अमेरिकी टैरिफ नीति और एफआईआई के रुख का बाजार पर रहेगा असर

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मुंबई, (वेब वार्ता)। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की टैरिफ नीति से विश्व में व्यापार युद्ध छिड़ने की आशंका में हुई भारी बिकवाली से बीते सप्ताह ढाई प्रतिशत तक लुढ़के घरेलू शेयर बाजार पर अगले सप्ताह भी टैरिफ खतरे और विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) के रुख का असर रहेगा।

बीते सप्ताह बीएसई का तीस शेयरों वाला संवेदी सूचकांक सेंसेक्स 1920.98 अंक अर्थात 2.5 प्रतिशत का गोता लगाकर सप्ताहांत पर 75939.21 अंक पर आ गया। इसी तरह नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) का निफ्टी 630.7 अंक यानी 2.7 प्रतिशत कमजोर रहकर 22929.25 अंक पर बंद हुआ। समीक्षाधीन सप्ताह में बीएसई की दिग्गज कंपनियों के मुकाबले मझौली और छोटी कंपनियों में हुई अधिक भारी बिकवाली से बाजार में कोहराम मच गया। इस दौरान मिडकैप 3318.48 अंक अर्थात 7.7 प्रतिशत लुढ़ककर सप्ताहांत पर 39731.79 अंक और स्मॉलकैप 4752.97 अंक यानी 9.5 प्रतिशत की गिरावट लेकर 45411.25 अंक पर आ गया।

इस वर्ष फरवरी में अबतक एफआईआई की बिकवाली लगातार जारी है। एफआईआई ने इस महीने 04 फरवरी की 809.23 करोड़ रुपये की लिवाली को छोड़कर अबतक केवली बिकवाली की है। इससे उन्होंने बाजार से अबतक कुल 29,183.43 करोड़ रुपये निकाल लिए हैं। हालांकि घरेलू संस्थागत निवेशकों (डीआईआई) की लगातार जारी लिवाली बाजार के लिए शुभ संकेत हैं। इस महीने अबतक डीआईआई कुल 26,019.07 करोड़ रुपये के लिवाल रहे हैं।

विश्लेषकों के अनुसार, सप्ताह के अंत में बाजार में बिकवाली का रुख हावी रहा, जिससे निवेशकों के बीच निराशा का माहौल देखने को मिला। ब्याज दरों में कटौती की घटती संभावनाओं और उद्योग के कमजोर आंकड़ों ने सतर्कता बढ़ा दी, जिससे रियल एस्टेट सेक्टर को सबसे अधिक नुकसान हुआ। इसके अलावा, पीएमआई डेटा भी उम्मीद से कमजोर रहा। हालांकि, आईटी क्षेत्र के संतोषजनक परिणाम और विवेकाधीन खर्च में सुधार के शुरुआती संकेतों ने बाजार को थोड़ी राहत दी। वहीं, ट्रम्प की आर्थिक नीतियों और उच्च मूल्यांकन को लेकर बनी अनिश्चितता अल्पावधि में विशेष रूप से उभरते बाजारों पर प्रभाव डाल सकती है।

कुल मिलाकर, तीसरी तिमाही के नतीजे उम्मीद के अनुरूप हैं लेकिन बाजार को पर्याप्त समर्थन नहीं दे रहे हैं, जिससे बिकवाली का रुख बना हुआ है। अमेरिकी फेडरल रिजर्व की ओपेन मार्केट कमेटी (एफओएमसी) की आगामी बैठक और केंद्रीय बजट जैसी प्रमुख घटनाएं बाजार की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी। एफओएमसी ने अब तक आक्रामक रुख बनाए रखा है जबकि ट्रम्प के ब्याज दरों में कटौती की मांग भविष्य के लिए सकारात्मक संकेत हो सकती है।

केंद्रीय बजट को लेकर उम्मीदें फिलहाल कम हैं लेकिन यदि इसमें कोई नकारात्मक आश्चर्य नहीं हुआ तो यह बाजार की चिंताओं को कम करने में मदद कर सकता है। व्यापक बाजार दबाव में है लेकिन लार्ज-कैप शेयरों का लचीलापन सकारात्मक संकेत देता है। इतिहास में भारतीय बाजार ने ‘टेपर टैंट्रम’ और भू-राजनीतिक चिंताओं जैसी चुनौतियों को सफलतापूर्वक पार किया है। मौजूदा सुधार भी कई कारकों जैसे टेपरिंग, आय में मंदी, उच्च मूल्यांकन और व्यापारिक अनिश्चितताओं का परिणाम है।

विश्लेषकों का मानना है कि बाजार समेकन के अंतिम चरण में पहुंच रहा है। व्यापक बाजार में अब तक 14 प्रतिशत तक की गिरावट देखने को मिली है लेकिन मजबूत आर्थिक बुनियादी ढांचे के चलते गिरावट सीमित रह सकती है। भारत का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि वित्त वर्ष 2025 में 6.4 प्रतिशत से बढ़कर वित्त वर्ष 2026 में 7.0 प्रतिशत होने का अनुमान है। यदि वित्त वर्ष 2026 में आय वृद्धि 15 प्रतिशत के दीर्घकालिक औसत पर लौटती है तो बाजार जल्द ही मंदी के प्रभाव से बाहर निकल सकता है। दीर्घकालिक निवेशकों के लिए यह धैर्य बनाए रखने और धीरे-धीरे निवेश बढ़ाने का अनुकूल समय हो सकता है।

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