-सचिन कुमार गौतम
अक्टूबर 2024 में सर्वोच्च न्यायालय परिसर में न्याय की देवी की नई प्रतिमा स्थापित की गई। इस प्रतिमा की आंखों पर पट्टी नहीं थी और उसके हाथ में तलवार के स्थान पर संविधान की पुस्तक थी। तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ के कार्यकाल में किए गए इस बदलाव का उद्देश्य औपनिवेशिक विरासत से जुड़े प्रतीकों को पीछे छोड़ना बताया गया। खुली आंखें इस विचार का संकेत थीं कि कानून अंधा नहीं, बल्कि सच और संविधान को देखकर न्याय करता है। तलवार की जगह संविधान यह याद दिलाता है कि न्याय का आधार शक्ति नहीं, संवैधानिक मर्यादा है।
लेकिन इस प्रतीकात्मक बदलाव पर एक बुनियादी सवाल भी उठता है। न्याय की देवी की आंखों पर पट्टी का अर्थ यह नहीं था कि न्याय व्यवस्था सच देखने से इनकार करती है। उसका संदेश यह था कि न्याय करते समय व्यक्ति का पद, पहचान, राजनीतिक प्रभाव या सत्ता से निकटता मायने नहीं रखनी चाहिए। कानून सबको समान नजर से देखे—यही उस पट्टी का आशय था। ऐसे में अगर खुली आंखें केवल कुछ लोगों को पहचानने और कुछ को अनदेखा करने का प्रतीक बन जाएं, तो प्रतिमा बदलने से न्याय की भावना नहीं बदलती। असली कसौटी यह है कि अदालतें संविधान की रक्षा करें और सरकारें उनके आदेशों का पालन करें।
शनिवार और रविवार की घटनाओं ने इसी सवाल को फिर सामने ला खड़ा किया। 10 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर प्रस्तावित प्रदर्शन के पीछे कई मांगें थीं—मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने, विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर वापस लेने और 2024 से पहले की मतदाता सूची बहाल करने की मांग। विपक्षी दल और नागरिक समाज के कुछ संगठन इन मुद्दों पर आंदोलन कर रहे हैं। राहुल गांधी लगातार मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों और “वोट चोरी” के आरोप उठा रहे हैं; विपक्ष के अन्य दल भी अब उनके साथ खड़े दिखाई दे रहे हैं।
पिछले सप्ताह विपक्षी नेताओं ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त से मिलने की कोशिश की। उन्हें मिलने से रोके जाने और पुलिस कार्रवाई को लेकर सवाल उठे। इसके बाद विपक्षी नेताओं ने 9 अक्टूबर को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मुलाकात की। राहुल गांधी के मुताबिक राष्ट्रपति ने उनसे आरोपों के समर्थन में सबूत पेश करने को कहा है। उन्होंने कहा कि वे सबूत प्रस्तुत करेंगे। सोमवार, 12 अक्टूबर को उन्होंने इसी मामले में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत से मिलने का समय मांगा। उसी दिन प्रदर्शन का भी ऐलान किया गया।
इन प्रदर्शनों से पहले ही दिल्ली में सुरक्षा और यातायात व्यवस्था को लेकर उठाए गए कदमों ने विवाद खड़ा कर दिया। शनिवार को 57 मेट्रो स्टेशन बंद किए गए। दिल्ली आने वाली कई ट्रेनें रद्द हुईं और कुछ ट्रेनों में पहुंचे यात्रियों को कथित तौर पर उतारकर हिरासत में लिया गया। नागरिकों के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन की आशंका में राजधानी के सार्वजनिक परिवहन को इस स्तर पर रोकना कितना उचित था। प्रदर्शनकारियों को रोकने के नाम पर आम लोगों की आवाजाही और रोजमर्रा की जरूरतों को प्रभावित करना किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में गंभीर चिंता का विषय है।
