कोलकाता, 09 मई (वेब वार्ता)। पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक माहौल लगातार गर्माता जा रहा है। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर जारी विवाद के बीच मालदा में न्यायाधीशों के घेराव मामले में राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने बड़ी कार्रवाई की है। राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने इस मामले में 12 एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।
एनआईए की यह कार्रवाई सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश के बाद की गई है। न्यायालय ने मामले को गंभीर मानते हुए इसे प्रशासनिक विफलता और राजनीतिक हस्तक्षेप से जुड़ा बताया था। इसके बाद एजेंसी ने मामले को अपने हाथ में लेकर जांच प्रक्रिया तेज कर दी है।
एनआईए ने देर रात जारी बयान में कहा कि मालदा जिले के मोथाबाड़ी थाना क्षेत्र के सात और कालियाचक थाना क्षेत्र के पांच मामलों को पुनः दर्ज किया गया है। एजेंसी के अनुसार ये मामले एसआईआर कार्य से जुड़े न्यायाधीशों की सुरक्षा और कानून व्यवस्था से संबंधित हैं। जांच टीमें मालदा पहुंच चुकी हैं और घटनास्थल से जुड़े सभी पहलुओं की पड़ताल कर रही हैं।
इससे पहले सर्वोच्च न्यायालय ने सोमवार को मामले का स्वतः संज्ञान लेते हुए इसे एनआईए को सौंपने का आदेश दिया था। सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल पंचोली की पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत एक अप्रैल की घटना से जुड़े 12 मामलों को एनआईए को स्थानांतरित किया था।
घटना के दौरान सात न्यायाधीशों को भीड़ ने घेर लिया था, जिनमें तीन महिला न्यायाधीश और एक पांच वर्षीय बच्चा भी शामिल था। बताया गया कि सभी लोग नौ घंटे से अधिक समय तक भीड़ के बीच फंसे रहे और उन्हें भोजन तथा पानी तक उपलब्ध नहीं कराया गया। यह घटना कालियाचक क्षेत्र में हुई थी।
सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में पश्चिम बंगाल के मुख्य सचिव दुष्यंत नारियाला को फटकार लगाते हुए उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से माफी मांगने के निर्देश दिए थे। साथ ही पुलिस को आदेश दिया गया कि गिरफ्तार किए गए सभी 26 आरोपियों को एनआईए को सौंपा जाए।
जांच एजेंसी के अनुसार इस मामले में प्रमुख संदिग्ध मोफाकरुल इस्लाम और मौलाना मोहम्मद शाहजहां अली कादरी पहले से गिरफ्तार हैं। न्यायालय ने टिप्पणी की थी कि यह घटना न्यायाधीशों को डराने और प्रशासनिक प्रक्रिया को प्रभावित करने की सुनियोजित कोशिश प्रतीत होती है।
जानकारी के अनुसार मालदा में चल रही एसआईआर प्रक्रिया के तहत पश्चिम बंगाल, ओडिशा और झारखंड के लगभग 700 न्यायाधीश तैनात हैं, जो 60 लाख से अधिक अपात्र मतदाताओं से जुड़ी शिकायतों की सुनवाई कर रहे हैं। घटना के दौरान न्यायाधीशों की गाड़ियों पर पत्थरबाजी और हमला किए जाने की भी जानकारी सामने आई है।




