— कपिल बर्मन — 
आज से सदियों पहले, ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा के दिन (संवत 1455 / सन 1398) बनारस के लहरतारा तालाब के पास भारतीय इतिहास को एक ऐसा विद्रोही स्वर मिला, जिसने बिना किसी हथियार के धर्म के ठेकेदारों की चूलें हिला दीं। वह नाम था “संत कबीरदास”। आज कबीर के जन्म दिवस पर जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो उनका एक-एक दोहा आज की धर्मान्धता और रूढ़िवादिता पर सीधा प्रहार करता दिखाई देता है।
1. कबीर की लाठी: धर्मान्धता और पाखंड पर सीधा हमला
कबीर किसी एक धर्म के नहीं थे; उन्होंने हिंदू और मुसलमान, दोनों के भीतर पनप रही कुरीतियों और अंधविश्वास पर समान रूप से प्रहार किया। कबीर ने तब कहा था:
“पाहन पूजे हरि मिलैं, तो मैं पूजूं पहार।
ताते यह चाकी भली, पीस खाय संसार।”
और मुल्लाओं की रूढ़िवादिता को झकझोरते हुए ललकारा:
“कांकर पाथर जोरि कै, मस्जिद लई बनाय।
ता चढ़ि मुल्ला बांग दे, क्या बहरा हुआ खुदाय?”
कबीर का अध्यात्म किसी भव्य इमारत या पत्थरों का मोहक नहीं था। उनका राम घट-घट में बसने वाला निर्गुण राम था। लेकिन आज? आज कबीर की इस सोच के विपरीत धर्म को एक भव्य व्यवसाय और सियासत का जरिया बना दिया गया है।
2. आस्था का बाज़ार और राम नाम पर ‘डाका’
कबीर ने जीवनभर जिस आडंबर का विरोध किया, आज 21वीं सदी के भारत में वही आडंबर सिर चढ़कर बोल रहा है। हाल ही में राम मंदिर के नाम पर जो कुछ भी सामने आया, चाहे वह ज़मीन की खरीद-फरोख्त में करोड़ों का हेरफेर हो या प्रभु श्रीराम के नाम पर आए दान के गबन के आरोप, उसने कबीर की इस चेतावनी को सच साबित कर दिया कि लोग राम को नहीं, बल्कि राम के नाम पर अपनी तिजोरियों को पूज रहे हैं।
जब चुनावी रैलियों और सत्ता के गलियारों में प्रभु श्रीराम की मर्यादा को दांव पर लगाकर उनके नाम का इस्तेमाल केवल वोट बटोरने और जनता की गाढ़ी कमाई पर डाका डालने के लिए किया जाता है, तब कबीर का यह दर्शन याद आता है कि राम किसी की बपौती नहीं हैं। वे तो प्रेम और त्याग के भूखे हैं, करोड़ों के घोटालों के नहीं।
3. रूढ़िवादिता को चुनौती: बनारस छोड़ मगहर जाने का वह क्रांतिकारी निर्णय
कबीर केवल उपदेश नहीं देते थे, वे अपने फैसलों से सदियों पुरानी रूढ़िवादिता को पैरों तले कुचल देते थे। मध्यकाल में काशी (बनारस) के पंडितों और मुल्लाओं ने एक अंधविश्वास फैला रखा था कि “जो काशी में मरेगा, वह सीधे स्वर्ग जाएगा; और जो मगहर में मरेगा, वह गधा बनेगा या नर्क जाएगा।”
कबीर ने इस पुरोहिती ढोंग और अंधविश्वास को जमींदोज़ करने के लिए अपने जीवन के अंतिम क्षणों में एक ऐसा फैसला लिया, जिसने सबको चौंका दिया। अपने जीवन के आखिरी समय में, वृद्ध और अस्वस्थ होने के बावजूद, वे बनारस छोड़कर मगहर चले गए।
कबीर ने साफ संदेश दिया कि अगर मुक्ति केवल काशी में मरने से मिलती है, तो फिर भगवान की भक्ति का क्या मोल? उन्होंने कहा:
“जौ कासी तन तजै कबीरा, तो रामहिं कहा निहोरा?”
(अर्थात, अगर काशी में मरने से ही स्वर्ग मिलना है, तो फिर राम की बंदगी करने का क्या अहसान?)
सन 1518 में कबीर ने मगहर की धरती पर ही अपनी अंतिम सांस ली। वहाँ भी उन्होंने रूढ़ियों को तोड़ा। उनकी मृत्यु के बाद उनके शव पर अधिकार जताने के लिए हिंदू और मुसलमान आपस में लड़ने लगे। लेकिन जब कफ़न हटाया गया, तो वहाँ केवल कुछ फूल मिले। हिंदुओं ने उन फूलों का अंतिम संस्कार किया और मुसलमानों ने मज़ार बनाई। आज मगहर में कबीर की समाधि और मज़ार दोनों अगल-बगल खड़ी होकर इंसानी एकता की गवाही दे रही हैं।
पैगाम-ए-जागृत भारत
कबीर के जन्म दिवस पर आज ‘जागृत भारत’ का हर नागरिक यह सवाल पूछ रहा है कि क्या हम वाकई कबीर के देश में जी रहे हैं?
जहाँ करोड़ों रुपये खर्च कर संसद और विधायक बनने की होड़ लगी है, जहाँ जनसेवक की शक्ल में लोग जनता पर शासन करने की नीयत पाले बैठे हैं, वहाँ कबीर का “फकीराना अंदाज़” और “साखी” ही समाज को सही रास्ता दिखा सकती है। अगर देश को धर्मान्धता और भ्रष्टाचार के दलदल से निकालना है, तो कबीर के उस निर्भीक विवेक को जगाना होगा, जो सत्ता और पाखंड के सामने कभी नहीं झुका।
उठो भारत, जागो भारत! कबीर के विचारों को सिर्फ किताबों में नहीं, अपने आचरण में उतारो!