कॉकरोच जनता पार्टी के अभिजित दीपके, सौरव दास और आशुतोष रांका को भी शनिवार को हिरासत में लिए जाने की खबर आई। उनके समर्थकों और सहयोगियों के अनुसार, देर रात तक यह स्पष्ट नहीं था कि उन्हें कहां रखा गया है। रविवार सुबह उन्हें मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया और सशर्त रिहाई दी गई। हिरासत में लेने की कार्रवाई यदि कानून के तहत हुई, तो उसकी प्रक्रिया और आधार भी स्पष्ट होने चाहिए। लोकतंत्र में कानून-व्यवस्था बनाए रखना सरकार की जिम्मेदारी है, लेकिन उस जिम्मेदारी का निर्वहन पारदर्शी और अनुपातिक तरीके से होना चाहिए।
इस पूरे घटनाक्रम में सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका भी चर्चा के केंद्र में रही। शुक्रवार को अदालत ने सार्वजनिक परिवहन, विशेषकर मेट्रो, को बंद न करने की बात कही थी, क्योंकि इससे आम लोगों को परेशानी होती है। इसके बावजूद मेट्रो स्टेशन बंद किए जाने के बाद रविवार को अदालत ने पूछा कि क्या इसे अवमानना नहीं माना जाना चाहिए। विशेष सुनवाई में न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने कहा कि कानून के मुताबिक शहर में लोगों की निर्बाध आवाजाही की अनुमति होनी चाहिए और किसी को भी निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के बिना हिरासत में नहीं लिया जा सकता।
लेकिन अदालत के इस आदेश के कुछ ही समय बाद, रविवार को करीब 11 बजे शांतिपूर्ण प्रदर्शन के लिए जुटे नागरिक समाज के लोगों, वामपंथी छात्र संगठनों और एनएसयूआई कार्यकर्ताओं को पुलिस ने हिरासत में लिया। प्रदर्शनकारियों के साथ पुलिस के व्यवहार और हिरासत की प्रक्रिया पर सवाल उठे। यदि अदालत का आदेश लागू होने के कुछ घंटे बाद ही ऐसी कार्रवाई होती है, तो यह केवल एक दिन के यातायात प्रबंधन का मामला नहीं रह जाता। यह न्यायालय के निर्देशों के सम्मान और नागरिकों के अधिकारों के पालन का प्रश्न बन जाता है।
सर्वोच्च न्यायालय का आदेश सरकार और पुलिस के लिए बाध्यकारी है। यदि किसी आदेश की व्याख्या या उसके अनुपालन को लेकर अस्पष्टता हो, तो प्रशासन को अदालत से स्पष्टीकरण लेना चाहिए; अपने स्तर पर उसकी अनदेखी करना उचित नहीं। इसी तरह, प्रदर्शनकारियों को भी कानून के दायरे में रहकर अपनी बात रखने का अधिकार है। शांतिपूर्ण विरोध लोकतंत्र का हिस्सा है, जबकि हिंसा या सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने पर कानून के अनुसार कार्रवाई हो सकती है। लेकिन कार्रवाई का पैमाना और तरीका ऐसा होना चाहिए कि नागरिकों के मौलिक अधिकारों पर अनावश्यक रोक न लगे।
जुलाई में जंतर-मंतर पर हुए आंदोलन का केंद्र परीक्षा में कथित अनियमितताओं को लेकर युवाओं का आक्रोश था। इस बार उठ रहे सवालों का दायरा कहीं बड़ा है। मतदाता सूची की विश्वसनीयता और चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता लोकतंत्र की बुनियाद से जुड़े विषय हैं। यदि नागरिकों को लगता है कि उनके नाम मतदाता सूची से हटाए जा सकते हैं या उनके वोट का महत्व घटाया जा रहा है, तो उनकी चिंता को केवल राजनीतिक शोर कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। आरोप सही हैं या नहीं, इसका निर्णय जांच और उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर होना चाहिए। इसी कारण चुनाव आयोग की पारदर्शिता और निष्पक्षता पर उठे सवालों का स्पष्ट जवाब देना आवश्यक है।
