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जंतर-मंतर बंद, लोकतंत्र का दरवाजा भी?

-सचिन कुमार गौतम

लोकतंत्र में जनता की नाराजगी की अभिव्यक्ति के लिए दशकों से महत्वपूर्ण स्थल बन चुके जंतर-मंतर पर अब सरकार की नजर पड़ चुकी है। दिल्ली पुलिस आयुक्त अनुराग कुमार के 11 अक्टूबर 2026 के आदेश के बाद जंतर-मंतर रोड को तय प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटा दिया गया है। इसका सीधा मतलब यह है कि पिछले दो-ढाई दशकों से कई ऐतिहासिक आंदोलनों, जन-विरोधों और नागरिक संघर्षों का गवाह रहा जंतर-मंतर अब प्रदर्शन के लिए उपलब्ध नहीं रहेगा। सरकार का तर्क है कि इससे यातायात, कारोबार और मध्य दिल्ली की सामान्य गतिविधियों को राहत मिलेगी। लेकिन विपक्ष और नागरिक अधिकारों से जुड़े लोग इसे केवल प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि विरोध की आवाज को हाशिए पर धकेलने की कोशिश मान रहे हैं।

जंतर-मंतर: विरोध की पहचान

दिल्ली में संसद भवन, सरकारी दफ्तरों और प्रशासनिक परिसरों से कुछ ही दूरी पर स्थित जंतर-मंतर लंबे समय से राजनीतिक विरोध और जन आंदोलनों का प्रमुख केंद्र रहा है। यहां केवल भाषण नहीं होते थे; यहां आम नागरिक, छात्र, किसान, मजदूर, महिलाएं, सामाजिक कार्यकर्ता और राजनीतिक दल अपनी मांगें सीधे सत्ता के सामने रखते थे। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह रही कि यह स्थान मीडिया के लिए भी सुलभ था और दिल्ली के केंद्र में होने के कारण वहां उठी आवाज राष्ट्रीय राजनीति तक पहुंचती थी।

पिछले 20-25 वर्षों में जंतर-मंतर पर कई बड़े आंदोलन हुए। भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे का आंदोलन, निर्भया कांड के बाद महिला सुरक्षा की मांग, किसानों के अधिकारों को लेकर प्रदर्शन, छात्र संगठनों के विरोध, ट्रेड यूनियनों की हड़तालें और विभिन्न सामाजिक मुद्दों पर नागरिकों की सभाएं—इन सबने जंतर-मंतर को लोकतंत्र का एक प्रतीक बना दिया। यहां खड़े लोगों ने कई बार सरकारों को अपनी नीतियों पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर किया। इसलिए जंतर-मंतर केवल दिल्ली की एक सड़क या मैदान नहीं, बल्कि जनता और सत्ता के बीच संवाद का एक प्रतीकात्मक पुल रहा है।

नया आदेश और विकल्प

अब दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर की जगह रामलीला मैदान, पूर्वी दिल्ली के शाहदरा स्थित सीबीडी ग्राउंड और उत्तरी दिल्ली के बुराड़ी ग्राउंड को प्रदर्शन स्थल के रूप में चिन्हित किया है। पुलिस का कहना है कि जंतर-मंतर पर बार-बार होने वाले प्रदर्शनों से मध्य दिल्ली में यातायात जाम, कारोबार में बाधा और आम जनजीवन प्रभावित होता है। साथ ही यह इलाका संवेदनशील सरकारी इमारतों और दफ्तरों के निकट होने के कारण सुरक्षा की दृष्टि से भी चुनौतीपूर्ण माना जाता है।

पूर्व आईपीएस अधिकारी और अब भाजपा नेता किरण बेदी ने भी कहा है कि जंतर-मंतर प्रदर्शन के लिए उपयुक्त जगह नहीं है, क्योंकि वहां के रास्ते संकरे हैं और आसपास कई महत्वपूर्ण संस्थाएं स्थित हैं। लेकिन यह बहस केवल यातायात और सुरक्षा तक सीमित नहीं है। सवाल यह है कि क्या प्रदर्शन के अधिकार को ऐसी जगहों पर खिसकाना, जहां पहुंचना कठिन हो और मीडिया की पहुंच कम हो, लोकतंत्र के हित में है? रामलीला मैदान अक्टूबर से दिसंबर के बीच त्योहारों और सांस्कृतिक आयोजनों के कारण अक्सर उपलब्ध नहीं हो पाता। शाहदरा और बुराड़ी के मैदान दिल्ली के किनारों पर हैं, जहां पहुंचना, तमाम लोगों के लिए असुविधाजनक हो सकता है।

