लक्ष्मीकान्त पाठक
हरदोई (वेबवार्ता) असत्य पर सत्य, अधर्म पर धर्म और अहंकार पर मर्यादा की विजय का प्रतीक रावण वध का प्रसंग शाहाबाद के पठकाना रामलीला मैदान में श्रद्धा, उल्लास और भव्यता के साथ मंचित किया गया। भगवान श्रीराम और लंकापति रावण के बीच हुए भीषण युद्ध के सजीव मंचन ने दर्शकों को त्रेतायुग की उस गाथा से जोड़ दिया, जिसमें धर्म की प्रतिष्ठा और अधर्म के अंत का शाश्वत संदेश निहित है। रावण का पुतला धू-धू कर जला तो पूरा पठकाना रामलीला मैदान ‘जय श्रीराम’ के जयघोष से गुंजायमान हो उठा। आस्था, उत्साह और भक्ति से सराबोर वातावरण में विजय पर्व की भव्य छटा देखते ही बनी।कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में पहुंचीं प्रदेश की उच्च शिक्षा राज्यमंत्री रजनी तिवारी ने भगवान श्रीराम के आदर्शों को जीवन में आत्मसात करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का जीवन सत्य, त्याग, धर्म, कर्तव्यनिष्ठा और आदर्शों के प्रति अटूट प्रतिबद्धता की अनुपम मिसाल है। उनके जीवन से प्रेरणा लेकर प्रत्येक व्यक्ति अपने आचरण को श्रेष्ठ बनाने के साथ समाज में सकारात्मक परिवर्तन का वाहक बन सकता है।राज्यमंत्री ने कहा कि रामलीला महज मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, धार्मिक आस्था और नैतिक मूल्यों की जीवंत अभिव्यक्ति है। यह ऐसी सांस्कृतिक परंपरा है, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी संस्कारों और आदर्शों की ज्योति प्रज्वलित करती है। भगवान श्रीराम ने अपने आचरण से माता-पिता के प्रति सम्मान, परिवार के प्रति उत्तरदायित्व, समाज के प्रति कर्तव्य और अन्याय के विरुद्ध संघर्ष का संदेश दिया। उन्होंने युवाओं से श्रीराम के आदर्शों को जीवन में उतारने की अपील करते हुए कहा कि सत्य, मर्यादा, करुणा और कर्तव्य के पथ पर चलकर ही समाज में प्रेम, सद्भाव और मानवीय मूल्यों को सुदृढ़ किया जा सकता है।
पठकाना रामलीला मैदान में कलाकारों ने अपने सशक्त अभिनय और प्रभावशाली संवादों के माध्यम से राम-रावण युद्ध के प्रसंग को जीवंत कर दिया। युद्ध के रोमांचक दृश्यों ने दर्शकों को भावविभोर कर दिया। भगवान श्रीराम के हाथों रावण का संहार होते ही धर्म की विजय का उद्घोष वातावरण में गूंज उठा। इसके बाद रावण दहन और आतिशबाजी के बीच उपस्थित जनसमूह ने असत्य पर सत्य की विजय के इस प्रतीकात्मक उत्सव का उल्लासपूर्वक स्वागत किया।रावण वध की लीला ने यह संदेश भी दिया कि विद्वत्ता, सामर्थ्य और वैभव का वास्तविक महत्व तभी है, जब उनके साथ विवेक, विनम्रता और मर्यादा का समन्वय हो। अपार ज्ञान और शक्ति का स्वामी होने के बावजूद रावण का अहंकार उसके विनाश का कारण बना, जबकि भगवान श्रीराम ने धर्म, संयम और मर्यादा के बल पर विजय प्राप्त की। यही इस प्रसंग की शाश्वत सीख है कि अहंकार पतन का मार्ग प्रशस्त करता है और सदाचार मनुष्य को श्रेष्ठता की ओर ले जाता है।
कार्यक्रम का शुभारंभ मेला अध्यक्ष संजय मिश्रा ‘बबलू’ ने भगवान श्रीराम की आरती उतारकर किया। इस अवसर पर डॉ. मुरारीलाल गुप्ता, डॉ. देश दीपक मिश्रा, मुकेश अवस्थी समेत रामलीला समिति के पदाधिकारी, सदस्य और बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे। मेला व्यवस्थापक ऋषि मिश्रा सहित आयोजन से जुड़े कार्यकर्ताओं ने कार्यक्रम के सुव्यवस्थित संचालन में सक्रिय भूमिका निभाई।श्रद्धा और सांस्कृतिक चेतना से ओतप्रोत इस आयोजन ने धार्मिक परंपराओं के संरक्षण के साथ नई पीढ़ी को सत्य, सदाचार और मर्यादा के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी। पठकाना रामलीला मैदान में गूंजे जय श्रीराम के उद्घोष ने वातावरण को भक्तिमय बना दिया और उपस्थित लोगों को धर्म की राह पर चलने का संदेश दिया।




