नई दिल्ली, 10 जुलाई (वेब वार्ता)। राज्यों की वित्तीय स्थिति को अधिक सुदृढ़ और आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य से 16वें वित्त आयोग ने कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए हैं। आयोग का मानना है कि केवल कर संग्रह बढ़ाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि अनावश्यक खर्चों पर नियंत्रण और वित्तीय अनुशासन भी उतना ही आवश्यक है। आयोग ने राज्यों को अपनी आय बढ़ाने के साथ-साथ व्यय को संतुलित रखने की सलाह दी है।
आयोग के अनुसार, कई राज्यों में आय की तुलना में खर्च तेजी से बढ़ रहा है, जिससे वित्तीय संतुलन प्रभावित हो रहा है। ऐसी स्थिति में राज्यों को कर संग्रह बढ़ाने के साथ-साथ गैर-जरूरी खर्चों में कटौती करनी होगी, ताकि दीर्घकाल में आर्थिक स्थिरता बनी रहे।
रिपोर्ट में राज्यों को बजट से बाहर अतिरिक्त ऋण लेने से भी बचने की सलाह दी गई है। यदि किसी विशेष परिस्थिति में ऐसा ऋण लेना आवश्यक हो, तो उससे संबंधित पूरी जानकारी प्रत्येक वर्ष बजट दस्तावेज में सार्वजनिक करने की सिफारिश की गई है। इससे वित्तीय पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित होगी।
आयोग ने इस बार किसी भी राज्य के लिए राजस्व घाटा अनुदान की सिफारिश नहीं की है। साथ ही किसी राज्य अथवा क्षेत्र के लिए अलग से विशेष आर्थिक सहायता का प्रस्ताव भी नहीं दिया गया है। आयोग का कहना है कि राज्यों को अपनी आय के अनुरूप ही व्यय करना चाहिए और राजकोषीय घाटा राज्य की सकल आर्थिक क्षमता के तीन प्रतिशत के भीतर ही सीमित रखना चाहिए।
वित्त आयोग ने राज्यों को सलाह दी है कि वे कर संग्रह की क्षमता बढ़ाने, वित्तीय संसाधनों का बेहतर प्रबंधन करने और विकास कार्यों को प्राथमिकता देते हुए व्यय की योजना तैयार करें। आयोग का मानना है कि वित्तीय अनुशासन अपनाने से राज्यों की आर्थिक स्थिति मजबूत होगी और विकास की गति भी तेज होगी।
विशेषज्ञों के अनुसार, यदि राज्य वित्तीय अनुशासन का पालन करते हैं तो इसका सीधा लाभ आम नागरिकों को मिलेगा। मजबूत वित्तीय स्थिति से सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल और अन्य बुनियादी सुविधाओं पर अधिक निवेश संभव होगा। साथ ही ऋण पर निर्भरता कम होने से विकास योजनाओं के लिए अधिक संसाधन उपलब्ध रहेंगे।