ज्ञानेश कुमार को लेकर जारी विवाद ने राजनीतिक तनाव को और बढ़ाया है। विपक्ष का आरोप है कि निर्वाचन आयोग सरकार के पक्ष में काम कर रहा है; आयोग और सरकार को इन आरोपों का तथ्यात्मक जवाब देना चाहिए। किसी संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति के विरुद्ध मांग उठना अपने आप में दोष का प्रमाण नहीं है, और न ही किसी आरोप को बिना जांच सत्य मान लिया जाना चाहिए। लेकिन जब संस्थाओं पर भरोसा कमजोर पड़ता है, तब केवल बयान पर्याप्त नहीं होते—निर्णयों, प्रक्रियाओं और उपलब्ध आंकड़ों में निष्पक्षता दिखाई देनी चाहिए।
इसी बीच एलन मस्क की ओर से एक्स पर मुकेश अंबानी को भारत का प्रधानमंत्री बताने वाली पोस्ट ने भी चर्चा को जन्म दिया। इसे लेकर राजनीतिक प्रतिक्रिया और आलोचना सामने आई। किसी विदेशी कारोबारी की टिप्पणी को भारत की राजनीतिक स्थिति का प्रमाण नहीं माना जा सकता, फिर भी यह सवाल उठता है कि ऐसी पोस्ट पर सत्तारूढ़ दल और सरकार की प्रतिक्रिया क्या रही। सार्वजनिक जीवन में पदों और संस्थाओं की गरिमा की रक्षा के लिए एक समान मानदंड होना चाहिए—चाहे टिप्पणी किसी भी व्यक्ति की ओर से आए।
पत्रकारों के साथ कथित दुर्व्यवहार ने चिंता को और गहरा किया। शनिवार के प्रदर्शन को कवर करने पहुंचे देशबन्धु-डीबी लाइव के पत्रकार समीरात्मज मिश्र के साथ दिल्ली पुलिस की बदसलूकी कैमरे में दर्ज होने की बात कही गई है। अन्य पत्रकारों, विशेषकर महिला पत्रकारों, के साथ भी अनुचित व्यवहार के आरोप सामने आए। रविवार को प्रेस क्लब के बाहर बड़ी संख्या में पुलिसकर्मियों और आंसू गैस छोड़ने वाले वाहनों की तैनाती तथा पुलिस अधिकारियों के हथियारों के साथ परिसर में प्रवेश को लेकर भी सवाल उठे। प्रेस की स्वतंत्रता का अर्थ कानून से ऊपर होना नहीं है, लेकिन पत्रकारों को उनका काम करने से रोकना या डराने वाला व्यवहार करना लोकतंत्र के लिए नुकसानदेह है।
लोकतंत्र में चुनाव आयोग, जांच एजेंसियों, अदालतों, पुलिस और मीडिया—हर संस्था की भूमिका अलग है, लेकिन उनकी विश्वसनीयता एक-दूसरे से जुड़ी हुई है। सरकार की आलोचना करने वाले नागरिकों या पत्रकारों पर कार्रवाई हो, तो उसके कारण और कानूनी आधार स्पष्ट होने चाहिए। अदालत के आदेशों का पालन न हो, तो जवाबदेही तय होनी चाहिए। चुनावी प्रक्रिया पर गंभीर आरोप लगें, तो उनका निष्पक्ष और पारदर्शी परीक्षण होना चाहिए।
न्याय की देवी की आंखों पर पट्टी हो या न हो, न्यायपालिका की असली पहचान उसके फैसलों और उन फैसलों के सम्मान से तय होती है। सत्ता में बैठे लोगों के लिए भी संविधान की सीमाएं उतनी ही बाध्यकारी हैं जितनी आम नागरिकों के लिए। यदि अदालतों के निर्देशों की अनदेखी होती है, शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया जाता है और पत्रकारों को अपना काम करने से रोका जाता है, तो जनता का संस्थाओं पर भरोसा कमजोर होगा। लोकतंत्र को बचाए रखने की जिम्मेदारी केवल अदालतों या सरकार की नहीं—नागरिकों, मीडिया और सभी संवैधानिक संस्थाओं की है।

