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भरोसे का संकट और लोकतंत्र की नई परीक्षा

-सचिन कुमार गौतम

जयप्रकाश नारायण ने ‘संपूर्ण क्रांति’ का आह्वान कर एक अलग ऐतिहासिक दौर में इसी तरह के विचार को आगे बढ़ाया था। उनके आंदोलन ने भ्रष्टाचार, तानाशाही और लोकतांत्रिक संस्थाओं के पतन के खिलाफ छात्रों, नागरिकों और राजनीतिक समूहों को एक मंच पर लाया। आपातकाल के बाद लोकतंत्र की बहाली निस्संदेह भारत के लिए एक बड़ी जीत थी, क्योंकि 1975–77 के आपातकाल में नागरिक अधिकार, प्रेस की स्वतंत्रता और राजनीतिक प्रतिपक्ष पर गंभीर प्रहार हुए थे।

लेकिन आज की परिस्थिति को केवल सरकार और विपक्ष के तात्कालिक टकराव तक सीमित रखकर देखना अधूरी समझ होगी। दिल्ली की हालिया घटनाएँ एक बड़े सवाल की ओर इशारा करती हैं: क्या भारत में नागरिकों—विशेषकर युवाओं—और सार्वजनिक संस्थाओं के बीच भरोसे का संकट गहरा रहा है? यह संकट किसी एक पार्टी, नेता या सरकार की समस्या नहीं है। यह लोकतंत्र की उस नींव से जुड़ा है, जिस पर नागरिक यह उम्मीद रखते हैं कि संस्थाएँ रोज़मर्रा की राजनीति से ऊपर उठकर निष्पक्ष, पारदर्शी और जवाबदेह काम करेंगी।

चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है। नेशनल टेस्टिंग एजेंसी को परीक्षाएँ आयोजित करने के लिए एक स्वायत्त निकाय के रूप में बनाया गया था। फिर भी, मतदाता सूचियों और राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा—नीट—को लेकर उठे विवादों ने कई युवाओं के मन में यह भावना मजबूत की है कि जिन संस्थाओं पर उनका भविष्य टिका है, वे पर्याप्त रूप से पारदर्शी, जवाबदेह या स्वतंत्र नहीं हैं। बड़ा सवाल यह नहीं है कि युवा विरोध क्यों कर रहे हैं; बड़ा सवाल यह है कि इतने सारे युवा व्यवस्था की निष्पक्षता पर संदेह क्यों करने लगे हैं?

विरोध केवल कानून-व्यवस्था नहीं

इसलिए युवाओं के विरोध-प्रदर्शनों पर सरकार की प्रतिक्रिया बहुत मायने रखती है। बैरिकेड्स, पाबंदियाँ, भारी पुलिस बल की तैनाती और हिरासतें शायद किसी तात्कालिक प्रदर्शन को नियंत्रित कर लें। लेकिन इनसे भरोसा बहाल नहीं होता। कोई भी लोकतंत्र केवल पुलिस के दम पर भरोसे के संकट का समाधान नहीं कर सकता।

जब शांतिपूर्ण विरोध को मुख्य रूप से ‘कानून-व्यवस्था’ की समस्या मान लिया जाता है, तो सरकार शायद उस पल की लड़ाई जीत लेती है, लेकिन कुछ ऐसा खो देती है जो कहीं अधिक कीमती है—नागरिकों का भरोसा। एक स्वस्थ लोकतंत्र में विरोध केवल असंतोष का संकेत नहीं होता; वह नागरिकों की चेतना और जवाबदेही की मांग का भी प्रमाण होता है। यदि हर आवाज़ को ‘षड्यंत्र’, ‘राजनीति’ या ‘अराजकता’ कहकर खारिज कर दिया जाए, तो संवाद की जगह अविश्वास बैठ जाता है।

