-बिमला कुमारी- (आद्या कौशलम केंद्र)
योग भारत की प्राचीनतम आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक परंपराओं में से एक है। वेदों, उपनिषदों तथा प्राचीन भारतीय ग्रंथों के अध्ययन से ज्ञात होता है कि योग मानव जीवन के साथ प्रारंभ से ही जुड़ा रहा है। भारतीय परंपरा में भगवान शिव को आदि योगी माना जाता है, जिन्होंने योग के ज्ञान को मानवता तक पहुँचाया। योग केवल शारीरिक व्यायाम नहीं, बल्कि शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा के समन्वय का विज्ञान है। इसका उद्देश्य व्यक्ति को स्वस्थ, संतुलित एवं जागरूक बनाना है।
भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने योग के महत्व को बताते हुए कहा है—
“योगः कर्मसु कौशलम्।”
अर्थात् योग कर्मों में कुशलता प्रदान करता है।
इसी प्रकार गीता में कहा गया है—
“समत्वं योग उच्यते।”
अर्थात् जीवन की सभी परिस्थितियों में संतुलन और समभाव बनाए रखना ही योग है।
भारत सदैव “वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना का वाहक रहा है। संपूर्ण विश्व को एक परिवार मानने वाली यह सोच भारत की पहचान है। भारत विश्वगुरु बनने का जो स्वप्न देखता है, उसका आधार मानव कल्याण, शांति, स्वास्थ्य और आध्यात्मिक उन्नति है। आज योग के माध्यम से यह स्वप्न साकार होता दिखाई दे रहा है। विश्व के अनेक देशों ने योग को अपनाया है और इसके लाभों को स्वीकार किया है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहल पर वर्ष 2014 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने सर्वसम्मति से 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के रूप में घोषित किया। तब से प्रत्येक वर्ष विश्वभर में 21 जून को योग दिवस मनाया जाता है। 21 जून उत्तरी गोलार्ध का सबसे लंबा दिन होता है, जिसे ग्रीष्म संक्रांति कहा जाता है। भारतीय परंपरा में यह समय साधना, आत्मचिंतन और योगाभ्यास के लिए विशेष महत्व रखता है।
वर्ष 2026 के अंतरराष्ट्रीय योग दिवस की थीम “Yoga for Healthy Ageing” अर्थात् “स्वस्थ वृद्धावस्था के लिए योग” है। यह विषय आज के समय की एक महत्वपूर्ण आवश्यकता को दर्शाता है। बढ़ती आयु के साथ शरीर और मन अनेक चुनौतियों का सामना करते हैं। योग एक ऐसा सरल, प्राकृतिक और प्रभावी माध्यम है जो व्यक्ति को जीवन के प्रत्येक चरण में स्वस्थ, सक्रिय और संतुलित बनाए रखने में सहायता करता है। नियमित योगाभ्यास से शरीर में लचीलापन बना रहता है, संतुलन और शक्ति बढ़ती है, मानसिक तनाव कम होता है तथा जीवन की गुणवत्ता में सुधार होता है।
योग केवल वृद्धजनों के लिए ही नहीं, बल्कि हर आयु वर्ग के लिए आवश्यक है। यदि बचपन और युवावस्था से ही योग को जीवनचर्या का हिस्सा बनाया जाए, तो व्यक्ति बढ़ती आयु में भी स्वस्थ, आत्मनिर्भर और ऊर्जावान बना रह सकता है। स्वस्थ वृद्धावस्था का अर्थ केवल लंबी आयु नहीं, बल्कि ऐसी आयु है जिसमें व्यक्ति शारीरिक, मानसिक और सामाजिक रूप से सक्रिय एवं प्रसन्न बना रहे।
आज का युग अत्यधिक प्रतिस्पर्धा और भागदौड़ का युग है। लोग सफलता और धन की प्राप्ति के लिए निरंतर प्रयासरत हैं, किंतु इसके साथ तनाव, चिंता, अवसाद, उच्च रक्तचाप, मधुमेह तथा अन्य जीवनशैली संबंधी रोग भी बढ़ रहे हैं। विशेष रूप से मानसिक रोग और मानसिक असंतुलन समाज के लिए बड़ी चुनौती बनते जा रहे हैं। योग और प्राणायाम इन समस्याओं से बचाव का एक प्रभावी उपाय हैं। योग मन को स्थिरता, सकारात्मकता और आत्मविश्वास प्रदान करता है तथा व्यक्ति को मानसिक रूप से सशक्त बनाता है।
महिला सशक्तिकरण, बच्चों के सर्वांगीण विकास, स्वास्थ्य जागरूकता और सामाजिक उत्थान के क्षेत्र में सामाजिक संस्थाओं की महत्वपूर्ण भूमिका है। विभिन्न सामाजिक संस्थाएँ महिलाओं को उनके स्वास्थ्य, पोषण तथा आयु-विशेष से संबंधित रोगों के प्रति जागरूक करने का कार्य कर रही हैं। बच्चों और युवाओं में योग एवं स्वस्थ जीवनशैली के प्रति रुचि विकसित करने के लिए भी अनेक कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं।
योग एक स्वस्थ, जागरूक और सशक्त समाज के निर्माण का आधार है। स्वस्थ व्यक्ति से स्वस्थ परिवार, स्वस्थ परिवार से स्वस्थ समाज और स्वस्थ समाज से स्वस्थ राष्ट्र का निर्माण होता है। इसलिए योग केवल व्यक्तिगत साधना नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन और राष्ट्र निर्माण का भी सशक्त माध्यम है।
अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस 2026 के अवसर पर हम सभी यह संकल्प लें कि योग को अपने दैनिक जीवन का अभिन्न अंग बनाएँगे, स्वस्थ वृद्धावस्था की दिशा में कदम बढ़ाएँगे तथा योग के इस अमूल्य संदेश को जन-जन तक पहुँचाएँगे। यही भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा का सम्मान है और यही मानवता के कल्याण का मार्ग भी है।
योग दिवस केवल स्वास्थ्य के लिए ही नहीं, बल्कि विश्व शांति के लिए भी महत्वपूर्ण है। यह पूरी दुनिया को एक सूत्र में पिरोने का काम करता है। योग का उद्देश्य स्वयं को जानना और प्रकृति के साथ तालमेल बिठाना है। जब व्यक्ति आंतरिक रूप से शांत होता है, तभी समाज और विश्व में शांति संभव है।
योग भारत द्वारा विश्व को दिया गया एक अमूल्य उपहार है। आज योग किसी धर्म या सीमा में बंधा नहीं है, बल्कि यह पूरी मानवता की धरोहर बन चुका है। हमें योग को केवल एक दिन के उत्सव के रूप में नहीं, बल्कि अपने दैनिक जीवन का एक अनिवार्य हिस्सा बनाना चाहिए। यदि हम नियमित रूप से योग अपनाएंगे, तो हम न केवल स्वस्थ रहेंगे, बल्कि एक खुशहाल समाज का निर्माण भी कर सकेंगे।
ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः।
सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु।
मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्॥

