लक्ष्मीकान्त पाठक
हरदोई। 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले शाहाबाद की सियासत में मुकाबला फिर भाजपा विधायक एवं राज्य मंत्री रजनी तिवारी और सपा के आसिफ अली खां बब्बू के बीच सिमटता नजर आ रहा है। बीते दो विधानसभा चुनावों में भाजपा ने सीट जरूर जीती, लेकिन जीत का अंतर इतना बड़ा नहीं रहा कि मुकाबले को एकतरफा कहा जा सके। वहीं 2023 के निकाय और 2024 के लोकसभा चुनाव ने भाजपा के सामने नई राजनीतिक चुनौती खड़ी कर दी है।
विधानसभा में करीबी मुकाबला
2017 में भाजपा की रजनी तिवारी ने 99,624 वोट हासिल कर बसपा प्रत्याशी आसिफ खान को 4,260 वोटों से हराया था। 2022 में सपा के टिकट पर मैदान में उतरे आसिफ खान को 88,082 वोट मिले, जबकि रजनी तिवारी को 94,561 वोट मिले। इस बार जीत का अंतर 6,479 वोट रहा। यानी लगातार दो चुनावों में भाजपा की जीत के बावजूद विपक्षी प्रत्याशी मजबूत चुनौती पेश करते रहे।
निकाय चुनाव ने बदला शहरी समीकरण
2023 के शाहाबाद नगर पालिका चुनाव में सपा प्रत्याशी नसरीन बानो ने 24,038 वोट हासिल कर भाजपा के संजय मिश्रा को 4,592 वोटों से पराजित किया। भाजपा की ओर से उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य और विधायक रजनी तिवारी के प्रचार के बावजूद मिली यह हार शाहाबाद के शहरी क्षेत्र में भाजपा के लिए बड़ा झटका मानी गई। वहीं इस जीत ने आसिफ अली खान के परिवार की स्थानीय राजनीतिक पकड़ को मजबूती दी।
लोकसभा में उलट गया विधानसभा का गणित
2024 के लोकसभा चुनाव में शाहाबाद विधानसभा क्षेत्र का परिणाम और ज्यादा महत्वपूर्ण रहा। सपा की ऊषा वर्मा को 98,331 वोट मिले, जबकि भाजपा के जयप्रकाश रावत को 92,161 वोट मिले। सपा ने 6,170 वोटों की बढ़त हासिल की। खास बात यह है कि 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा 6,479 वोटों से आगे थी। महज दो वर्ष में लगभग 12,500 वोटों का स्विंग शाहाबाद के बदलते राजनीतिक रुझान का संकेत देता है।
2027 में दोनों के सामने अलग-अलग चुनौती

लगातार 88 से 95 हजार के बीच वोट हासिल करने वाले आसिफ अली खान के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने मजबूत विपक्षी जनाधार को निर्णायक जीत में बदलने की होगी। उन्हें विधानसभा चुनाव में मिले वोटों को लोकसभा और निकाय चुनाव के बढ़े हुए समर्थन से जोड़ना होगा।
दूसरी ओर, हैट्रिक की तलाश में जुटीं रजनी तिवारी के सामने सत्ता-विरोधी माहौल, स्थानीय मुद्दों, निकाय चुनाव में भाजपा की हार और लोकसभा चुनाव में सपा की बढ़त, अपने ही दल से तमाम नेताओं की दावेदारी जैसी चुनौतियां हैं। चुनाव मे भाजपा के लिए सबसे अहम सवाल यह होगा कि क्या वह अपना पुराना सामाजिक और संगठनात्मक आधार फिर से एकजुट कर पाती है? ऐसे मे बीजेपी का एक तरफ लगातार दो विधानसभा जीतों के आधार पर मजबूत पकड़ का दावा है, तो दूसरी ओर निकाय और लोकसभा चुनाव के नतीजों से उत्साहित विपक्षी खेमे की बढ़ती उम्मीदें। ऐसे मे सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या रजनी तिवारी अपने पुराने किले को बचा पाएंगी या निकाय से लोकसभा तक दिखा ‘सपा ट्रेंड’ 2027 में निर्णायक राजनीतिक बदलाव का आधार बनेगा?