विपक्ष के सवाल

इस फैसले के समय दिल्ली में ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर प्रदर्शन चल रहे हैं। ऐसे में विपक्ष का आरोप है कि जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थलों से हटाने का फैसला संयोग नहीं है। समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव ने कहा कि सरकार लोगों को उन जगहों से दूर रखना चाहती है, जहां से जनता का गुस्सा सत्ता तक सीधे पहुंच सकता है। आम आदमी पार्टी के सौरभ भारद्वाज ने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह नई पीढ़ी के विरोध-प्रदर्शनों से घबराए हुए हैं।

कांग्रेस सांसद जयराम रमेश ने इसे व्यंग्य के साथ ‘डेमोकुर्सी’ का मामला बताया। वहीं कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दिपके ने सोशल मीडिया पर लिखा कि प्रदर्शन स्थल बदलने से असहमति की आवाज को दबाया नहीं जा सकता। उनका कहना था कि कल प्रधानमंत्री मोदी लोकतंत्र को भी प्रदर्शन स्थलों की सूची से बाहर कर सकते हैं, क्योंकि असली समस्या जगह नहीं, बल्कि लोगों के विरोध करने के विचार से है। ये टिप्पणियां तीखी जरूर हैं, लेकिन इनके पीछे की चिंता गंभीर है—कि क्या सत्ता विरोध को केवल व्यवधान समझकर उसे नियंत्रित करने की कोशिश कर रही है?

सरकार का तर्क और संदेह

सरकार का कहना है कि इस फैसले का ज्ञानेश कुमार विरोधी आंदोलन से कोई लेना-देना नहीं है। यह कहा जा सकता है कि पुलिस प्रशासन को शहर के यातायात, सुरक्षा और कानून-व्यवस्था का ध्यान रखना होता है। बड़े प्रदर्शनों से आम नागरिकों को असुविधा भी होती है और कारोबार प्रभावित होता है। यह तर्क पूरी तरह बेतुका नहीं है।

लेकिन लोकतंत्र में प्रशासनिक सुविधा और नागरिक अधिकार के बीच संतुलन जरूरी है। यदि हर प्रदर्शन को यातायात या सुरक्षा की समस्या बताकर दूर के इलाकों में धकेल दिया जाए, तो विरोध की राजनीतिक और प्रतीकात्मक ताकत कमजोर होगी। जंतर-मंतर की अहमियत इसी बात में थी कि वह सत्ता के केंद्र के पास था। वहां खड़े प्रदर्शनकारी सरकार को यह याद दिलाते थे कि जनता दूर नहीं है। अब जब प्रदर्शनकारी शहर के किनारों पर जाएंगे, तो सत्ता और जनता के बीच की दूरी केवल भौगोलिक नहीं, बल्कि राजनीतिक भी बढ़ेगी।

जुलाई का जेन जेड आंदोलन

विपक्ष के आरोपों को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता, क्योंकि इस साल जुलाई में धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे को लेकर उठे जेन जेड आंदोलन ने जंतर-मंतर पर ही अपनी ताकत दिखाई थी। युवाओं का वह आंदोलन सरकार के लिए चेतावनी बन गया था। अब ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर चल रहे प्रदर्शनों के दौरान भी आंदोलनकारियों को जंतर-मंतर पहुंचने से रोकने की कोशिशें होती रही हैं। ऐसे में यह मानना स्वाभाविक है कि जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थलों से हटाने का निर्णय केवल प्रशासनिक व्यवस्था का हिस्सा नहीं है।

मोदी सरकार अच्छी तरह समझती है कि जब नाराज लोग दिल्ली के केंद्र में एक साथ जुटते हैं, तो उसका राजनीतिक प्रभाव बड़ा होता है। जंतर-मंतर पर उमड़ी भीड़ न केवल सरकार को दबाव में डालती है, बल्कि देशभर के लोगों को भी संगठित होने की प्रेरणा देती है। इसीलिए विपक्ष का यह कहना सही है कि इस फैसले को लोकतांत्रिक विरोध के लिए उपलब्ध स्थान और अवसर से जोड़कर देखा जाना चाहिए।

