-सचिन कुमार गौतम
सोमवार, 12 अक्टूबर को देश की राजधानी दिल्ली में विपक्षी दलों के नेतृत्व में आम जनता ने बड़े पैमाने पर विरोध-प्रदर्शन किया। राहुल गांधी के आह्वान पर उमड़ी भीड़ ने साफ संदेश दिया कि अब मुद्दा केवल भ्रष्टाचार, काला धन, परीक्षा पेपर लीक, महिलाओं की सुरक्षा या सांप्रदायिक उन्माद जैसे मुद्दों तक सीमित नहीं है। इस बार सवाल नागरिक होने के मौलिक अधिकार, विशेषकर मतदान के अधिकार को लेकर उठा है। विपक्ष का आरोप है कि वोटर लिस्ट से बड़ी संख्या में नाम हटाए जा रहे हैं और इससे करोड़ों लोग अपने लोकतांत्रिक अधिकारों से वंचित हो सकते हैं।
यह विरोध इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि वोट लोकतंत्र की सबसे बुनियादी अभिव्यक्ति है। यदि नागरिक अपना प्रतिनिधि चुनने के अधिकार से ही वंचित हो जाते हैं, तो उनकी लोकतंत्र में भागीदारी प्रभावित होती है। इसी चिंता को लेकर विपक्ष ने एसआईआर यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन की प्रक्रिया, वोटर लिस्ट में कथित गड़बड़ी और चुनाव आयोग की पारदर्शिता को मुद्दा बनाया है। उनका कहना है कि जब चुनावी प्रक्रिया पर ही सवाल उठने लगें, तो यह केवल किसी दल का राजनीतिक मुद्दा नहीं रहता, बल्कि पूरे लोकतंत्र का सवाल बन जाता है।
दिल्ली में जन-आक्रोश की परंपरा
राजधानी दिल्ली देश के राजनीतिक और सामाजिक आंदोलनों का केंद्र रही है। जयप्रकाश नारायण का आंदोलन, अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन, किसान आंदोलन और शाहीन बाग आंदोलन—इन सबका केंद्र दिल्ली रहा। हर आंदोलन के पीछे सामाजिक संगठन, गैर-सरकारी संस्थाएं, छात्र संगठन, मजदूर संगठन या राजनीतिक दल होते हैं। ये ताकतें सरकार के सामने अपनी मांगें रखती हैं और जनता की नाराजगी को सड़क पर अभिव्यक्ति देती हैं।
ऐसे आंदोलनों में अक्सर दो पक्ष स्पष्ट दिखते हैं—एक ओर प्रदर्शनकारी जनता और दूसरी ओर सरकार या प्रशासन। कभी सरकारें कठोर रुख अपनाती हैं, कभी बातचीत की कोशिश करती हैं और कई बार दबाव के बाद समझौते की राह पर चलती हैं। लेकिन वोट चोरी के मुद्दे पर उठे इस विरोध में विपक्ष का आरोप है कि सरकार की तरफ से संवाद की कोई स्पष्ट पहल नहीं दिख रही है। उनके अनुसार मैदान में केवल पुलिस, सुरक्षा बल और प्रशासनिक तैयारी दिख रही है, जबकि जिनसे शिकायत है—प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और मुख्य चुनाव आयुक्त—वे सीधे जनता के सामने नहीं आ रहे हैं।
यह अनुपस्थिति विपक्ष के लिए राजनीतिक मुद्दा बन गई है। उनका तर्क है कि जब लाखों लोग सड़क पर उतरें और सरकार की ओर से कोई ठोस जवाब न मिले, तो यह लोकतांत्रिक संवाद की कमजोरी दर्शाता है। सत्ता में रहने वाले नेता और संवैधानिक पदाधिकारी जनता की चिंताओं को सुनने के लिए जिम्मेदार होते हैं। यदि वे जवाबदेही से परहेज करते हैं, तो जनता का भरोसा और गहरा टूटता है।
सीजेआई से मुलाकात का सवाल
