-कपिल बर्मन-
लोकतंत्र का महाकुंभ: जब युवाओं की हुंकार से गूंज उठी संसद की दहलीज
20 जुलाई 2026 भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में केवल एक तारीख नहीं, बल्कि उस दिन के रूप में याद की जाएगी जब देश के हजारों नहीं, बल्कि लाखों युवाओं ने सत्ता को यह संदेश दिया कि लोकतंत्र केवल चुनाव का नाम नहीं, बल्कि जागरूक नागरिकों की सतत भागीदारी का नाम है। इस विशाल जनसैलाब, उनके अटूट संकल्प और लोकतंत्र को बचाने की इस पुकार को यदि ‘लोकतंत्र का महाकुंभ’ कहा जाए, तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।
इस अभूतपूर्व जन-आक्रोश की तुलना 1857 के उस ऐतिहासिक स्वतंत्रता संग्राम (गदर) से की जा सकती है, जिसने ब्रिटिश हुकूमत की नींव हिलाकर रख दी थी। जिस प्रकार 1857 में देश के हर कोने से स्वतंत्रता सेनानियों ने बिना किसी स्वार्थ के स्वतःस्फूर्त आंदोलन किया था-जो आगे चलकर भारत की आज़ादी का आधार बना-ठीक वैसा ही मंजर आज़ाद भारत की सड़कों पर देखने को मिला। संसद को घेरकर खड़े युवाओं ने यह साबित कर दिया कि आज भी भारत के नागरिकों में आज़ादी का जज्बा ज़िंदा है।
तपती धूप, पुलिस के कड़े पहरे, लाठीचार्ज, आँसू गैस के गोले और वाटर कैनन की बर्फीली बौछारों का डटकर सामना करते हुए युवाओं ने हुकूमत की आँखों में आँखें डालकर यह संदेश दिया कि वे अपने संविधान, समानता और लोकतंत्र की रक्षा के लिए किसी भी दमनकारी नीति से डरने वाले नहीं हैं। आज का युवा स्पष्ट रूप से कह रहा है कि वह जाति और धर्म पर आधारित बाँटने वाली राजनीति को अब और बर्दाश्त नहीं करेगा। उसकी राजनीति के केंद्र में केवल तीन मूलभूत आवश्यकताएँ हैं-शिक्षा, स्वास्थ्य और रोज़गार।
विविधताओं को समेटता एकता का कैनवास
इस आंदोलन का सबसे खूबसूरत और प्रेरणादायक पहलू देश के हर राज्य से आए युवाओं का आपसी भाईचारा और विविधता में एकता का प्रदर्शन था।
राजस्थान के मकराना से आए विशाल राजोरा की कहानी इस एकता का जीवंत उदाहरण है। विशाल अपने पाँच साथियों के साथ लगभग 500 किलोमीटर का सफर तय करके सुबह-सुबह इस आंदोलन का हिस्सा बनने पहुँचे थे। उनके साथ उनके साथी असलम, धीरेंद्र चौधरी, मनोज पांडेय, अक्षय जैन और कमल बाल्मीकि थे। अलग-अलग पृष्ठभूमि, धर्म और जातियों से संबंध रखने वाले इन छह दोस्तों की आँखों में एक ही सपना था-एक सशक्त और न्यायप्रिय भारत का निर्माण।
वहीं, एक रात पहले तड़के चार बजे मुंबई से आई तीन युवतियों से मुलाकात हुई, जिन्होंने लगातार पाँच दिनों से 1100 किलोमीटर का सफर तय कर सड़क को ही अपना आशियाना बना लिया था। उनकी आँखों में देश के वर्तमान हालात को लेकर चिंता भी थी और लोकतंत्र को बचाने की दृढ़ उम्मीद भी। इनमें से एक पीएच.डी. की शोध छात्रा थी, दूसरी डॉक्टर (एमबीबीएस) की पढ़ाई कर रही थी और तीसरी एक युवा कलाकार थी। तीनों का जुनून और जज्बा ऐसा था कि किसी को भी प्रेरित कर दे। जब वे बता रही थीं कि वे यहाँ अपनी स्वतंत्रता, समानता, न्याय और सामाजिक सौहार्द को बचाने आई हैं, तो उनकी नम आँखें किसी के भी दिल को छू सकती थीं।
माँ की ममता और भावी पीढ़ी का नैतिक दायित्व
आंदोलन के इस महायज्ञ में समाज के हर वर्ग की सहभागिता देखने को मिली। रात के करीब तीन बजे तुर्कमान गेट से एक माँ अपनी दो बेटियों के साथ धरना स्थल पहुँची। दोनों बेटियाँ बुर्के में थीं। जब माँ से पूछा गया कि वे इस असमय यहाँ क्यों आई हैं, तो उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा कि उनकी छोटी बेटी शाम से ही जंतर-मंतर जाने की जिद कर रही थी, और एक माँ के तौर पर उन्होंने बेटी की भावनाओं और विचारों का सम्मान करना सही समझा।
जब उस छोटी बेटी से बातचीत हुई, तो पता चला कि वह एमबीबीएस की पढ़ाई कर रही है। उसने बहुत ही परिपक्वता से कहा, “मेरा नैतिक दायित्व है कि मैं यहाँ बैठकर संघर्ष कर रहे आंदोलनकारियों के समर्थन में खड़ी हूँ और उनका हौसला बढ़ाऊँ। मुझे अफसोस है कि मैं इस आमरण अनशन में सीधे शामिल नहीं हो सकी, लेकिन मैं इनके संकल्प को टूटने नहीं दूँगी। यही हौसला एक दिन बड़ा बदलाव लाएगा—एक ऐसा बदलाव जिससे तानाशाही का अंत होगा और संविधान का वास्तविक शासन स्थापित होगा।”
करवट लेता भारत का लोकतंत्र
देश के कोने-कोने से आए युवाओं, विद्यार्थियों, पेशेवरों और नागरिकों के इस अभूतपूर्व संगम ने यह स्पष्ट कर दिया है कि लोकतंत्र में सत्ता का वास्तविक नियंत्रण केवल और केवल जनता के हाथों में होना चाहिए। जनप्रतिनिधि जनता पर हुकूमत करने के लिए नहीं, बल्कि लोकसेवक के रूप में अपने कर्तव्यों के प्रति पूर्णतः जवाबदेह होने के लिए चुने जाते हैं।
20 जुलाई 2026 की रात जब संसद के करीब युवाओं के नारे गूँज रहे थे, तब यह स्पष्ट रूप से महसूस हो रहा था कि भारतीय लोकतंत्र एक नई दिशा में करवट ले रहा है। युवाओं का यह आक्रोश केवल एक विरोध प्रदर्शन नहीं, बल्कि देश के संविधान और लोकतांत्रिक मूल्यों को पुनर्जीवित करने का एक ऐतिहासिक आंदोलन है, जो आने वाले समय में एक सशक्त, निष्पक्ष और प्रगतिशील भारत की नींव रखेगा।
(लेखक वेब वार्ता समाचार एजेंसी में राजनैतिक संपादक हैं)




