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लोकतंत्र की परीक्षा और एसआईआर पर उठते सवाल

-सचिन कुमार गौतम

देश के लोकतंत्र को मजबूत बनाए रखने वाली संस्थाओं की निष्पक्षता और पारदर्शिता पर उठते सवाल चिंता का विषय हैं। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर विपक्ष लगातार गंभीर आरोप लगा रहा है। विपक्ष का दावा है कि इस प्रक्रिया के तहत 13 करोड़ से अधिक नाम मतदाता सूची से बाहर हो चुके हैं। यदि यह आंकड़ा सही है, तो यह केवल प्रशासनिक प्रक्रिया का मामला नहीं, बल्कि करोड़ों नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकार से जुड़ा प्रश्न है।

एसआईआर का उद्देश्य मतदाता सूची को अद्यतन करना और उसमें मौजूद गलतियों को दूर करना बताया जाता है। लेकिन किसी भी पुनरीक्षण प्रक्रिया की विश्वसनीयता तभी कायम रह सकती है, जब उसके नियम, आंकड़े और निर्णय सार्वजनिक हों। चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है। इसलिए उसके हर बड़े फैसले की जानकारी राजनीतिक दलों, नागरिक संगठनों, मीडिया और आम जनता के सामने स्पष्ट रूप से रखी जानी चाहिए। पारदर्शिता से बचने की कोई भी कोशिश संदेह को जन्म देती है।

विपक्ष का आरोप है कि चुनाव आयोग एसआईआर से जुड़े सवालों का खुलकर जवाब नहीं दे रहा है। सबसे अधिक विवाद ऑनलाइन फॉर्म-6 में किए गए बदलाव को लेकर है। फॉर्म-6 का इस्तेमाल नए मतदाताओं का नाम मतदाता सूची में शामिल कराने के लिए किया जाता है। एसआईआर के दौरान इस फॉर्म में एक अतिरिक्त घोषणा-पत्र जोड़े जाने की बात सामने आई। इसके तहत नए मतदाता को यह बताना होता है कि वह स्वयं या उसके माता-पिता पिछली एसआईआर प्रक्रिया के दौरान मतदाता सूची में मैप किए गए थे या नहीं।

यह बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे पहली बार मतदान करने वाले युवाओं और उन परिवारों पर अतिरिक्त जिम्मेदारी आ जाती है, जिनके पुराने रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं हैं। ऐसे में गरीब, ग्रामीण, प्रवासी और वंचित समुदायों के लोगों को अपने नाम मतदाता सूची में शामिल कराने में कठिनाई हो सकती है। यदि किसी नागरिक से ऐसे दस्तावेज या घोषणाएं मांगी जाती हैं, जिनकी व्यवस्था उसके लिए आसान नहीं है, तो वह मताधिकार से वंचित हो सकता है।

फॉर्म-6 में हुए इस बदलाव को लेकर सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई ने विवाद को और गंभीर बना दिया। सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कथित तौर पर कहा कि अदालत ने किसी संशोधित फॉर्म-6 को मंजूरी नहीं दी है। इसके विपरीत चुनाव आयोग की ओर से यह दावा किया जाता रहा कि फॉर्म में बदलाव सुप्रीम कोर्ट की अनुमति के बाद किया गया। यदि अदालत की टिप्पणी और चुनाव आयोग के दावे में अंतर है, तो इसकी स्पष्ट व्याख्या आवश्यक है। यह केवल शब्दों का विवाद नहीं, बल्कि संवैधानिक संस्था की विश्वसनीयता से जुड़ा मामला है।

रिपोर्टों के अनुसार, चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने भी इस बदलाव पर आपत्ति जताई थी। यदि आयोग के भीतर ही किसी निर्णय को लेकर मतभेद मौजूद थे, तो उस पूरी प्रक्रिया को सार्वजनिक किया जाना चाहिए। इससे जनता को यह समझने में मदद मिलेगी कि निर्णय किस आधार पर लिया गया और उसमें किन अधिकारियों की क्या भूमिका थी। संवैधानिक संस्थाओं में आंतरिक असहमति लोकतंत्र के लिए असामान्य नहीं है, लेकिन उसे छिपाने से संस्थागत भरोसा कमजोर होता है।

इन्हीं सवालों के चलते विपक्ष एसआईआर को रद्द करने की मांग कर रहा है। मंगलवार को इंडिया ब्लॉक के सांसदों ने संसद परिसर से चुनाव आयोग तक मार्च निकालने की कोशिश की। उनका उद्देश्य चुनाव आयुक्तों से मुलाकात कर अपनी आपत्तियां दर्ज कराना था। सांसदों के हाथों में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग वाले पोस्टर भी थे।

