– महिलाओं के लिए खतरनाक बनता देश
–सचिन कुमार गौतम
भारत में लड़कियों और महिलाओं की सुरक्षा को लेकर रोज नए सवाल खड़े होते हैं। राजधानी दिल्ली से लेकर बिहार के जमुई तक सामने आने वाली घटनाएं बताती हैं कि महिलाओं के सम्मान और सुरक्षा का मुद्दा अब भी राजनीतिक दावों और जमीनी हकीकत के बीच फंसा हुआ है। चुनावों के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह तक भाजपा नेता महिलाओं के लिए सुरक्षित माहौल बनाने का दावा करते हैं। लेकिन जब किसी भाजपा शासित राज्य में महिला या नाबालिग के साथ अपराध होता है, तब सरकार और पार्टी के नेता जवाबदेही स्वीकार करने के बजाय पिछली सरकारों के समय हुई घटनाओं का हवाला देने लगते हैं।
यह रवैया गंभीर चिंता का विषय है। किसी भी सरकार का मूल्यांकन इस आधार पर होना चाहिए कि उसके कार्यकाल में अपराध रोकने के लिए क्या प्रभावी कदम उठाए गए, पीड़ितों को न्याय कितनी तेजी से मिला और अपराधियों के खिलाफ कितनी सख्त कार्रवाई हुई। यह स्वीकार्य नहीं हो सकता कि एक सरकार अपने शासन की विफलता पर सवाल उठने के बाद दूसरी सरकारों के पुराने आंकड़े गिनाने लगे। महिलाओं की सुरक्षा दलगत बहस का विषय नहीं, बल्कि संवैधानिक जिम्मेदारी और मानवीय सरोकार है।
जमुई की घटना ने उठाए सवाल
बिहार के जमुई में 19 सितंबर की शाम एक नाबालिग लड़का और लड़की स्कूटी से जा रहे थे। पुलिस और मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, कुछ लोगों ने उन्हें रास्ते में रोक लिया। दोनों से उनके संबंधों को लेकर सवाल किए गए और उनके साथ अभद्रता की गई। वायरल वीडियो में एक लड़की के साथ यौन उत्पीड़न और लड़के के साथ मारपीट दिखाई देने का दावा किया गया है। घटना के दौरान आरोपियों ने वीडियो बनाया, जिसे बाद में सोशल मीडिया पर प्रसारित किया गया। पुलिस के अनुसार, पीड़ित दोनों नाबालिग थे और घटना शाम करीब सात बजे की थी।
इस घटना की भयावहता केवल उस क्षण तक सीमित नहीं रही। वीडियो बनाने और उसे इंटरनेट पर फैलाने वालों ने पीड़िता की पीड़ा को दोबारा सार्वजनिक अपमान में बदल दिया। ऐसे वीडियो को अश्लील गीतों और आपत्तिजनक टिप्पणियों के साथ साझा करना भी अपराध की गंभीरता को बढ़ाता है। जिस बच्ची को सुरक्षा, सम्मान और कानूनी संरक्षण मिलना चाहिए था, उसे समाज के एक हिस्से ने तमाशे में बदल दिया।
यहां दो तरह के अपराध सामने आते हैं। पहला, वह प्रत्यक्ष अपराध जिसमें भीड़ ने कानून अपने हाथ में लेकर नाबालिगों को रोका, पीटा और लड़की के साथ यौन दुर्व्यवहार किया। दूसरा, वह डिजिटल अपराध जिसमें वीडियो को प्रसारित कर पीड़िता की पहचान, गरिमा और मानसिक सुरक्षा को नुकसान पहुंचाया गया। ऐसे मामलों में पुलिस को केवल मूल आरोपियों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि वीडियो बनाने, संपादित करने और प्रसारित करने वालों के खिलाफ भी कार्रवाई करनी चाहिए।