नई जगहों की व्यावहारिक दिक्कतें

रामलीला मैदान, सीबीडी ग्राउंड और बुराड़ी ग्राउंड को प्रदर्शन स्थल बताया गया है, लेकिन इन जगहों की अपनी सीमाएं हैं। रामलीला मैदान त्योहारों के मौसम में अक्सर अन्य आयोजनों के लिए व्यस्त रहता है। सीबीडी और बुराड़ी के मैदान दिल्ली के बाहरी इलाकों में हैं, जहां पहुंचना, भीड़ को व्यवस्थित रखना और मीडिया की उपस्थिति सुनिश्चित करना आसान नहीं होगा।

दिल्ली के लोग इन जगहों से वाकिफ हो सकते हैं, लेकिन देशभर के लोग प्रदर्शन के पर्याय के रूप में जंतर-मंतर को ही पहचानते हैं। जंतर-मंतर का नाम सुनते ही जन-आंदोलन, विरोध और नागरिक अधिकारों की याद आती है। संभव है कि समय के साथ नई जगहों की पहचान भी बन जाए, लेकिन तब तक सरकार के लिए प्रदर्शनों का दबाव कम हो सकता है। यही विपक्ष की सबसे बड़ी चिंता है।

विरोध जगह से बड़ा होता है

हालांकि यह भी सच है कि लोकतंत्र में प्रदर्शनों की ताकत केवल उनकी जगह से तय नहीं होती। 2020-21 के किसान आंदोलन में हजारों किसान महीनों तक दिल्ली की सीमाओं पर डटे रहे। उन्हें जंतर-मंतर आने की जरूरत नहीं पड़ी, फिर भी सरकार को कृषि कानूनों वापस लेने पर मजबूर होना पड़ा। इसी तरह शाहीन बाग में सीएए के खिलाफ महिलाओं का लंबा धरना भी जंतर-मंतर से दूर होकर राष्ट्रीय मुद्दा बन गया था।

यानी असली संदेश यह है कि जनता का गुस्सा और असंतोष किसी एक मैदान तक सीमित नहीं रह सकता। यदि सरकार जनता की बात नहीं सुनेगी, तो विरोध किसी भी जगह से उभर सकता है—चाहे वह सीमा हो, मोहल्ला हो, विश्वविद्यालय हो या सोशल मीडिया। जगह बदलने से असहमति खत्म नहीं होती; बल्कि कभी-कभी वह और व्यापक रूप ले लेती है।

इतिहास की सीख

जंतर-मंतर से पहले इंडिया गेट और विजय चौक के निकट बोट क्लब का लॉन आजादी के बाद कई दशकों तक बड़े राजनीतिक और जन प्रदर्शनों का केंद्र रहा। अक्टूबर 1988 में किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में हजारों किसान बोट क्लब पर जुटे थे। वे अपने मवेशियों के साथ कई दिनों तक वहां डटे रहे और तत्कालीन राजीव गांधी सरकार पर अपनी मांगें मानने का दबाव बनाया। यह इतिहास बताता है कि दिल्ली में जनता की आवाज के लिए केंद्रीय स्थान हमेशा महत्वपूर्ण रहे हैं।

जब एक स्थान पर प्रतिबंध लगाया जाता है, तो जनता दूसरा स्थान ढूंढ लेती है। लेकिन सवाल यह है कि सरकार क्यों बार-बार विरोध को दूर धकेलना चाहती है? एक स्वस्थ लोकतंत्र में सरकार को प्रदर्शनों से डरना नहीं चाहिए, बल्कि उन्हें जनता की भावना समझने का अवसर मानना चाहिए। विरोध का हक संविधान की देन है और इसे केवल प्रशासनिक सुविधा के नाम पर सीमित नहीं किया जा सकता।

लोकतंत्र का संदेश

मोदी और शाह यह भूल रहे हैं कि लोकतंत्र में प्रदर्शनों का महत्व प्रदर्शन स्थलों से कहीं अधिक है। जंतर-मंतर पर रोक लगाने से लोगों को इकट्ठा होने से रोका जा सकता है, लेकिन उनके मन में बैठे सवालों को नहीं। जब तक लोकतंत्र कायम रहेगा, विरोध-प्रदर्शन का अधिकार भी बना रहेगा—चाहे वह जंतर-मंतर पर दिखे या किसी दूर के मैदान में। सरकार के लिए बेहतर रास्ता यही है कि वह प्रदर्शनकारियों की जगह नहीं, बल्कि उनकी मांगों पर ध्यान दे। क्योंकि जनता की आवाज को दबाने से लोकतंत्र मजबूत नहीं होता, बल्कि उसकी नींव कमजोर होती है।

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