यह बात समझना जरूरी है कि स्थापित राजनीतिक दलों के नेतृत्व में होने वाले विरोध और युवाओं के उस समूह के लामबंद होने में अंतर है, जो खुद को किसी दल का हिस्सा नहीं मानता। सरकारें राजनीतिक दलों को समझती हैं—उनके नेता, संगठन, चुनावी हित और सौदेबाजी की सीमाएँ। लेकिन युवाओं का स्वतःस्फूर्त जुड़ाव अधिक लचीला, बिखरा हुआ और अनिश्चित होता है। यही उसकी ताकत भी है और सरकारों के लिए चुनौती भी।

ऐसी चेतना को रोजगार, उद्यमिता, तकनीक और विकास के अवसर देकर संभालने की कोशिश की जा सकती है। राजनीतिक लाभ देकर या डरा-धमकाकर इसे कुछ समय के लिए बिखेरा भी जा सकता है। लेकिन एक चीज़ को संभालना बेहद मुश्किल है—वह पीढ़ी, जिसका लोकतांत्रिक संस्थाओं से ही भरोसा उठ जाए। जब युवा मानने लगते हैं कि परीक्षा, नौकरी, मतदान या न्याय सब तयशुदा हैं, तो उनका गुस्सा केवल सड़क पर नहीं रुकता; वह लोकतंत्र के भविष्य पर सवाल खड़ा करता है।

गांधी का रचनात्मक कार्यक्रम

यहीं पर पहले गांधी और बाद में जयप्रकाश नारायण महत्वपूर्ण सबक देते हैं। गांधी ने कभी ब्रिटिश शासन के विरोध को ही पूरी ‘स्वतंत्रता की लड़ाई’ नहीं माना। सत्याग्रह और असहयोग के साथ-साथ उनका एक ‘रचनात्मक कार्यक्रम’ भी था—सांप्रदायिक सद्भाव, छुआछूत का खात्मा, खादी और ग्रामीण उद्योग, शिक्षा, स्वच्छता, स्वास्थ्य, किसानों और मजदूरों के बीच काम, आदिवासियों का कल्याण तथा ग्रामीण समाज का पुनर्निर्माण।

गांधी के लिए यह रचनात्मक कार्य राजनीतिक संघर्ष का कोई गौण हिस्सा नहीं था। यह ‘स्वराज’ की तैयारी था। उनका मानना था कि सच्ची आज़ादी केवल सत्ता हस्तांतरण से नहीं आती; उसके लिए समाज के भीतर आत्मनिर्भरता, नैतिक शुद्धि, सामाजिक समानता और स्थानीय स्वशासन का निर्माण जरूरी है। रचनात्मक कार्यक्रम को ही उन्होंने सत्य और अहिंसा के रास्ते से ‘पूर्ण स्वराज’ के निर्माण का माध्यम बताया।

जेपी की संपूर्ण क्रांति

जयप्रकाश नारायण ने ‘संपूर्ण क्रांति’ का आह्वान कर एक अलग ऐतिहासिक दौर में इसी विचार को आगे बढ़ाया। 1974 में बिहार के छात्रों के आंदोलन ने महँगाई, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज़ उठाई, और जेपी ने उसे एक व्यापक नैतिक-राजनीतिक आंदोलन का रूप दिया। 5 जून 1974 को पटना की विशाल रैली में उन्होंने ‘संपूर्ण क्रांति’ का आह्वान किया।

जेपी की ‘संपूर्ण क्रांति’ केवल सरकार बदलने की मांग नहीं थी। उनका लक्ष्य भारतीय जीवन के राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक ढांचे में व्यापक बदलाव था। उन्होंने अहिंसक पद्धति, नैतिक मूल्यों और सत्ता के विकेंद्रीकरण पर बल दिया। उनका आंदोलन धीरे-धीरे छात्र आंदोलन से आगे बढ़कर भ्रष्टाचार और अलोकतांत्रिक प्रवृत्तियों के खिलाफ एक राष्ट्रव्यापी विपक्षी गठबंधन का आधार बना।

आपातकाल के बाद लोकतंत्र की बहाली निस्संदेह भारत के लिए एक बड़ी जीत थी। 1977 के चुनावों ने यह साबित किया कि जनता की आवाज़ को लंबे समय तक दबाया नहीं जा सकता। लेकिन इतिहास हमारे सामने एक कठिन सवाल भी छोड़ जाता है—इतने शक्तिशाली राष्ट्रव्यापी आंदोलन के बाद भारत इतनी जल्दी अपने पुराने राजनीतिक और सामाजिक तौर-तरीकों पर क्यों लौट आया?