मार्च शुरू होते ही दिल्ली पुलिस ने सांसदों को रोक दिया और कई नेताओं को हिरासत में लिया गया। अखिलेश यादव, डेरेक ओ’ब्रायन और अभिषेक बनर्जी सहित अनेक सांसदों को बसों में बैठाया गया। राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा भी अन्य सांसदों के साथ आकाशवाणी भवन परिसर में पहुंच गए, जो चुनाव आयोग के कार्यालय से लगभग 100 मीटर की दूरी पर है। विपक्षी सांसदों ने वहीं धरना शुरू कर दिया और चुनाव आयोग के दूसरे प्रवेश द्वार से अधिकारियों से मिलने की कोशिश की, लेकिन उन्हें आगे नहीं जाने दिया गया।

राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पर साझा किए गए वीडियो में कहा कि 300 से अधिक विपक्षी सांसद संसद से चुनाव आयोग तक पदयात्रा करके आए हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि जब ये सांसद करोड़ों भारतीयों का प्रतिनिधित्व करते हैं, तो चुनाव आयुक्त उनसे मिलने से क्यों बच रहे हैं। उन्होंने यह भी पूछा कि पुलिस शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखने जा रहे जनप्रतिनिधियों को क्यों रोक रही है।

यह सवाल पूरी तरह जायज है। चुनाव आयोग किसी राजनीतिक दल का कार्यालय नहीं, बल्कि देश की संवैधानिक चुनावी संस्था है। राजनीतिक दलों को अपनी आपत्तियां और शिकायतें सीधे चुनाव आयोग के सामने रखने का अधिकार है। आयोग किसी प्रतिनिधिमंडल से मिलना चाहता है या नहीं, यह प्रशासनिक निर्णय हो सकता है, लेकिन निर्वाचित सांसदों के साथ संवाद से पूरी तरह बचना लोकतांत्रिक भावना के अनुरूप नहीं कहा जा सकता।

विपक्षी नेताओं ने पुलिस कार्रवाई पर भी सवाल उठाए। अखिलेश यादव ने कहा कि चुनाव आयोग के कामकाज पर आपत्तियां पहली बार नहीं उठ रही हैं। उनके अनुसार, कई मौकों पर ऐसा लगता है कि आयोग सभी राजनीतिक दलों को समान दृष्टि से नहीं देख रहा। शिवसेना सांसद संजय राउत ने आरोप लगाया कि विपक्षी सांसदों को रोकने के लिए बड़ी संख्या में केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल के जवानों को तैनात किया गया। उनका सवाल था कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे जनप्रतिनिधियों के खिलाफ इतनी कड़ी सुरक्षा व्यवस्था की आवश्यकता क्यों पड़ी।

लोकतंत्र में असहमति को दबाने के बजाय सुना जाना चाहिए। राजनीतिक दलों के बीच मतभेद स्वाभाविक हैं, लेकिन चुनावी प्रक्रिया पर उठने वाले सवालों का उत्तर तथ्यों, दस्तावेजों और सार्वजनिक संवाद के माध्यम से दिया जाना चाहिए। यदि एसआईआर में किसी नागरिक का नाम हटाया गया है, तो उसके लिए अपील और सुधार की सरल व्यवस्था होनी चाहिए। चुनाव आयोग को यह भी बताना चाहिए कि कितने नाम हटाए गए, किन कारणों से हटाए गए और प्रभावित नागरिकों को अपनी स्थिति स्पष्ट करने का कितना अवसर दिया गया।

सरकार और चुनाव आयोग दोनों की जिम्मेदारी है कि वे लोकतंत्र में जनता का विश्वास बनाए रखें। विपक्ष के आरोप सही हैं या नहीं, इसका निर्णय तथ्यों और स्वतंत्र जांच से होना चाहिए। लेकिन सवाल पूछने वालों को रोकना, मिलने का अवसर न देना और पारदर्शी जानकारी उपलब्ध न कराना संदेह को और गहरा करता है।

लोकतंत्र केवल चुनाव कराने का नाम नहीं है। यह नागरिकों के मताधिकार, संस्थाओं की निष्पक्षता, राजनीतिक असहमति के सम्मान और सार्वजनिक जवाबदेही पर आधारित व्यवस्था है। इसलिए एसआईआर से जुड़े सभी आंकड़े, नियम और निर्णय सार्वजनिक किए जाने चाहिए। चुनाव आयोग को राजनीतिक दलों और नागरिक समाज के साथ खुला संवाद करना चाहिए। लोकतंत्र की रक्षा केवल सत्ता पक्ष या विपक्ष की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि हर संवैधानिक संस्था और नागरिक की साझा जिम्मेदारी है।

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