बेंगलूरु, 16 सितंबर (वेब वार्ता)। कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि पति-पत्नी का एक ही घर में अलग-अलग कमरों में रहना अपने आप में वैवाहिक क्रूरता नहीं माना जा सकता। हालांकि, यदि अलग रहने के साथ लगातार झगड़े, मानसिक प्रताड़ना, संदेह और आपसी विश्वास के टूटने जैसी परिस्थितियां लंबे समय तक बनी रहें, तो इनका सामूहिक प्रभाव वैवाहिक क्रूरता के रूप में सामने आ सकता है।
जस्टिस डीके सिंह और जस्टिस एच शांति भूषण की पीठ ने यह टिप्पणी पारिवारिक न्यायालय के फैसले के खिलाफ दायर पति की अपील खारिज करते हुए की। पारिवारिक न्यायालय ने क्रूरता के आधार पर दंपती के विवाह को समाप्त कर दिया था और पति को पत्नी के लिए 25 हजार रुपये प्रतिमाह स्थायी गुजारा भत्ता देने का निर्देश दिया था। हाईकोर्ट ने इस निर्णय को बरकरार रखा।
लंबे समय तक जारी व्यवहार का संचयी प्रभाव महत्वपूर्ण
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल अलग-अलग कमरों में रहना वैवाहिक क्रूरता का आधार नहीं हो सकता। लेकिन यदि इसके साथ लगातार विवाद, मानसिक पीड़ा, हर बात पर संदेह करना और एक-दूसरे के प्रति विश्वास खत्म होने जैसी परिस्थितियां लंबे समय तक बनी रहती हैं, तो इन सभी घटनाओं का संचयी प्रभाव वैवाहिक क्रूरता साबित करने के लिए पर्याप्त हो सकता है।
मामले में संबंधित दंपती का विवाह 11 नवंबर 2001 को हुआ था। दोनों के दो बच्चे हैं। अदालत ने वैवाहिक संबंधों में लंबे समय से चले आ रहे तनाव और मानसिक प्रताड़ना से जुड़े तथ्यों को समग्र रूप से ध्यान में रखा।
आपराधिक मामले में बरी होना शिकायत को झूठा साबित नहीं करता
मानसिक प्रताड़ना के मुद्दे पर अदालत ने कहा कि पति के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 498-ए के तहत दर्ज आपराधिक मामला बरी होने के बाद समाप्त हो गया हो, तो भी इसका यह अर्थ नहीं है कि शिकायत झूठी थी।
पीठ ने कहा कि कोई भी जीवनसाथी ऐसे व्यवहार को अनिश्चितकाल तक सहन करने के लिए बाध्य नहीं है, जिससे मानसिक पीड़ा हो और आपसी विश्वास नष्ट होता हो। अदालत ने वैवाहिक संबंधों में मानसिक शांति और भरोसे के महत्व पर भी जोर दिया।
अवैध गिरफ्तारी के मामले में पुलिस अधिकारियों पर तीन लाख रुपये का जुर्माना
कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक अन्य मामले में पुलिस की कार्यप्रणाली पर कड़ी नाराजगी जताई। अदालत ने 49 वर्षीय याचिकाकर्ता केएन मोहन रेड्डी की कथित अवैध और जल्दबाजी में की गई गिरफ्तारी को गंभीरता से लेते हुए इसे ‘पुलिस राज’ की स्थिति बताया।
जस्टिस एम नागप्रसन्ना ने बेंगलूरु के व्हाइटफील्ड पुलिस थाने से जुड़े जांच अधिकारी, एक उपनिरीक्षक के खिलाफ विभागीय जांच का आदेश दिया। साथ ही, अदालत ने उपनिरीक्षक और उनके वरिष्ठ अधिकारियों को याचिकाकर्ता को व्यक्तिगत रूप से तीन लाख रुपये देने का निर्देश दिया।
नोटिस की समयसीमा से पहले गिरफ्तार करने पर सवाल
रेड्डी को एक दीवानी विवाद से जुड़े मामले में 25 अगस्त को गिरफ्तार किया गया था। पुलिस ने उन्हें भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के तहत नोटिस जारी कर 27 अगस्त को पूछताछ के लिए उपस्थित होने का निर्देश दिया था। हालांकि, आरोप है कि उन्हें निर्धारित तारीख से 48 घंटे पहले ही गिरफ्तार कर लिया गया।
यह मामला 10 अगस्त को रेड्डी और एक अन्य व्यक्ति के खिलाफ दर्ज किया गया था। सुनवाई के दौरान जस्टिस नागप्रसन्ना ने मौखिक टिप्पणी करते हुए सवाल उठाया कि जब याचिकाकर्ता वसीयत पर हस्ताक्षर करने वाला केवल गवाह था, तो उसे गिरफ्तार करने का आधार क्या था।
अदालत ने कानून के शासन के महत्व पर जोर देते हुए पुलिस की कार्रवाई पर कड़ी आपत्ति जताई और ऐसी कार्यप्रणाली पर रोक लगाने की चेतावनी दी।