राहुल गांधी ने पहले ही घोषणा की थी कि इंडिया गठबंधन की ओर से वे भारत के मुख्य न्यायाधीश से मिलकर अपनी शिकायतें रखेंगे। लेकिन सोमवार सुबह मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने ऐसी मुलाकात के लिए सहमति नहीं दी। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे सभी नागरिकों के लिए खुले हैं। कोई भी व्यक्ति, चाहे आम नागरिक हो या निर्वाचित प्रतिनिधि, नियमानुसार याचिका दायर कर सकता है। अदालत कानून के अनुसार शिकायतों पर विचार करेगी और जिन्हें राहत का अधिकार है, उन्हें न्याय मिलेगा।
कानूनी दृष्टि से मुख्य न्यायाधीश की बात पूरी तरह तर्कसंगत है। न्यायपालिका किसी राजनीतिक दल या नेता के साथ अनौपचारिक बैठक करके मामले का निपटारा नहीं कर सकती। न्यायिक प्रक्रिया की मर्यादा इसी बात में है कि हर शिकायत औपचारिक याचिका के माध्यम से आए और अदालत उसे कानून के दायरे में सुने। इससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता और निष्पक्षता बनी रहती है।
फिर भी विपक्ष का तर्क यह है कि जब मुद्दा इतना बड़ा हो और उससे लाखों नागरिकों के मताधिकार से जुड़ा दावा हो, तो न्यायपालिका किसी संवेदनशील पहल के जरिए सुनवाई को सुगम बना सकती है। इतिहास में भारतीय न्यायपालिका ने ऐसी कई पहलें की हैं। इसीलिए विपक्ष मानता है कि मुख्य न्यायाधीश से सीधी मुलाकात का अवसर एक प्रतीकात्मक और लोकतांत्रिक संदेश भी दे सकता था।
पीआईएल की विरासत और न्याय तक पहुंच
भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में जनहित याचिका यानी पीआईएल की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। आठवें दशक के अंत और नवासी के दशक में न्यायमूर्ति पी. एन. भगवती और न्यायमूर्ति वी. आर. कृष्ण अय्यर ने यह स्थापित किया कि न्याय पाना केवल अमीर, शिक्षित या प्रभावशाली वर्ग का अधिकार नहीं है। गरीब, कैदी, बंधुआ मजदूर, शोषित महिला या समाज के हाशिए पर धकेले गए व्यक्ति के लिए अदालत तक पहुंचना भी आसान होना चाहिए।
इसी सोच के तहत अदालत ने माना कि यदि कोई व्यक्ति वकील रखने या कोर्ट की जटिल प्रक्रिया का पालन करने में असमर्थ है, तो उसके द्वारा भेजा गया पत्र या पोस्टकार्ड भी याचिका के रूप में स्वीकार किया जा सकता है। इस पहल ने न्याय को आम आदमी के दरवाजे तक पहुंचाया। यही कारण है कि विपक्ष का कहना है कि वर्तमान परिस्थिति में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत भी कोई ऐसी पहल कर सकते थे, जिससे विपक्षी दलों के प्रतिनिधियों की शिकायत सीधे सुनवाई की प्रक्रिया में शामिल हो सकती।
हालांकि यह बहस इस बात को नहीं बदलती कि अंतिम निर्णय केवल कानूनी प्रक्रिया से ही होगा। मुलाकात चाहे हो या न हो, याचिका दायर करना ही विधिक मार्ग है। इसीलिए विपक्ष ने अब सुप्रीम कोर्ट में औपचारिक याचिका दायर कर दी है। अब देखना होगा कि अदालत इस मामले को किस प्राथमिकता और किस दृष्टिकोण से सुनती है।
राष्ट्रपति से मुलाकात और चुनाव आयोग से दूरी
बीते शुक्रवार को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने विपक्षी दलों के नेताओं से मुलाकात की। इससे विपक्ष का यह आरोप और तेज हो गया कि जिन मुद्दों पर वे बात करना चाहते हैं, उनसे जुड़े मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार उनसे मुलाकात के लिए समय नहीं दे रहे हैं। विपक्ष का कहना है कि वे चुनाव आयुक्त से मिलकर अपना पत्र सौंपना चाहते थे और कई सवाल पूछना चाहते थे।
