लक्ष्मीकान्त पाठक
हरदोई 19 अक्टूबर (वेबवार्ता) भक्ति का उत्कर्ष, शौर्य का शंखनाद और अधर्म के अहंकार पर धर्म की विजय का संदेश। पठकाना रामलीला में लंका दहन की लीला का ऐसा सजीव मंचन हुआ कि दर्शक भावविभोर हो उठे। पवनपुत्र हनुमान के अद्भुत पराक्रम, विलक्षण बुद्धिमत्ता और प्रभु श्रीराम के प्रति अटूट समर्पण ने रामलीला के मंच पर भक्ति और वीरता का अनुपम दृश्य उपस्थित कर दिया। लंका दहन के रोमांचकारी प्रसंगों के बीच जय श्रीराम और जय बजरंगबली के उद्घोष से पूरा परिसर गुंजायमान हो उठा।रामलीला का शुभारंभ विधि-विधान से आरती-पूजन के साथ हुआ। सर्वप्रथम पठकाना रामलीला मेला समिति के वरिष्ठ उपाध्यक्ष इं. प्रवीण वाजपेयी ने आरती-पूजन किया। इसके उपरांत भाजपा नगर अध्यक्ष अनिल पाण्डेय ‘पिंटू’ और पूर्व ब्लॉक प्रमुख रामनाथ त्रिपाठी ने भगवान श्रीराम की आरती उतारकर श्रद्धापूर्वक पूजन किया। आरती के साथ ही वातावरण में भक्ति और आस्था की धारा प्रवाहित होने लगी।
हनुमत शौर्य के आगे चूर हुआ लंकापति का अभिमान
लंका दहन की लीला में पवनपुत्र हनुमान के अदम्य साहस, प्रखर बुद्धिमत्ता और असाधारण पराक्रम का प्रभावशाली मंचन किया गया। माता सीता की खोज में लंका पहुंचने, अशोक वाटिका में राक्षसों को चुनौती देने और रावण के दरबार में निर्भीकता से प्रभु श्रीराम का संदेश सुनाने के प्रसंगों ने दर्शकों को रोमांचित कर दिया। इसके बाद लंका दहन के दृश्य ने मंचन को चरम पर पहुंचा दिया। कलाकारों के सशक्त अभिनय और प्रभावपूर्ण प्रस्तुति ने रामायण की इस गौरवशाली गाथा को मानो दर्शकों के सामने साकार कर दिया।
लंका दहन का प्रसंग केवल एक रोमांचक लीला नहीं, बल्कि अहंकार, अन्याय और अधर्म के अंत का शाश्वत संदेश भी है। हनुमान जी का चरित्र सिखाता है कि वास्तविक शक्ति केवल बाहुबल में नहीं, बल्कि विवेक, विनम्रता, निष्ठा और कर्तव्य के प्रति अटूट समर्पण में निहित है। प्रभु श्रीराम के प्रति उनकी अनन्य भक्ति यह प्रेरणा देती है कि जब साहस के साथ बुद्धिमत्ता और सामर्थ्य के साथ धर्म का संबल जुड़ता है, तब बड़ी से बड़ी चुनौती भी परास्त हो सकती है।
पठकाना रामलीला में इस प्रसंग का मंचन भारतीय लोकसंस्कृति और धार्मिक आस्था की जीवंत अभिव्यक्ति बना। रामकथा के माध्यम से दर्शकों को सत्य, धर्म, मर्यादा और कर्तव्यपरायणता के आदर्शों से जुड़ने का अवसर मिला।इस अवसर पर मेला अध्यक्ष संजय मिश्रा ‘बबलू’, मेला व्यवस्थापक ऋषि मिश्रा सहित मेला समिति के पदाधिकारी, सदस्य और बड़ी संख्या में दर्शक उपस्थित रहे। रामलीला का यह आयोजन श्रद्धा और सांस्कृतिक परंपरा के उस अनवरत प्रवाह का प्रतीक बना, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी जनमानस को मर्यादा, भक्ति और सदाचार की प्रेरणा देता आ रहा है।




