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घटते पत्रकारिता मूल्य और भाषा की कमजोर पड़ती गरिमा, चिंता का विषय

-रेनू जोशी- Renu-Joshi

पत्रकारिता वो कड़ी है जो जनता को जनता के प्रतिनिधियों से जोड़ती है। जो आवाज बनती है आम आदमी की, जो सत्ता में बैठे लोगों को उनके कर्म और उनके कर्तव्य याद दिलाने में अहम भूमिका निभाती है। सत्य, निष्पक्षता और सामाजिक सरोकार जैसे मूल्यों पर टिकी है पत्रकारिता की नींव और यही इसकी ताकत भी है। बरसों तक पत्रकारिता अपने काम को बखूबी निभाती रही और हिंदी पत्रकारिता ने तो इस काम को एक नया आयाम दिया। वैसे तो पत्रकारिता को किसी भाषा तक सीमित नहीं किया जा सकता, लेकिन ये भी सच है कि भाषा से अलग करके भी पत्रकारिता को नहीं देखा जा सकता। हिंदुस्तान में जहां सबसे ज्यादा हिंदी भाषा का उपयोग होता है, वहां पत्रकारिता और हिंदी भाषा एक-दूसरे के पूरक बन जाते हैं।

ब्रिटिश शासन के शुरुआती दौर में पत्रकारिता तो थी, लेकिन हिंदी भाषा में समाचार-पत्रों का अभाव था।। ज्यादातर पत्र-पत्रिकाएं अंग्रेजी, फारसी में छपती थीं और कुछ उर्दू में। ऐसे ही वक्त में कानपुर के एक वकील पंडित जुगल किशोर शुक्ल ने पत्रकारिता को जन-जन की भाषा में उन तक पहुंचाने का संकल्प लिया। अंग्रेजों के सामने ही देश को हिंदी और पत्रकारिता दोनों की ताकत दिखाई। 30 मई 1826 के दिन पहला हिंदी अखबार छपा, ‘उदन्त मार्तण्ड’। ये अखबार आम जन की भाषा में उन तक पहुंचा तो अंग्रेजों को डर सताने लगा। ये पत्रकारिता और हिंदी का डर था, ये डर था कि कहीं जनता जाग न जाए। अंग्रेजों से समर्थन न मिलने की वजह से सिर्फ डेढ़ साल के अंदर ही इस अखबार को बंद भी करना पड़ा, लेकिन तब ये अपना काम कर चुका था। हिंदी पत्रकारिता की आधारशिला तो रखी ही जा चुकी थी।

वक्त बदला तो पत्रकारिता का रंगरूप भी बदला। माध्यम भी बदले। पत्र-पत्रिकाओं के साथ टेलीविजन और फिर डिजिटल का जन्म हुआ। ये अच्छा था, क्योंकि हर वो माध्यम जो जनता से जुड़ा हो, वो पत्रकारिता के लिए अहम हो जाता है। माध्यम और भाषा के मायने पत्रकारिता के लिए इतने ही हैं कि वो ज्यादा से ज्यादा लोगों तक उस आवाज को पहुंचाने में मदद करते हैं। माध्यमों का बदलना बुरा नहीं होता, लेकिन दुखदायी होता है पत्रकारिता के मूल्यों का गिरना, भाषा के स्तर का खराब होना।

पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है और हिंदी भारत की राजभाषा…लेकिन जब इसी चौथे स्तंभ के मूल्य गिरते हैं तो पूरा समाज डगमगा जाता है। पिछले कुछ सालों में भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में पत्रकारिता के मूल्यों में भारी गिरावट आई है। जनता की आवाज बनने की जगह पत्रकारों ने सत्ता की आवाज बनना शुरू कर दिया है। शायद वो भूल गए हैं कि पत्रकारिता का काम जनता की आवाज बनकर सत्ता दलों से सवाल पूछना है, देश के नेताओं को हकीकत से रूबरू करना है और अगर कुछ गलत हो रहा है तो उसके खिलाफ आवाज उठाना है। अगर पत्रकारिता में ये सब नहीं होता तो लोकतंत्र का ये चौथा स्तंभ कमजोर पड़ जाता है।

पिछले 12 साल में भारत की पत्रकारिता, जो काफी हद तक हिंदी पत्रकारिता ही है, अपने निचले पायदान पर पहुंच रही है। लगातार सवाल उठ रहे हैं पत्रकारिता के दमन पर। या तो पत्रकारों ने खुद सत्ता की कठपुतली बनना चुन लिया है या फिर जो इसमें शामिल नहीं हो रहे, उनकी आवाज को दबाया जा रहा है। पत्रकारिता सत्ता दलों और कॉरपोरेट घरानों की आवाज बन चुकी है। निष्पक्षता, जो पत्रकारिता का अहम हिस्सा है, वो नजर ही नहीं आ रही। जनता के मुद्दे, जनता की समस्याएं, उनके सवाल पूरी तरह से पत्रकारों की लेखनी से नदारद हैं और इसलिए दुनिया का सबसे बड़ा देश भारत, प्रेस फ्रीडम में 157वें स्थान पर है। पाकिस्तान, बांग्लादेश जैसे देश भी भारत से प्रेस फ्रीडम में आगे निकल गए हैं।

हमें सोचना होगा कि उदन्त मार्तण्ड से अब तक के सफर में हम कहां पहुंच गए हैं। जिस हिंदी पत्रकारिता ने अंग्रेजों की नाक में दम कर दिया था, वो आज अपने ही देश के नेताओं से सवाल पूछने में क्यों हकलाने लगती है। आज जरूरत है पत्रकारिता के गिरते मूल्यों को बचाने की। माध्यम चाहे जो भी हो, लेकिन पत्रकारिता के मूल स्वरूप को बदलना खतरे की घंटी है।

(लेखिका वरिष्ठ पत्रकार है)

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