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तुलु भाषा को कर्नाटक में मिला अतिरिक्त राजभाषा का दर्जा, कांग्रेस सरकार ने पूरा किया पुराना वादा

मंगलुरु, 19 सितंबर (वेब वार्ता)। कर्नाटक में तुलु भाषा को लेकर लंबे समय से चली आ रही मांग को महत्वपूर्ण सफलता मिली है। मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने शुक्रवार को बताया कि राज्य मंत्रिमंडल ने तुलु को कर्नाटक की दूसरी अतिरिक्त प्रशासनिक भाषा के रूप में मान्यता देने का निर्णय लिया है। मुख्य रूप से दक्षिण कन्नड़ और उडुपी जिलों में बोली जाने वाली तुलु भाषा को मिली इस मान्यता से उसके शैक्षिक, सांस्कृतिक और प्रशासनिक विकास के नए अवसर खुलने की उम्मीद है।

लंबे समय से चल रही थी तुलु को मान्यता देने की मांग

मुख्यमंत्री कार्यालय की ओर से साझा किए गए मंत्रिमंडलीय निर्णय संबंधी विवरण के अनुसार, तुलु को राज्य की दूसरी अतिरिक्त प्रशासनिक भाषा का दर्जा देने का निर्णय लिया गया है। यह फैसला तटीय कर्नाटक के लोगों की लंबे समय से चली आ रही मांगों में से एक को पूरा करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने कहा कि तुलु भाषा में शैक्षिक और सांस्कृतिक विकास की व्यापक संभावनाएं हैं। उन्होंने इस भाषा के संरक्षण, संवर्धन और विकास के महत्व पर भी बल दिया। तुलु मुख्य रूप से कर्नाटक के दक्षिण कन्नड़ और उडुपी जिलों तथा आसपास के तटीय क्षेत्रों में बोली जाती है। इस भाषा की समृद्ध लोक परंपराएं, साहित्यिक विरासत और सांस्कृतिक विशिष्टता तटीय कर्नाटक की पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

भाजपा के पुराने वादे का कांग्रेस सरकार ने किया क्रियान्वयन

तुलु भाषा को आधिकारिक पहचान देने की मांग कई वर्षों से राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर उठती रही है। वर्ष 2008 में भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा ने भी तुलु को मान्यता देने का वादा किया था। तटीय कर्नाटक में भाजपा का लंबे समय से मजबूत राजनीतिक प्रभाव रहा है। दक्षिण कन्नड़ और उडुपी क्षेत्र में पार्टी की चुनावी पकड़ तथा राज्य में पूर्ववर्ती भाजपा सरकारों के कार्यकाल के बावजूद तुलु को प्रशासनिक मान्यता देने की मांग पूरी नहीं हो सकी थी। अब कांग्रेस सरकार द्वारा मंत्रिमंडल के निर्णय के माध्यम से तुलु को अतिरिक्त प्रशासनिक भाषा का दर्जा देने की घोषणा की गई है। इस फैसले को तुलु भाषा के समर्थक संगठन लंबे समय से उठाई जा रही मांग की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में देख रहे हैं।

तटीय कर्नाटक के लिए अलग पर्यटन नीति का प्रस्ताव

मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने तटीय कर्नाटक के विकास को लेकर भी महत्वपूर्ण घोषणा की। उन्होंने बताया कि राज्य सरकार तटीय क्षेत्र के लिए अलग पर्यटन नीति लाने की तैयारी कर रही है। उन्होंने कहा कि तटीय कर्नाटक में लंबा समुद्री तट, समृद्ध सांस्कृतिक परंपराएं तथा धार्मिक और ऐतिहासिक धरोहरों से जुड़े अनेक महत्वपूर्ण स्थल मौजूद हैं। इन विशेषताओं को ध्यान में रखते हुए क्षेत्र के पर्यटन विकास के लिए अलग नीति तैयार की जाएगी। नई पर्यटन नीति के माध्यम से तटीय क्षेत्र की पर्यटन क्षमता को बढ़ावा देने तथा वहां के सांस्कृतिक और प्राकृतिक संसाधनों के बेहतर उपयोग पर ध्यान दिए जाने की संभावना है।

32,611 करोड़ रुपये की विकास परियोजनाओं को मंजूरी

मुख्यमंत्री ने यह भी जानकारी दी कि राज्य मंत्रिमंडल ने कुल 32,611 करोड़ रुपये की विकास परियोजनाओं के प्रस्तावों को मंजूरी दी है। मंत्रिमंडलीय निर्णय के अनुसार, इन प्रस्तावों में ग्रामीण विकास और तटीय क्षेत्र के विकास के लिए लगभग 16,000 करोड़ रुपये की राशि निर्धारित किए जाने की जानकारी दी गई है। इन परियोजनाओं के माध्यम से ग्रामीण और तटीय क्षेत्रों में विकास कार्यों को गति देने का लक्ष्य रखा गया है।

तुलु साहित्य अकादमी ने जताया आभार

कर्नाटक तुलु साहित्य अकादमी के अध्यक्ष तारानाथ गट्टी कापिकाड ने तुलु को अतिरिक्त प्रशासनिक भाषा के रूप में मान्यता देने के निर्णय के लिए मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार का आभार व्यक्त किया। कापिकाड ने कहा कि सरकार ने चुनावी घोषणा पत्र में किए गए वादे को पूरा करते हुए तुलु को आधिकारिक पहचान दिलाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया है। उन्होंने कन्नड़ एवं संस्कृति मंत्री शिवराज एस. तांगाडगी, दक्षिण कन्नड़ जिले के प्रभारी मंत्री यूटी खादर, पुत्तुर के विधायक अशोक राय और अन्य विधायकों के प्रति भी आभार प्रकट किया। उन्होंने तुलु भाषा को मान्यता दिलाने के लिए भारत और विदेशों में लगातार प्रयास कर रहे विभिन्न तुलु संगठनों के योगदान को भी महत्वपूर्ण बताया।

भाषा के संरक्षण और विकास को मिलेगी नई दिशा

तारानाथ गट्टी कापिकाड ने इस निर्णय को तुलु भाषी समुदाय के लिए ऐतिहासिक दिन बताया। उन्होंने कहा कि इस फैसले से देश-विदेश में रहने वाले तुलु भाषी लोगों का विश्वास बढ़ेगा और भाषा के विकास के प्रयासों को प्रोत्साहन मिलेगा। कापिकाड के अनुसार, तुलु भाषा का इतिहास लगभग 3,000 वर्षों से जुड़ा हुआ है। उन्होंने मंत्रिमंडल के निर्णय को तुलु भाषा की पहचान और उसके संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया।

तुलु को अतिरिक्त प्रशासनिक भाषा का दर्जा मिलने के बाद भाषा के शैक्षिक उपयोग, साहित्यिक गतिविधियों और सांस्कृतिक संरक्षण से जुड़े प्रयासों को संस्थागत समर्थन मिलने की उम्मीद है। हालांकि, इस निर्णय के व्यावहारिक क्रियान्वयन और प्रशासनिक प्रक्रियाओं का स्वरूप संबंधित सरकारी प्रावधानों के माध्यम से स्पष्ट होगा।

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