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चाचा भतीजी के पति को ‘घर जमाई’ मानकर नहीं दे सकता पैतृक संपत्ति : सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली, 10 जुलाई (वेब वार्ता)। सुप्रीम कोर्ट ने पैतृक संपत्ति और पारंपरिक रीति-रिवाजों से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि केवल किसी सामाजिक परंपरा का दावा कर संपत्ति पर अधिकार नहीं पाया जा सकता। अदालत ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति किसी विशेष प्रथा या परंपरा के आधार पर संपत्ति का दावा करता है, तो उसे उसके समर्थन में ठोस साक्ष्य और विश्वसनीय प्रमाण प्रस्तुत करने होंगे।

न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन. कोटिस्वर सिंह की पीठ ने झारखंड के उरांव समुदाय से जुड़े एक मामले की सुनवाई करते हुए झारखंड उच्च न्यायालय और निचली अदालत के फैसलों को निरस्त कर दिया। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि जब तक किसी प्रथा के लंबे समय से प्रचलित होने और समाज में व्यापक रूप से स्वीकार किए जाने का प्रमाण उपलब्ध न हो, उसे कानूनी मान्यता नहीं दी जा सकती।

मामला उरांव समुदाय की पैतृक संपत्ति से जुड़ा था। याचिकाकर्ता ने दावा किया था कि उसकी पत्नी के चाचा ने उसे घर जमाई के रूप में स्वीकार कर लिया था, इसलिए उसे संबंधित संपत्ति पर अधिकार मिलना चाहिए। दूसरी ओर, मृतक के भाई के पुत्र ने इस दावे का विरोध करते हुए कहा कि समुदाय में चाचा द्वारा भतीजी के पति को घर जमाई बनाकर पैतृक संपत्ति देने की कोई मान्य परंपरा नहीं है।

सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने पाया कि निचली अदालत और उच्च न्यायालय ने पर्याप्त साक्ष्यों के अभाव में घर जमाई के दावे को स्वीकार कर लिया था। अदालत ने कहा कि केवल मौखिक दावों के आधार पर किसी परंपरा को कानूनी मान्यता नहीं दी जा सकती।

पीठ ने अपने फैसले में कहा कि परंपरागत कानून का लाभ लेने का दावा करने वाले व्यक्ति पर ही उसे सिद्ध करने का दायित्व होता है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि उपलब्ध साक्ष्यों से केवल इतना स्थापित होता है कि कुछ परिस्थितियों में घर जमाई को अपने ससुर की संपत्ति में अधिकार मिल सकता है, लेकिन ऐसा कोई प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया गया जिससे यह साबित हो कि यही व्यवस्था चाचा और भतीजी के पति के संबंध में भी लागू होती है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी भी सामाजिक प्रथा को तभी कानूनी मान्यता मिलेगी, जब दस्तावेजों और गवाहों के माध्यम से यह सिद्ध हो कि वह परंपरा लंबे समय से निरंतर प्रचलित रही है और संबंधित समुदाय में व्यापक स्वीकृति प्राप्त है।

इन्हीं आधारों पर अदालत ने अपील स्वीकार करते हुए कहा कि इस मामले में चाचा द्वारा भतीजी के पति को घर जमाई मानकर पैतृक संपत्ति देने की परंपरा सिद्ध नहीं हुई है। इसलिए संपत्ति पर परिवार के निकटतम वैध उत्तराधिकारी का अधिकार माना जाएगा।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय केवल उरांव समुदाय तक सीमित नहीं है, बल्कि भविष्य में परंपरागत कानून और पैतृक संपत्ति से जुड़े अनेक मामलों में महत्वपूर्ण न्यायिक मिसाल के रूप में देखा जाएगा।

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