पुलिस ने कई संदिग्धों को हिरासत में लेने और गिरफ्तार करने की जानकारी दी है। एक आरोपी के पैर में गोली लगने की भी खबर सामने आई। हालांकि, किसी आरोपी को गोली लगना या गिरफ्तार किया जाना अपने आप में न्याय नहीं है। न्याय तभी माना जाएगा जब पूरी जांच निष्पक्ष हो, पीड़ित परिवार को सुरक्षा और मनोवैज्ञानिक सहायता मिले तथा अदालत में मजबूत साक्ष्यों के आधार पर दोषियों को सजा मिले।
‘मॉरल पुलिसिंग’ का खतरनाक तर्क
जमुई की घटना पर बिहार की मंत्री और स्थानीय विधायक श्रेयसी सिंह की टिप्पणी ने भी विवाद खड़ा किया। इंडिया टुडे से बातचीत में उन्होंने कहा कि “मॉरल पुलिसिंग” अधिक सभ्य और शालीन तरीके से की जा सकती है, हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि लड़के और लड़की के साथ जिस तरह का व्यवहार हुआ, वह बिल्कुल स्वीकार्य नहीं है। बाद में उन्होंने अपनी टिप्पणी को संदर्भ से हटाकर प्रस्तुत किए जाने की बात कही और अपराधियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई का समर्थन किया।
फिर भी मूल प्रश्न बना रहता है: किसी नागरिक के निजी जीवन, पहनावे, खान-पान या संबंधों पर भीड़ को नैतिक निगरानी का अधिकार किसने दिया? यदि किसी व्यक्ति को किसी व्यवहार पर आपत्ति है, तो उसके लिए कानून और प्रशासनिक संस्थाएं मौजूद हैं। शिकायत दर्ज कराना एक कानूनी प्रक्रिया है, लेकिन रास्ते में किसी को रोकना, पूछताछ करना, मारपीट करना, अपमानित करना या यौन हिंसा करना अपराध है।
‘सभ्य मॉरल पुलिसिंग’ जैसी अवधारणा स्वयं में विरोधाभासी है। पुलिसिंग का अधिकार राज्य की अधिकृत संस्थाओं के पास होता है, वह भी कानून और संविधान की सीमाओं के भीतर। भीड़ द्वारा की जाने वाली नैतिक निगरानी अक्सर महिलाओं, प्रेमी जोड़ों, अंतरजातीय संबंधों और कमजोर वर्गों को निशाना बनाती है। इसमें महिलाओं की स्वायत्तता और युवाओं के निजी अधिकारों को सबसे अधिक नुकसान पहुंचता है।
किसी घटना की आलोचना करते समय यह नहीं पूछा जाना चाहिए कि पीड़ित लड़का और लड़की वहां क्यों थे, वे साथ क्यों घूम रहे थे या उन्होंने क्या पहना था। पहला सवाल यह होना चाहिए कि आरोपियों ने कानून अपने हाथ में क्यों लिया और पुलिस समय पर वहां क्यों नहीं पहुंची। पीड़ित के व्यवहार को अपराध का कारण बताना दरअसल अपराधी को अप्रत्यक्ष संरक्षण देना है।
सत्ता की सुविधाजनक चुप्पी
महिला सुरक्षा पर भाजपा नेताओं के दावे तब कमजोर पड़ जाते हैं, जब पार्टी के नेता अपने शासन वाले राज्यों में हुई घटनाओं पर असंवेदनशील बयान देते हैं। उत्तर प्रदेश में रात में आभूषण पहनकर स्कूटी से निकलने जैसे राजनीतिक दावे किए गए। बिहार विधानसभा में भाजपा विधायक मैथिली ठाकुर ने भी कानून-व्यवस्था में सुधार का उल्लेख करते हुए रात में यात्रा करने को सुरक्षित बताया था। लेकिन किसी नेता का व्यक्तिगत अनुभव पूरे राज्य की महिलाओं की सुरक्षा का प्रमाण नहीं हो सकता।
