भोपाल, 22 जुलाई (वेब वार्ता)। मध्य प्रदेश के लगभग 12 लाख अधिकारी, कर्मचारियों और पेंशनरों के लिए प्रस्तावित कैशलेस स्वास्थ्य बीमा योजना अभी भी अंतिम रूप नहीं ले सकी है। योजना के क्रियान्वयन में इस बार सबसे बड़ा पेच आपातकालीन चिकित्सा प्रतिपूर्ति की राशि को लेकर सामने आया है। इस विषय पर अधिकारियों के बीच सहमति नहीं बनने के कारण योजना की मंजूरी फिलहाल टलती नजर आ रही है।
प्रस्तावित प्रारूप के अनुसार आपातकालीन स्थिति में कर्मचारी गैर-अनुबंधित अस्पताल में पांच लाख रुपये तक का उपचार करा सकते हैं, जिसके खर्च की बाद में योजना के तहत प्रतिपूर्ति की जानी थी। हालांकि, हाल ही में हुई समीक्षा बैठक में इस प्रावधान पर अधिकारियों के बीच मतभेद उभरकर सामने आए।
कुछ अधिकारियों का मत है कि आपातकालीन प्रतिपूर्ति की अधिकतम सीमा डेढ़ लाख से दो लाख रुपये तक ही निर्धारित की जानी चाहिए। उनका तर्क है कि मरीज की स्थिति स्थिर होने के बाद उसे अनुबंधित अस्पताल में स्थानांतरित किया जा सकता है, इसलिए अधिक राशि निर्धारित करने की आवश्यकता नहीं है। साथ ही, उनका मानना है कि कम सीमा तय करने से योजना के दुरुपयोग की आशंका भी कम होगी। इसी कारण पांच लाख रुपये की प्रस्तावित सीमा पर अभी अंतिम सहमति नहीं बन सकी है।
प्रदेश में आयुष्मान भारत योजना का संचालन कर रही स्टेट हेल्थ एजेंसी ने इस योजना का प्रारूप तैयार किया है। प्रस्ताव के अनुसार इसमें पेंशनरों को भी शामिल किया जाएगा। कर्मचारियों और पेंशनरों के लिए प्रीमियम की राशि अलग-अलग निर्धारित करने का प्रस्ताव है। इसके अलावा निर्धारित प्रीमियम का भुगतान करने पर निगमों, मंडलों और स्थानीय निकायों के कर्मचारियों को भी इस योजना का लाभ देने की व्यवस्था की जा रही है।
योजना के प्रारूप को इसी माह मंत्रिमंडल की मंजूरी के लिए प्रस्तुत किए जाने की तैयारी थी, लेकिन परिवार चिकित्सा प्रतिपूर्ति, पेंशनरों के परिवार की परिभाषा तथा अन्य महत्वपूर्ण बिंदुओं पर अंतिम निर्णय नहीं हो पाने के कारण प्रस्ताव फिलहाल लंबित है।
प्रस्तावित योजना में अनुबंधित अस्पतालों में 20 लाख रुपये तक के कैशलेस उपचार की सुविधा उपलब्ध कराने का प्रावधान किया गया है। वहीं, आपातकालीन परिस्थितियों में यदि कर्मचारी या पेंशनर को निकट के गैर-अनुबंधित अस्पताल में उपचार कराना पड़ता है, तो चिकित्सा व्यय की प्रतिपूर्ति का भी प्रावधान रखा गया है। हालांकि, प्रतिपूर्ति की अधिकतम सीमा तय नहीं होने के कारण योजना को अंतिम मंजूरी मिलने में देरी हो रही है।




