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महिला सुरक्षा पर नारे नहीं, ठोस कार्रवाई चाहिए

-पिंजड़ा नहीं, सुरक्षित आसमान चाहिए


Sachin Gautam
-सचिन कुमार गौतम-

केंद्र की मोदी सरकार और दिल्ली की रेखा गुप्ता सरकार के लिए इससे बड़ी शर्म की बात क्या होगी कि लड़कियों को आज भी सड़कों, पार्कों और सार्वजनिक स्थानों पर बेखौफ निकलने की आजादी के लिए आवाज उठानी पड़ रही है? भारतीय जनता पार्टी महिला सशक्तीकरण, ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ और महिला सुरक्षा के बड़े-बड़े नारे देती रही है, लेकिन मौजूदा हालात इन नारों की वास्तविकता पर गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं। जब राजधानी दिल्ली में ही महिलाएं और छात्राएं सुरक्षित महसूस नहीं कर रहीं, तब पूरे देश में महिला सुरक्षा के दावों पर भरोसा करना मुश्किल हो जाता है।

दिल्ली को देश की राजधानी होने के साथ-साथ आधुनिक, विकसित और सुरक्षित शहर के रूप में पेश किया जाता है। लेकिन महिलाओं के खिलाफ अपराध के आंकड़े इस दावे की भयावह तस्वीर सामने रखते हैं। दिल्ली पुलिस के आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2013 से 2025 के बीच राजधानी में बलात्कार के 26,582 मामले दर्ज किए गए। देशभर में हर दिन यौन हिंसा के करीब 80 मामले दर्ज होने की बात सामने आती है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो और राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के आंकड़ों के विश्लेषण से यह भी संकेत मिलता है कि यौन हिंसा के लगभग 90 प्रतिशत मामले दर्ज ही नहीं हो पाते। इसका अर्थ है कि सरकारी आंकड़े समस्या की पूरी तस्वीर नहीं दिखाते, बल्कि केवल उसका एक छोटा हिस्सा सामने लाते हैं।

महिलाओं की सुरक्षा को लेकर चिंता कोई नई बात नहीं है। दिसंबर 2012 में हुए निर्भया कांड ने पूरे देश को झकझोर दिया था। दिल्ली की सड़कों पर लाखों लोग उतर आए थे और तत्कालीन यूपीए सरकार तथा कांग्रेस के खिलाफ अपना आक्रोश व्यक्त किया था। उस समय जनता ने सरकार से जवाब मांगा और सरकार को जनभावनाओं का सामना करना पड़ा। निर्भया के परिवार को राहुल गांधी द्वारा निजी स्तर पर मदद दिए जाने और सरकार द्वारा आरोपियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई किए जाने की बात भी सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा रही। उस घटना के बाद कानूनों में बदलाव हुए, लेकिन समाज की मानसिकता और महिलाओं की सुरक्षा से जुड़ी बुनियादी चुनौतियां आज भी कायम हैं।

आज दिल्ली में फिर वही बेचैनी दिखाई दे रही है। 21 सितंबर को सार्वजनिक पार्क आस्था कुंज में तीन लोगों ने खुद को पुलिसकर्मी बताकर एक नाबालिग के साथ बलात्कार किया। यह घटना लेडी श्रीराम कॉलेज के आसपास हुई। घटना के बाद दिल्ली विकास प्राधिकरण की ओर से यह सलाह दी गई कि सूर्यास्त के बाद लोग पार्क में न जाएं। इस सलाह ने सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाने के बजाय महिलाओं की आवाजाही को सीमित करने की बहस को जन्म दे दिया।

सुरक्षा के नाम पर महिलाओं को सार्वजनिक स्थानों से दूर रहने की सलाह देना समस्या का समाधान नहीं है। यदि किसी पार्क में अपराध हुआ है तो पहला सवाल यह होना चाहिए कि वहां पर्याप्त रोशनी क्यों नहीं थी, पुलिस गश्त की व्यवस्था कैसी थी, सीसीटीवी कैमरे काम कर रहे थे या नहीं और अपराधियों पर तत्काल कार्रवाई क्यों नहीं हुई। इसके बजाय यदि लड़कियों और महिलाओं से कहा जाए कि वे अंधेरा होने के बाद पार्क में न जाएं, तो यह अपराधियों को रोकने के बजाय पीड़ितों की स्वतंत्रता सीमित करने जैसा है।

लेडी श्रीराम कॉलेज, गार्गी कॉलेज और मिरांडा हाउस समेत कई शिक्षण संस्थानों की छात्राएं इन घटनाओं के विरोध में सड़कों पर उतरीं। दिल्ली के अलग-अलग इलाकों में प्रदर्शन हुए और कई सार्वजनिक पार्कों में महिलाओं तथा छात्राओं ने धरना दिया। इन प्रदर्शनों का संदेश स्पष्ट है—महिलाएं सुरक्षा चाहती हैं, लेकिन अपनी स्वतंत्रता की कीमत पर नहीं। वे यह स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं कि सार्वजनिक स्थानों पर अपराध होने के बाद उन्हें ही घर में रहने, जल्दी लौटने या अपनी गतिविधियां सीमित करने की सलाह दी जाए।