एक प्रभावशाली नेता रात में सुरक्षित यात्रा कर पाती हैं, इसका अर्थ यह नहीं कि हर लड़की, हर छात्रा और हर कामकाजी महिला को समान सुरक्षा उपलब्ध है। सुरक्षा का आकलन सबसे कमजोर और सबसे असुरक्षित नागरिक के अनुभव से होना चाहिए, न कि सत्ता और संसाधनों से घिरे लोगों की सुविधा से।
विपक्षी दलों ने जमुई घटना पर आवाज उठाई और आरोपियों के खिलाफ पॉक्सो सहित कठोर धाराओं में कार्रवाई की मांग की। यह मांग इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पीड़िता नाबालिग है और ऐसे मामलों में कानून बच्चे की पहचान, गरिमा और सुरक्षा की रक्षा करता है। लेकिन राजनीतिक बयानबाजी से आगे बढ़कर सरकार को पारदर्शी जांच, समयबद्ध अभियोजन और पीड़ित परिवार के पुनर्वास की स्पष्ट योजना भी बतानी चाहिए।
इसी तरह, जब विपक्ष किसी अपराध पर सवाल उठाता है, तो सरकार को जवाब देने के बजाय पिछली सरकारों की घटनाओं की सूची पेश करना समाधान नहीं है। अपराध किसी भी दल की सरकार में हो, उसकी निंदा और जांच समान कठोरता से होनी चाहिए। महिला सुरक्षा पर दोहरा राजनीतिक मानदंड जनता का भरोसा तोड़ता है।
बदलाव की जरूरत
महिलाओं की सुरक्षा केवल पुलिस बल बढ़ाने या चुनावी भाषण देने से सुनिश्चित नहीं होगी। इसके लिए पुलिस की जवाबदेही, तेज जांच, सुरक्षित सार्वजनिक परिवहन, बेहतर स्ट्रीट लाइटिंग, स्कूलों में लैंगिक संवेदनशीलता की शिक्षा और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर आपत्तिजनक सामग्री के खिलाफ त्वरित कार्रवाई जरूरी है।
साथ ही, समाज को यह समझना होगा कि महिला की स्वतंत्रता किसी की निजी संपत्ति नहीं है। किसी लड़की का पहनावा, किसी युवक-युवती की मित्रता या किसी व्यक्ति का निजी जीवन भीड़ के हस्तक्षेप का आधार नहीं बन सकता। पितृसत्तात्मक सोच महिलाओं को हमेशा नियंत्रण और निगरानी के घेरे में रखना चाहती है। जब तक इस मानसिकता को चुनौती नहीं दी जाएगी, तब तक कानून होने के बावजूद महिलाओं को वास्तविक स्वतंत्रता नहीं मिल सकेगी।
पत्रकारिता की भी इस पूरे विमर्श में बड़ी भूमिका है। मीडिया को सत्ता के दावों को दोहराने के बजाय उनसे ठोस सवाल पूछने चाहिए—अपराध कब हुआ, पुलिस कब पहुंची, एफआईआर में कौन-कौन सी धाराएं लगाई गईं, कितने आरोपी गिरफ्तार हुए, पीड़िता को क्या सहायता दी गई और मुकदमे की स्थिति क्या है। जमुई मामले में जिस तरह पत्रकार ने मंत्री से ‘मॉरल पुलिसिंग’ की अवधारणा पर स्पष्ट सवाल किया, वैसी ही निर्भीकता हर पत्रकार से अपेक्षित है।
महिलाओं का सम्मान किसी पार्टी का चुनावी नारा नहीं, लोकतंत्र की बुनियादी कसौटी है। जमुई जैसी घटनाएं हमें याद दिलाती हैं कि सरकारों को राजनीतिक बचाव से बाहर निकलकर जवाबदेही स्वीकार करनी होगी। अपराधियों को सजा, पीड़ितों को न्याय और समाज को संवेदनशीलता—इन्हीं तीन आधारों पर सुरक्षित भारत का निर्माण संभव है।