इन सवालों में मुख्य रूप से यह पूछा जाना था कि चुनाव आयोग के दो चुनाव आयुक्तों ने जो आपत्तियां उठाईं, उन पर मुख्य चुनाव आयुक्त का क्या रुख है। एसआईआर को लेकर फैसले किस तरह लिए गए, इस पर कब-कब बैठकें हुईं, उन बैठकों का एजेंडा क्या था और क्या मिनट्स तैयार किए गए—यह सारी जानकारी सार्वजनिक की जाए। विपक्ष का तर्क है कि चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है और उसकी कार्यप्रणाली में पारदर्शिता होनी चाहिए।
यदि चुनाव आयोग इन सवालों का समय रहते जवाब देता और विपक्ष से संवाद स्थापित करता, तो स्थिति अलग हो सकती थी। विपक्ष का आरोप है कि संवाद की इस कमी ने ही जनता को सड़क पर उतरने के लिए मजबूर किया। जब लोकतांत्रिक संस्थाएं जवाब नहीं देतीं, तो विरोध ही नागरिकों की आवाज बन जाता है।
राहुल गांधी के आरोप और चुनाव आयोग का रुख
2024 के लोकसभा चुनाव के बाद राहुल गांधी ने महादेवपुरा और अलंद सीटों में वोटर लिस्ट की कथित गड़बड़ी के दावे पेश किए थे। इसके बाद तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने उनसे कहा था कि या तो वे हलफनामा दें या अपने आरोपों पर माफी मांगें। राहुल गांधी ने हलफनामा देने या माफी मांगने के बजाय कई अन्य प्रेस कांफ्रेंस कीं और विभिन्न सीटों से वोटर लिस्ट की गड़बड़ी के अपने दावे दोहराए।
अब राहुल गांधी ने फिर कहा है कि ज्ञानेश कुमार खुद सामने आकर बताएं कि एसआईआर के जरिए वोटर लिस्ट में बड़े पैमाने पर हेरफेर की कथित साजिश किसके दबाव में रची गई। उन्होंने दावा किया कि यदि चुनाव आयुक्त इस बारे में स्पष्ट जवाब देते हैं, तो उनके पास बचने का मौका रहेगा, अन्यथा कानूनी कार्रवाई की तैयारी की जाएगी। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के बारे में भी इसी तरह की चेतावनी दी।
यहां यह स्पष्ट रखना जरूरी है कि ये सभी बयान और आरोप अभी राजनीतिक दावों के तौर पर सामने हैं। चुनाव आयोग या सरकार की ओर से इन आरोपों की पुष्टि होना आवश्यक है। किसी भी संवैधानिक पदाधिकारी पर आरोप लगाना गंभीर बात है और उसका निर्णय अदालत, जांच एजेंसी या सक्षम मंच पर सबूतों के आधार पर ही हो सकता है। राजनीतिक आरोप और कानूनी सबूत के बीच का अंतर बनाए रखना लोकतंत्र के लिए आवश्यक है।
सुप्रीम कोर्ट में याचिका
सोमवार के प्रदर्शन के बाद विपक्ष ने अपनी लड़ाई को अदालत तक पहुंचा दिया है। अभिषेक मनु सिंघवी के नेतृत्व में वकीलों की टीम ने राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खड़गे, सौगत रॉय, अखिलेश यादव, तेजस्वी प्रसाद यादव, संजय राउत, एम. ए. बेबी और डी. राजा की ओर से सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है।
इस याचिका में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने, एसआईआर प्रक्रिया को रद्द करने और बैलेट पेपर से चुनाव कराने की मांग की गई है। याचिका सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर दर्ज होने की बात कही गई है। अब अदालत तय करेगी कि इस याचिका पर सुनवाई होगी या नहीं, और यदि होती है तो किस क्रम व प्राथमिकता से होगी।
