शिमला, 28 अप्रैल (वेब वार्ता)। भारत और न्यूजीलैंड के बीच हस्ताक्षरित मुक्त व्यापार समझौते के बाद सेब पर आयात शुल्क में प्रस्तावित कटौती ने हिमाचल प्रदेश के बागवानों की चिंता बढ़ा दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस निर्णय का स्थानीय सेब उत्पादकों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
समझौते के अनुसार, न्यूजीलैंड से आयातित सेब पर वर्तमान 50 प्रतिशत शुल्क को घटाकर 25 प्रतिशत किया जाएगा। हालांकि यह रियायत एक निर्धारित कोटा के भीतर ही लागू होगी। पहले वर्ष में 32,500 मीट्रिक टन सेब आयात को रियायती शुल्क का लाभ मिलेगा, जो छठे वर्ष तक बढ़कर 45,000 मीट्रिक टन तक पहुंच जाएगा।
कोटा से अधिक आयात पर मौजूदा 50 प्रतिशत शुल्क लागू रहेगा। इसके अलावा 1.25 अमेरिकी डॉलर प्रति किलोग्राम का न्यूनतम आयात मूल्य भी निर्धारित किया गया है, जो 1 अप्रैल से 31 अगस्त तक प्रभावी रहेगा।
विशेषज्ञों और बागवान संगठनों का कहना है कि शुल्क में कमी के कारण न्यूजीलैंड के सेब भारतीय बाजार में अपेक्षाकृत सस्ते हो जाएंगे। इससे स्थानीय सेब की मांग घटने और कीमतों में गिरावट की आशंका जताई जा रही है।
बागवानों के अनुसार, गाला और फूजी जैसी विदेशी किस्में बेहतर गुणवत्ता और आकर्षक पैकेजिंग के कारण उपभोक्ताओं को तेजी से आकर्षित करती हैं। ऐसे में स्थानीय उत्पादकों को प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ सकता है।
कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सरकार ने संतुलन बनाने के लिए अतिरिक्त उपाय नहीं किए, तो इसका असर हिमाचल प्रदेश के हजारों बागवानों की आय पर पड़ सकता है। इस मुद्दे को लेकर प्रदेश में चर्चा तेज हो गई है और किसान संगठनों ने सरकार से उचित सुरक्षा उपाय करने की मांग उठानी शुरू कर दी है।