आंदोलन के बाद की खाली जगह

इसका एक बड़ा कारण यह रहा कि ‘संपूर्ण क्रांति’ कोई ऐसा निरंतर चलने वाला, राष्ट्रव्यापी और गैर-दलीय रचनात्मक कार्यक्रम नहीं बन पाया, जिसके जरिए आम नागरिक अपने रोजमर्रा के जीवन में नए लोकतंत्र का अभ्यास जारी रख सकते। आंदोलन ने तानाशाही को हराने में मदद तो की, लेकिन सत्ता परिवर्तन के बाद उसके सामाजिक आधार को मजबूत करने का काम पीछे छूट गया।

इस आंदोलन से बनी राजनीतिक जगह पर दलों ने कब्ज़ा कर लिया। सरकारें बदलीं, नेता बदले, नारे बदले, लेकिन असमानता, भ्रष्टाचार, सत्ता का केंद्रीकरण और राजनीतिक शक्ति पर निर्भरता जैसी गहरी संरचनाएँ बनी रहीं। इससे मिलने वाला सबक असहज है: एक देशव्यापी आंदोलन किसी सरकार को हटा सकता है, लेकिन वह अकेले समाज का पुनर्निर्माण नहीं कर सकता। सामाजिक पुनर्निर्माण के बिना मिली राजनीतिक जीत राजनीतिक संस्कृति को काफी हद तक वैसी ही बनाए रख सकती है।

विरोध के साथ निर्माण

यहीं पर गांधीजी का ‘रचनात्मक कार्यक्रम’ फिर से प्रासंगिक हो जाता है। युवा केवल विरोध ही क्यों करें? अगर उन्हें चुनाव आयोग पर भरोसा नहीं है, तो वे ऐसे नागरिक समूह बना सकते हैं जो किसी राजनीतिक दल से न जुड़े हों। ये समूह नागरिकों को मतदाता सूची की जांच, सुधार की प्रक्रिया और वास्तविक अनियमितताओं के दस्तावेजीकरण में मदद कर सकते हैं। यह काम सरकार के विरुद्ध सड़क पर उतरने से कम महत्वपूर्ण नहीं है; बल्कि यह लोकतंत्र को रोज़ के अभ्यास में बदलने का काम है।

अगर युवाओं को परीक्षा प्रणाली पर भरोसा नहीं है, तो उन्हें केवल परीक्षा रद्द करने या नेता बदलने की मांग तक सीमित नहीं रहना चाहिए। उन्हें ऐसे संस्थागत सुधारों की मांग करनी चाहिए जिनसे लाखों परीक्षार्थियों के हितों की रक्षा हो—पारदर्शी प्रक्रिया, स्वतंत्र जांच, समयबद्ध सुधार, परीक्षा-प्रक्रिया का सार्वजनिक ऑडिट और त्रुटियों के लिए स्पष्ट जवाबदेही।

बेरोजगारी की चिंता है तो केवल सरकारी नौकरियों की मांग ही नहीं, बल्कि समुदायों के साथ मिलकर आजीविका, कौशल और उद्यम विकसित करने का काम भी किया जा सकता है। जलवायु परिवर्तन की चिंता है तो जल स्रोतों को पुनर्जीवित करने, खराब हो चुकी जमीन को उपजाऊ बनाने और किसानों के साथ पर्यावरण-अनुकूल आजीविका के विकल्प तैयार करने का काम किया जा सकता है। गांवों की स्थिति पर चिंता है तो हर कॉलेज एक गांव या मोहल्ले को गोद ले सकता है, जहाँ स्वास्थ्य, शिक्षा, स्वच्छता, डिजिटल साक्षरता और स्थानीय आर्थिक विकास छात्रों की नागरिक जिम्मेदारी बन सके।