बैलेट पेपर से चुनाव की मांग बड़ी और गंभीर है, क्योंकि वर्तमान में देश इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों यानी ईवीएम के जरिए चुनाव कराता है। इस मांग पर कानूनी, तकनीकी और प्रशासनिक स्तर पर व्यापक बहस हो सकती है। अदालत को यह देखना होगा कि याचिका में दिए गए आधार कितने ठोस हैं और क्या वे न्यायिक हस्तक्षेप की मांग करने योग्य हैं।
एक मोर्चा, एक उद्देश्य
इस आंदोलन की सबसे बड़ी खासियत यह है कि विपक्ष इस बार अलग-अलग मुद्दों पर अलग-अलग लड़ाई नहीं लड़ रहा। राहुल गांधी ने स्पष्ट किया है कि सभी ताकतें एक ही उद्देश्य के लिए एकजुट हैं—मतदान के अधिकार और चुनावी प्रक्रिया की ईमानदारी की रक्षा। नेहा बोरा, योगेंद्र यादव जैसे चेहरों सहित कई सामाजिक कार्यकर्ता और नागरिक भी सुप्रीम कोर्ट की ओर बढ़ रहे हैं।
यह एकजुटता विपक्ष के लिए राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि अब तक विभिन्न दल अपने-अपने क्षेत्रीय या वैचारिक मुद्दों पर संघर्ष करते रहे हैं। वोट चोरी का मुद्दा उन्हें एक साझा मंच पर ला रहा है। यदि यह एकता लंबे समय तक बनी रहती है, तो यह आगामी चुनावी राजनीति पर गहरा असर डाल सकती है।
लेकिन आंदोलन की असली परीक्षा सड़क पर भीड़ जुटाने में नहीं, बल्कि तथ्यों, कानूनी दलीलों और लगातार जन-संपर्क में होगी। वोटर लिस्ट से जुड़े दावों को दस्तावेजों, आंकड़ों और सत्यापन योग्य सबूतों से मजबूत करना होगा। साथ ही यह भी सुनिश्चित करना होगा कि आंदोलन हिंसा, अफवाह या संवैधानिक संस्थाओं पर बिना आधार के आरोपों तक न पहुंचे।
लोकतंत्र की अगली परीक्षा
अब सवाल यह है कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले को किस तरह आगे बढ़ाएगा। यदि अदालत याचिका पर गंभीरता से सुनवाई करती है और वोटर लिस्ट की पारदर्शिता से जुड़े सवालों का निपटारा करती है, तो यह लोकतंत्र के लिए महत्वपूर्ण कदम होगा। दूसरी ओर, यदि चुनाव आयोग खुद आगे आकर एसआईआर प्रक्रिया, बैठकों और निर्णयों की जानकारी सार्वजनिक करता है, तो भी जनता का भरोसा बहाल हो सकता है।
लोकतंत्र केवल चुनाव कराने की प्रक्रिया नहीं है। लोकतंत्र तभी जीवित रहता है जब हर नागरिक को यह विश्वास हो कि उसका वोट मायने रखता है, उसका नाम वोटर लिस्ट में सुरक्षित है और चुनावी प्रक्रिया निष्पक्ष है। वोट चोरी के आरोप चाहे कितने भी राजनीतिक क्यों न हों, इन्हें हल्के में लेना उचित नहीं। इनका जवाब पारदर्शिता, संवाद और कानूनी प्रक्रिया से देना होगा।
आज जनता न्यायपालिका की ओर देख रही है। यह उम्मीद इस बात पर टिकी है कि अदालत न केवल कानून की रक्षा करेगी, बल्कि नागरिक के मताधिकार की रक्षा भी सुनिश्चित करेगी। यदि न्यायपालिका, चुनाव आयोग और सरकार मिलकर चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता बहाल करते हैं, तो यह देश के लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ी जीत होगी। लेकिन यदि जवाबदेही से बचा जाता रहा और जनता की आवाज को दबाया जाता रहा, तो यह संघर्ष केवल एक प्रदर्शन नहीं रहेगा—यह लोकतंत्र की रक्षा के लिए उठे लंबे जन-आंदोलन की शुरुआत बन सकता है।
