया रिकॉर्ड बनाया। चुनावी आंकड़ों के अनुसार, हरदोई सदर सीट पर भाजपा की यह पहली विधानसभा जीत थी।
अग्रवाल परिवार का पांच दशक का राजनीतिक सफर
1974 का चुनाव: श्रीशचंद्र अग्रवाल ने कांग्रेस के टिकट पर चुनावी सफर शुरू किया और 16,663 वोट हासिल कर 3,342 मतों के अंतर से पहली जीत दर्ज की।
1980 का चुनाव: नरेश अग्रवाल ने कांग्रेस (आई) के प्रत्याशी के रूप में कदम रखा और 28,597 वोट पाकर 14,302 मतों के बड़े अंतर से जीत हासिल की।
1989 का चुनाव: कांग्रेस से टिकट न मिलने पर नरेश अग्रवाल निर्दलीय लड़े और 36,402 वोट पाकर 10,195 मतों के अंतर से विजयी हुए।
1991 का चुनाव: कांग्रेस में वापसी के बाद नरेश अग्रवाल को 30,370 वोट मिले और कड़े मुकाबले में महज 1,017 मतों के अंतर से जीत मिली।
1993 का चुनाव: नरेश अग्रवाल ने पुनः कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में 41,605 वोट हासिल किए और 13,297 मतों के अंतर से जीत दर्ज की।
1996 का चुनाव: नरेश अग्रवाल ने कांग्रेस के टिकट पर 56,744 वोट पाए और 22,010 मतों के बड़े अंतर से विजय प्राप्त की।
2002 का चुनाव: समाजवादी पार्टी में शामिल होकर नरेश अग्रवाल ने सपा के टिकट पर 63,825 वोट पाए और 26,583 मतों से विजयी हुए।
2007 का चुनाव: नरेश अग्रवाल ने सपा प्रत्याशी के रूप में 67,317 वोट पाकर 23,249 मतों से जीत दर्ज की और लगातार 7वीं जीत का कीर्तिमान बनाया।
2008 का उपचुनाव: नितिन अग्रवाल ने बसपा के टिकट पर राजनीति में कदम रखा और 65,533 वोट पाकर उपचुनाव जीता।
2012 का चुनाव: नितिन अग्रवाल सपा के टिकट पर लड़े और 1,10,063 वोट प्राप्त कर 43,682 मतों के भारी अंतर से जीत हासिल की।
2017 का चुनाव: सपा प्रत्याशी के रूप में नितिन अग्रवाल ने 97,735 वोट हासिल किए और कड़े मुकाबले में 5,109 मतों से अपनी सीट बचाए रखी।
2022 का चुनाव: भाजपा में शामिल होने के बाद नितिन अग्रवाल ने भाजपा प्रत्याशी के रूप में 1,26,750 वोट (53.19%) पाए और 42,411 मतों से जीतकर इतिहास रचा।
इस प्रकार अग्रवाल परिवार की पांच दशक लंबी यह कहानी केवल जीतों का आंकड़ा भर नहीं है। यह राजनीतिक निरंतरता का एक ऐसा दुर्लभ उदाहरण है, जहाँ एक पीढ़ी ने जमीन तैयार की, दूसरी ने उस पर अपना प्रभाव स्थापित किया और तीसरी ने बदलते दौर के साथ उस वर्चस्व को कायम रखा। दल बदलते रहे, लेकिन हरदोई सदर के मतदाताओं का विश्वास अग्रवाल परिवार के साथ निरंतर बना रहा।