इसका अर्थ यह नहीं है कि विरोध छोड़ दिया जाए। इसका अर्थ है कि विरोध को एक रचनात्मक आधार दिया जाए। विरोध बताता है कि क्या गलत है; रचनात्मक कार्य बताता है कि उसे कैसे सुधारा जाए। गांधी के रचनात्मक कार्यक्रम का मूल संदेश भी यही था कि राजनीतिक संघर्ष के बिना सामाजिक बदलाव अधूरा है, और सामाजिक बदलाव के बिना राजनीतिक जीत क्षणिक रहती है।

वन क्षेत्रों का सबक

यही सिद्धांत भारत के वन क्षेत्रों पर भी लागू होता है। माओवादी हिंसा को हराना जरूरी है। कोई भी समाज यह इजाज़त नहीं दे सकता कि सशस्त्र हिंसा उसके नागरिकों का भविष्य तय करे। लेकिन विद्रोह के खत्म होने का मतलब यह नहीं हो सकता कि वनों और प्राकृतिक संसाधनों को बड़ी कंपनियों को सौंप दिया जाए—खासकर तब, जब वनवासी समुदायों के अधिकारों, आजीविका और पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव पर गंभीर विचार न हो।

गांधी पूछते—विकास किसके लिए है और उसे तय कौन करेगा? विकास का मतलब उद्योगों को पूरी तरह नकारना नहीं है। लेकिन विकास ऐसा होना चाहिए जो स्थानीय लोगों की क्षमताओं, आजीविका और सम्मान को बढ़ाए, न कि उनके संसाधनों के आधार को कहीं और स्थानांतरित कर दे। विकास केवल इमारतों, सड़कों और निवेश के आँकड़ों से नहीं मापा जाना चाहिए; उसे यह भी देखकर मापा जाना चाहिए कि उससे आखिरी पीड़ित व्यक्ति की जिंदगी में क्या बदला।

विपक्ष की जिम्मेदारी

विपक्ष की भी अपनी एक जिम्मेदारी है। उसे युवाओं के गुस्से और उनके हर जुटाव को किसी राजनीतिक रैली में बदलने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। उसे यह भी नहीं मान लेना चाहिए कि मौजूदा सरकार को हरा देना ही भारत को बदलने के बराबर है। जेपी आंदोलन से हमें यह सीख मिलती है कि राजनीतिक जीत का मतलब सामाजिक बदलाव नहीं होता।

विपक्ष भरोसेमंद विकल्प बनना चाहता है तो उसे यह दिखाना होगा कि शिक्षा, रोजगार, संस्थानों, गांवों, जंगलों और नागरिकों के रोजमर्रा के जीवन में ‘अलग तरह की राजनीति’ का क्या मतलब होगा। उसे सत्ता के लिए नहीं, बल्कि संस्थाओं की मजबूती, नागरिक अधिकारों की रक्षा और सामाजिक न्याय के लिए एक स्पष्ट कार्यसूची पेश करनी होगी।

युवा दूसरा विपक्ष नहीं

युवाओं को दूसरा ‘विपक्ष’ बनने की जरूरत नहीं है। वे एक ऐसी स्वतंत्र लोकतांत्रिक ताकत बन सकते हैं जो हर सरकार से सवाल पूछे, लेकिन किसी से पक्षपातपूर्ण रूप से न जुड़े; जो जरूरत पड़ने पर विरोध करे, लेकिन लगातार निर्माण भी करती रहे; जो संस्थानों से जवाबदेही की मांग करे और खुद भी जवाबदेह बनी रहे।

गांधीजी का ‘स्वराज’ केवल ब्रिटिश शासकों से भारतीय शासकों के हाथों में सत्ता का हस्तांतरण भर नहीं था। उसकी शुरुआत आत्म-नियंत्रण से होती है। उसके लिए ऐसे नागरिक चाहिए, जो वर्चस्व का विरोध कर सकें, लेकिन खुद वर्चस्व का जरिया न बनें। भारत को आज केवल नई सरकार नहीं, बल्कि नई नागरिक चेतना की जरूरत है—ऐसी चेतना, जो सत्ता से सवाल पूछे, संस्थाओं को जवाबदेह बनाए और समाज को भी बेहतर बनाने का काम करे।

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