दिल्ली में वर्ष 2016 के दौरान ‘ब्लैंक नॉइज’ जैसी पहलों के तहत लड़कियों ने रात में सार्वजनिक पार्कों में बैठकर यह सवाल उठाया था कि शहरों और पार्कों पर केवल पुरुषों का अधिकार क्यों माना जाए। उनका उद्देश्य था यह बताना कि सार्वजनिक स्थान महिलाओं के भी उतने ही हैं जितने पुरुषों के। लगभग दस वर्ष बाद भी यदि लड़कियों को यह साबित करने के लिए सड़कों पर उतरना पड़ रहा है कि वे रात में बाहर निकल सकती हैं, तो यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि सामाजिक मानसिकता की गहरी समस्या है।

डीडीए ने बाद में स्पष्टीकरण जारी कर कहा कि पार्क निर्धारित समय के अनुसार खुले रहेंगे और लोगों के आने-जाने पर कोई नई रोक नहीं लगाई गई है। यह भी कहा गया कि सूर्यास्त के बाद सुनसान या कम रोशनी वाले स्थानों पर न जाने की सलाह केवल सुरक्षा के दृष्टिकोण से दी गई थी। यह स्पष्टीकरण आवश्यक था, लेकिन इससे मूल सवाल समाप्त नहीं होता। सवाल यह है कि पार्क, सड़क, स्कूल, कॉलेज, कार्यालय या घर—कहीं भी महिलाएं पूरी तरह सुरक्षित क्यों नहीं हैं?

महिला सुरक्षा का अर्थ यह नहीं हो सकता कि महिलाओं की स्वतंत्रता पर लगातार नई पाबंदियां लगा दी जाएं। उन्हें कहा जाए कि वे रात में बाहर न निकलें, अकेले यात्रा न करें, सुनसान रास्तों पर न जाएं, छोटे कपड़े न पहनें या किसी पुरुष के साथ दिखाई न दें। ऐसी सलाहें अपराधियों के व्यवहार पर सवाल उठाने के बजाय महिलाओं की गतिविधियों और चरित्र को कटघरे में खड़ा करती हैं। इससे समाज में यह गलत संदेश जाता है कि अपराध का कारण अपराधी नहीं, बल्कि पीड़िता की मौजूदगी, पहनावा, समय या संगति है।

जमुई जिले की घटना इस मानसिकता का एक और उदाहरण है। वहां एक नाबालिग के उत्पीड़न का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल किया गया। इसके बाद सामने आए कुछ वीडियो में आरोपियों के गांव के लोगों को उनका बचाव करते हुए देखा गया। उन्होंने कथित तौर पर यह तर्क दिया कि गलती लड़की की थी, क्योंकि वह अंधेरे में एक लड़के के साथ घूम रही थी। यह सोच बताती है कि समाज का एक हिस्सा आज भी अपराधी को बचाने और पीड़िता को दोषी ठहराने के लिए तैयार रहता है।

यही पितृसत्ता का वास्तविक चेहरा है। एक ऐसी व्यवस्था जिसमें पुरुषों के व्यवहार को नियंत्रित करने के बजाय महिलाओं की स्वतंत्रता पर निगरानी रखी जाती है। लड़कियों को बचपन से सिखाया जाता है कि उन्हें कैसे बैठना, चलना, पहनना और बोलना चाहिए, लेकिन लड़कों को यह सिखाने पर पर्याप्त जोर नहीं दिया जाता कि महिलाओं की सहमति, सम्मान और स्वतंत्रता का अर्थ क्या है।

राहुल गांधी ने पुणे में ‘पितृसत्ता खत्म करो’ और ‘पिंजड़ा तोड़ो’ का आह्वान किया था। उन्होंने यह भी कहा कि देशभर में महिलाएं सड़कों पर चलने से डरती हैं और उन्हें उत्पीड़न तथा बलात्कार का भय रहता है। उनका आरोप है कि सरकार का जवाब महिलाओं को घर पर रहने की सलाह देना है। यदि यही स्थिति है, तो यह सरकार और प्रशासन दोनों के लिए गंभीर विफलता है।

शांतिपूर्ण विरोध लोकतांत्रिक अधिकार है। जब हजारों छात्र और युवा महिलाएं सुरक्षा की मांग को लेकर सड़कों पर उतरती हैं, तो उन्हें राजनीतिक विरोधी या व्यवस्था विरोधी बताने के बजाय उनकी बात सुनी जानी चाहिए। उनकी मांगें स्पष्ट हैं—सुरक्षित सड़कें, बेहतर रोशनी, प्रभावी पुलिस गश्त, तेज जांच, संवेदनशील प्रशासन और अपराधियों को बिना देरी के सजा।

महिलाओं को घर में बंद करना समाधान नहीं है। समाधान यह है कि सड़कों को सुरक्षित बनाया जाए, पुलिस व्यवस्था को जवाबदेह किया जाए, शिक्षण संस्थानों और सार्वजनिक स्थलों की सुरक्षा मजबूत की जाए तथा महिलाओं के खिलाफ हिंसा करने वालों और उनका बचाव करने वालों पर समान रूप से कड़ी कार्रवाई हो।

कायदे से यह संदेश प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को देना चाहिए था। यदि महिला सुरक्षा सरकार की प्राथमिकता होती, तो महिलाओं को अपनी आजादी के लिए बार-बार सड़कों पर उतरने की जरूरत नहीं पड़ती। अब समय है कि नारों से आगे बढ़कर ठोस कार्रवाई की जाए। महिलाएं सुरक्षा नहीं, अपना अधिकार मांग रही हैं—और लोकतंत्र में उनके इस अधिकार को नकारा नहीं जा सकता।

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